श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
के साथ मान अभिमान गया और उस अभिमान के ही साथ द्वंद्व के कारण होने वाला दुःख भी समाप्त हो गया। धन
के जाते ही विरक्ति उत्पन्न हुई, जिससे वह नियमित एकनिष्ठ संन्यासी बन गया। भिक्षा के लिये भटकते समय दुष्ट
लोगों ने अपने दुर्भाषणों से उसकी भर्त्सना की। अनेक प्रकार के विकारों से पीड़ित होने पर तथा नाना प्रकार के
उपद्रवों के चलते भी वह अपने दृढ़ निश्चय से नहीं डिगा। स्वधर्म के धैर्य ने उसे पूर्णरूप से अभेदस्वरूप बना
दिया था। संन्यासी का पूर्ण स्वधर्म यही है कि मैं देह से भिन्न नारायण स्वरूप हूँ। इस भाव ज्ञान से उसके
देहाभिमान का त्याग किया रहता है इसीलिये वह आत्मस्वरूप से नहीं डिगता। जिस प्रकार छाया पर प्रहार करने से
उस पुरुष को जरा भी भय नहीं होता, उसी प्रकार दुर्जन जब उसके देह को प्रताड़ित करते हैं तो उस निरहंकारी
पुरुष को दुःख या भय नहीं होता। देह को नाना प्रकार की पीड़ा होने पर उसकी जो देहातीत स्थिति हुई थी, उसी
की गाथा उस भिक्षु ने गाकर सुनायी और वही अब मैंने तुम्हें सुनायी। इसमें हमें जो सुख-दुःख का अनुभव होता है
वह हमारा भ्रम ही है ऐसा समझो। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।
मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः॥६०॥
अविद्यात्मक जो हमारा अज्ञान है, उसमें मन के स्वरूप से मन ही उत्पन्न होता है और वही मन भेदभाव
उत्पन्न कर सुख-दुःख भोगने को बाध्य करता है। आत्मा भेदरहित है। उसमें शत्रु, मित्र, उदासीन आदि भेद की
मन ही कल्पना करता है और वह मन स्वयं चालित करता है। इस प्रकार भेदभाव में मन का उलझे रहना ही
पुरुष का अज्ञान है। ऐसे भ्रमित पुरुष के लिये द्वंद्व दुःख के कारण संसार भयावह हो जाता है। मन ही सुख-
दुःख का कारण है और संसार भी मन की ही कल्पना है, यह ध्यान में रखो। उस मन का निग्रह कैसे किया जाय
इसका उपाय स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।
मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रहः ॥ ६१ ॥
जिसे संसार का दुःख नष्ट करना हो, उसे मन का नियंत्रण करना चाहिये क्योंकि त्रिभुवन में मन जैसा दुःख
देने वाला अन्य कोई नहीं है। मन अत्यन्त चंचल है, वह सहसा स्थिर नहीं हो पाता। इसलिये जिससे भेदभाव दूर
हो सके ऐसा दिन-रात विचार करने का उसे अवसर देना चाहिये। मन कहीं विवेक को धोखा देकर भाग न जाये
इसलिये इन दोनों के हाथों में बेड़ियाँ डाल कर इन्हें एक साथ रखना चाहिये ताकि यदि मन विकल्प उत्पन्न करने के
लिये भागना चाहे तो वहाँ विकल्प को नष्ट करने के लिये विवेक तत्पर होकर खड़ा रहे और जहाँ मन अधर्म की
ओर मुड़ना चाहे वहाँ विवेक उसे भगाने के लिये दौड़ कर आ जाये। मन यदि कामक्रोध के पास जाकर बैठता है तो
विवेक उसके केश पकड़ कर उसे पीछे खींचता है। मन यदि निन्दा के पास जाता है तो विवेक उसे चपत मारता है
मन विषय की ओर जाने की बात करता है तो विवेक उसके मस्तक में वैराग्य की लाठी से प्रहार करता है। मन
कल्पना के पीछे भागने लगता है तो विवेक उसे उससे परावृत्त करता है। परस्त्री और पराया धन की इच्छा कर यदि
मन उस ओर दौड़ने लगता है तो विवेक वहाँ जाकर भीषण युद्ध शुरु कर देता है। इस प्रकार मन और विवेक में
झगड़ा प्रारम्भ होकर शिकायत सद्गुरु के सामने आती है। उनका न्याय करने के लिये वह उन दोनों को अद्वैत के
बाड़े में बन्द कर देता है। उस स्थान को देखते ही मन का स्वभाव ही बदल जाता है और मन विवेक के साथ ऐक्य
स्थापित कर लेता है। वहाँ मन भी अपना मनपन भूल जाता है और विवेक मन का आकलन करना भूल जाता है।