सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 657, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 657

तेईसवाँ अध्याय ६४१
जायें। हरि की शरण में जाने से जन्म-मरण अपना मुँह भी नहीं दिखाते। जब हरि स्वयं ही अपने भक्तों की रक्षा
करता है तो फिर द्वंद्व की पीड़ा कौन दे सकेगा ? श्रीहरि पूर्णरूप से मोक्षदाता हैं। उसकी शरण में कैसे जायें ? वह
अनंतस्वरूप होते हुए भी स्वयं निर्गुण है। वहाँ कौन जायेगा ? किन्तु हरि का स्वरूप अत्यन्त निर्गुण होते हुए भी,
उसकी सगुण मूर्ति का चिन्तन करने से, यदि वही मूर्ति मन में बस जाय तो भी द्वंद्व से होने वाले सारे दुःखों का
लय हो जाता है। यदि श्रीहरि की सम्पूर्ण मूर्ति मन में न बसती हो तो उनके चरणों का ही ध्यान करना चाहिये।
इससे जन्म-मरण भाग जाता है और भेदभाव भी अपने ही भय से स्वयं भाग जाते हैं। अगर उनके चरणों का भी
ध्यान सम्भव न हो तो केवल नाम-स्मरण करना चाहिये। उस नामस्मरण से यम और काल थर-थर काँपते हैं।
जहाँ हरिनाम का नित्य घोष चलता है, वहाँ मरण का भी मरण हो जाता है। जन्म का मुँह काला पड़ जाता है
और वह शरमा कर भाग जाता है। रामनाम के घोष के आगे भेदाभेद का दुःख ही कितना होता है ? नाम माहात्म्य
की गर्जना करते समय संसार का सारा भय ही उड़ जाता है। जिसकी वाणी निरन्तर नाम की गर्जना करती है,
उसके शब्दों में श्रीहरि का वास रहता है। उसके घर ऋद्धि-सिद्धि पानी भरती हैं, मुक्ति उसकी दासी बनकर
रहती है। स्वयं विकल्परहित, शुद्ध भक्तिभाव से सगुण ध्यान, निर्गुण चिंतन अथवा नामस्मरण आदि में से भक्त
भक्ति भाव से जो भी स्वीकार करेगा, वह सब सद्‌भक्ति से परिपूर्ण होता है। भक्ति भाव से भगवान से प्रीति करने
का नाम ही सच्ची भक्ति है। भक्तिभाव से ही श्रीहरि प्रसन्न होकर साधकों को आत्मशान्ति प्रदान करता है। उस
आत्मशांति के साथ ही करोड़ों द्वंद्वों के दुःख समाप्त हो जाते हैं। सारी सृष्टि परमानन्द से भर जाती है और 'मैं',
'तू' दृष्टि को नहीं दिखायी देता। ऐसे अभेदभाव से श्रीहरि के चरणों की सेवा करने पर मैं स्वयं ही मुझे
भवसागर से तारूँगा। लेकिन जो सचमुच ही श्रीहरि का भक्त हो जाता है उसका संसार ही नहीं होता। इस प्रकार
भिक्षु ने जिस गाथा का वर्णन किया, वह भगवान को बहुत अच्छी लगी। उनका अंतःकरण आनन्द से भर आया
और उन्होंने उद्धव का मस्तक सहलाया। ऐसी जो यह आत्मशान्ति है वह मेरे उद्धव को प्राप्त हो ऐसी भाव
विह्वलता मन में उत्पन्न होकर श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा-
श्रीभगवानुवाच
निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।
निराकृतोऽसद्‌भिरपि स्वधर्मादकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम् ॥ ५९ ॥
जिसके विश्वास से वेदों का निर्माण हुआ, जिसके चरणों से गंगा का उद्गम हुआ, जिसका नाम संसार का
बन्धन तोड़ डालता है वह श्रीकृष्ण अपने मुख से उद्धव को बताने लगा। इसलिये उद्धव के भाग्य की प्रशंसा करनी
चाहिये। श्रीकृष्ण उस पर सन्तुष्ट हुआ और उसने उसके शाश्वत निवास के लिये आत्मशांति का मन्दिर दिखलाया।
उद्धव ! अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो। जो धन का लोभी था उसका धन नष्ट होकर वह धननाश ही उस धन लोभी
पर प्रसन्न हुआ और उसे विवेकसम्पन्न वैरागी बनाया। जो धन लोभी पूरा पेट खा भी नहीं रहा था, जिसका कोई नाम
नहीं ले रहा था, उसे ही वैराग्य ने सर्वश्रेष्ठ बनाया। उसकी बात सदा मेरे मुख में रहती है। उसका नाम मेरे मुख में
रहता है। उसकी कृति का स्वयं मैं ही वर्णन करता हूँ। जो विवेकसम्पन्न वैरागी रहता है वह मुझे अत्यन्त प्रिय रहता
है। वैराग्य जैसा महान भाग्य संसार में और कोई नहीं है। उद्धव ! जो सचमुच विवेक और वैराग्य से युक्त रहता है
वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। विवेक और वैराग्य से जो सम्पन्न हो जाता है, वह मेरा हो जाता है, ऐसा समझ
लो। मैं उसकी बातों के वश में रहता हूँ और वह भी पूरी तरह मुझ पर समर्पित रहता है। लोभी का धन गया, धन