श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 655, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६३९
वाला हूँ और दूसरी ओर कोई दुःख भोगने वाला है ऐसी द्वैत वाली बात ही नहीं है क्योंकि संसार का एकमेव
आत्मा वह काल ही है। काल और हमारा आत्मा ये दोनों एक ही हैं। ऐसी स्थिति मे किसका सुख किसे होगा
और कौन किसके लिये शोक मनायेगा ? यहाँ द्वंद्व का दुःख ही नहीं रहता। जिस प्रकार मृगजल केवल नाममात्र
का है, उसमें एक बूँद भी पानी नहीं है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में संसार का जो विस्तार है, वह केवल मन का
भ्रम है। आत्मा एक ही होने के कारण उसमें कोई भेद नहीं है। वही 'काल' के नाम से प्रसिद्ध है। जीव उसी का
अंश होने के कारण वह ज्ञानस्वरूप से शुद्ध है। इसलिये उसे काल आदि की बाधा नहीं है। क्या आग से अग्नि
जलता है, या धूप से सूर्य जलता है ? लहरों की उथल-पुथल से क्या समुद्र डूब जाता है ? या काजल ने अन्धकार
को और अधिक काला किया है ? या हिमालय पर्वत बर्फ से काँपने लगता है ? या घृत डालने से घृत टूटता है ?
यदि यह सब संभव हो तभी काल के प्रयास से आत्मा अनेक द्वंद्व भोगेगा ? कोई स्वयं ही अपने ऊपर कोई
आपत्ति नहीं लाता, उसी प्रकार काल भी आत्मा पर बाधा नहीं ला पाता। इस प्रकार जहाँ एकता के कारण अभेद
रहता है, वहाँ काल की भी पीड़ा नहीं हो पाती। अभेद में द्वंद्व बिलकुल नहीं है, फिर कोप किस पर किया जाय ?
जीव-शिवरूप में केवल मैं ही हूँ। मैं ही आत्मा हूँ और मैं ही काल हूँ। द्वंद्व दुःखों का झमेला मिथ्या है। तब
क्रोध किस पर करूँ ? इस प्रकार विचार करने से काल सुख-दुःख देने वाला सिद्ध नहीं होता क्योंकि सुख-दुःखों
की पीड़ा आत्मा को नहीं होती। 'नायंजनः' आदि श्लोकों में (अ २३ श्लोक ४३) सुख-दुःख के जो छः कारण
बताये गये हैं, उन पर ठीक तरह से विचार करने पर वे आत्मा के लिये बाधक सिद्ध नहीं होते, यह ज्ञात होता है।
इसके अलावा देशवास अथवा त्रिगुणों के गुण से बाधक बनकर आत्मा को पीड़ा देने वाला कोई दिखायी नहीं
देता। आत्मा को किसी से कभी भी पीड़ा होने की सम्भावना नहीं है। लोगों को देह का अहंकार ही बाधक होता
है। यही बात भिक्षु बता रहे हैं।
न केनचित् क्वापि कथंचनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य।
यथाहमः संसृतिरूपिणः स्यादेवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥५७॥
आत्मा गुणों से भिन्न होते हुए शुद्ध है। वह माया से परे तथा आनन्दस्वरूप है। वह परिपूर्ण सच्चिदानंद है।
उसमें द्वंद्व की बाधा नहीं है। आत्ममन्दिर में द्वंद्व प्रवेश करने लायक बाधक हो सके इस प्रकार का कर्म, कार्य
अथवा क्रिया कैसी भी, कैसे भी और किसी से भी नहीं हो सकती। अभेद को द्वंद्व की बाधा नहीं होती, स्वानंद
का दुःख से सम्बन्ध नहीं है, फिर परिपूर्ण के विरुद्ध कौन रहेगा? परमानन्द एक अकेला ही रहता है।
(आशंका) आत्मा के द्वंद्व से संबंध नहीं होता और देह जड़ होने के कारण द्वंद्व नहीं जानता; तो फिर यह जो
सुख-दुःख की अत्यन्त प्रसिद्ध पीड़ा है, वह किसे होती है? (उत्तर) सुख-दुःख का भोग भोगने के लिये और
जन्म-मरण का भोग सहन करने का प्रमुख कारण देहाभिमान है। लेकिन उसका लक्षण भी समझ में नहीं आता।
जिस प्रकार पति के साथ रहकर सुवासिनी स्त्री व्यभिचार करे और उससे उसे गर्भ रह जाय तो वह किसी की
समझ में नहीं आता उसी प्रकार इस अभिमान का आश्चर्य है। वह ज्ञानस्वरूप से एकरूप होकर मिथ्या जीवत्व
दिखाकर अपनी इच्छा से सुख-दुःख भोगता है। जिस प्रकार राजा के आश्रय में रहने वाला कपटी प्रधान
राज्याधिकार के जोर पर अधर्म करता है, अनेक प्रकार से प्रजा का छल करता है, उसी प्रकार अहंकार भी शरीर
में अपने मन की करता रहता है। अग्नि की संगति से लोहा स्वयं अग्नि की ही तरह हो जाता है, उसे हाथ में
कौन पकड़ पायेगा? वह सबको आगे से झुलसा देता है। उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप का अहंकार जब देहात्मता के