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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 869 में से

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पृष्ठ 652

६३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उन्हें परस्पर कोई सुख या दुःख नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा एक ही होते हुए अनेक रूप धारण करता है। जल
में जल की लहरें एक-दूसरे पर गिरती रहती हैं, फिर भी उनमें सुख-दुःख उत्पन्न नहीं होता। उसी प्रकार चराचर
में परमात्मा का वास होता है। परमात्मा एक अकेला होते हुए अनेक रूप धारण करता है फिर भी उसमें
विविधता नहीं है। फिर सुख और दुःख किसका होगा ? आत्मा आनन्दस्वरूप होकर सर्वत्र एक ही है। उसमें
अनेकत्व का जो आभास होता है वह मायामय होकर काल्पनिक है। वह मिथ्या होने के कारण स्वप्न की तरह
है। मृगजल में जल ही दिखायी देता है लेकिन वह पूरी तरह शुष्क रहता है। उसी प्रकार यह जो संसार फैला
हुआ दिखायी देता है वह मिथ्या है तथा समूल माया के कारण है। जहाँ मायामय मिथ्या भेद विभेद रहता है वहाँ
एक अकेला परमात्मा ही रहता है। अर्थात् तब सुख-दुःख नष्ट हो जाते हैं और गुस्सा होने की कोई व्यथा ही
नहीं रह गयी है। जहाँ हमारे आत्मा के कारण ही सर्वत्र एकता है, वहाँ सुख-दुःख नहीं हैं यह ध्यान में रखो।
जहाँ आत्मा को अपना ही अनुभव होता है वहाँ द्वैत का अभाव होता है और जब सुख-दुःख ही मिथ्या हो जाते
हैं वहाँ क्रोध के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता। इस आत्मस्वरूपता को न जान जो सुख-दुःख को वास्तविक
मानते हैं, वे भले ही वेद शास्त्र के ज्ञाता क्यों न हों, लेकिन क्रोध उन्हें समाप्त कर देता है। जब समस्त प्राणिमात्र
में आत्मभाव दिखायी देता है वहाँ कौन किसे दुःख देगा? और कौन किस पर नाराज होगा? क्योंकि सर्वत्र
केवल एक आत्मस्वरूप ही रहता है। इस प्रकार वास्तव में आत्मा सुख-दुःख का प्रदाता नहीं है क्योंकि कोई
कितना भी बड़ा मूर्ख क्यों न हो, लेकिन वह स्वयं को दुःख नहीं देता। अब इसमें से चौथे मत के अनुसार ग्रहों
को दुःख का कारण मानें तो वह भी सच नहीं है। सुनो। तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ।
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।
ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥
देह जननी के उदर में जन्म लेता है, इसलिये उस देह को 'जन' कहते हैं। उस जन्म के समय जो 'लग्न'
रहता है, उस जन्म लग्न के लिये जन्मकाल से ही ग्रहों का परिभ्रमण शुरू हो जाता है। उसमें बारहवें, आठवें,
जन्मस्थ आदि विभिन्न स्थानों पर जो शुभाशुभ ग्रह उपस्थित रहते हैं, वही सुख-दुःख के प्रणेता हैं। किन्तु आत्मा
ग्रहों की गति से अलिप्त ही रहता है। आत्मा का जन्म ही नहीं होता फिर उसे ग्रह की व्यथा कैसे होगी? जहाँ
खेत में बीज डाला ही नहीं गया है वहाँ चूहे क्या खायेंगे? जब घर ही नहीं बना है, तो उसकी छत कैसे जलेगी?
उसी प्रकार जब आत्मा जन्म ही नहीं लेता तो उसे ग्रहों के शुभाशुभ फल कैसे लगेंगे? ग्रहों की ग्रहदशा देह के
पास होती है और आत्मा देहभाव से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार काक कैलास पर नहीं चढ़ता उसी प्रकार
ग्रह भी आत्मा को स्पर्श नहीं करते। जिस प्रकार मक्खी अग्नि का स्वाद नहीं लेती अथवा चील चन्द्रमा पर झपट्टा
नहीं मारती, उसी प्रकार आत्मा को व्यथा देने का सामर्थ्य ग्रहों के पास नहीं होता। आत्मा सभी का एक ही है
अर्थात् ग्रहों का आत्मा भी वही है। ग्रह यदि अपने ही आत्मा को दुःख दें तो यही होगा कि ग्रहों ने स्वयं ही
अपने को पीड़ा पहुँचायी है। देह, जड़, मूढ़ और अज्ञानी है। उस देह को सुख-दुःख का कोई ज्ञान नहीं होता।
कोई स्वयं ही अपने को दुःख नहीं पहुँचाता। इसलिये आत्मा को ग्रहों की पीड़ा कल्पांत में भी नहीं हो सकती।
ग्रहों में वैरभावना है ही। ग्रह ग्रहों को पीड़ा देते हैं। उस सम्बन्ध में भी विवेचन ध्यान से सुनें। ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार शनि का मंगल और सूर्य से बैर है। गुरु और शुक्र एक-दूसरे के शत्रु हैं। उसी प्रकार बुध और चन्द्रमा में
भी बड़ा बैर है। इन ग्रहों में कुछ की गति तीव्र रहती है तो कुछ मंद गति से चलते हैं। कुछ अत्यन्त तीव्र गति से