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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 653, कुल 869 में से

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पृष्ठ 653

तेईसवाँ अध्याय ६३७
चलते हैं, तो कुछ वक्र गति से पीछे लौटते रहते हैं। कुछ दूसरे ग्रह मण्डल को भेदकर एक साथ आते हैं। परस्पर
वैरी ग्रह जब एक राशि में एकत्र हो जाते हैं एक ही नक्षत्रचरण में साथ रहने लगते हैं, तो उसमें राहु सूर्य को ग्रस
लेता है और सूर्य चन्द्र का लोप कराकर अमावस्या (काली रात) करा देता है। इस प्रकार ग्रह स्वयं ही परस्पर
पीड़ा देते रहते हैं। किन्तु मैं आत्मस्वरूपी हूँ तथा उनसे भिन्न हूँ अतः मुझे उनके सुख-दुःख से कोई सरोकार नहीं
है। अलंकार यदि तोड़ भी दिये जाएँ तो इससे सुवर्ण को कोई कष्ट नहीं होता। उसी प्रकार ग्रह यदि ग्रहों को
पीड़ा देने लगें तो उसमें आत्मा को सुख या दुःख क्यों होगा? समरभूमि में युद्ध होता है तो उससे भूमि घायल
नहीं होती। उसी प्रकार मैं आत्मस्वरूपी होने के कारण ग्रहपीड़ा से अलिप्त रहता हूँ। रजस्वला स्त्री धरती पर
चलती रहती है उससे धरती को अस्पृश्यता की बाधा नहीं होती। उसी प्रकार ग्रह अन्य ग्रहों को पीड़ा पहुँचाते हैं,
फिर भी मैं सुख-दुःख से अलिप्त हूँ। सारांश, ग्रहों के कारण जो भी सुख-दुःख देहों में उत्पन्न होता है, उससे
मुझ आत्मा को कोई बाधा नहीं होती। जिसे सुख या दुःख का कोई अनुभव ही नहीं होता, उसे कभी क्रोध नहीं
आता। इसीलिये ग्रहों के कारण कोई दुःख नहीं होता। अगर यह कहें कि सुख-दुःख देने वाला कर्म है तो इससे
लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। लेकिन वास्तव में आत्मा केवल निष्कर्म है, उसे जड़ कर्म की बाधा कैसे होगी ?
कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तद्वि जडाजडत्वे ।
देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम् ॥ ५५ ॥
कर्म जड़ होने के कारण अत्यन्त बाधक है और आत्मा ज्ञानस्वरूप होने के कारण अत्यन्त शुद्ध है। उसे
कर्म का दोष बिलकुल नहीं लगता। सूर्य अगर अन्धकार में छिप कर बैठ सके, दावाग्नि को यदि घास में ही
टोका जा सके, अथवा किलनी अपने मुख से दीपक का स्पर्श कर सके, चक्रवाक पर यदि घास का नियंत्रण हो
सके, गड्ढे के कीचड़ से यदि चन्द्रमा पर लेप लगाया जा सके तो कर्म से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख का
बन्धन आत्मा भी स्वीकार कर लेगा। आत्मा कर्माकर्म का संहार करता है और सुख-दुःख की होली जलाता है।
वह कर्मफलों का उपभोग करता है, ऐसा मूर्ख लोग अवश्य मान सकते हैं। स्वप्न में प्राप्त संतति यदि जागृत
अवस्था में किसी से भेंट कर सके तभी कर्म से प्राप्त होने वाले सुख-दुःख आत्मा के लिये भी बाधक होंगे।
जिस प्रकार चींटी अग्नि पर नहीं चलती, उसी प्रकार आत्मा कर्म के फल में लिप्त नहीं होता। जिस प्रकार
आकाश में शस्त्र से छिद्र नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा भी कर्म के फल को स्पर्श नहीं करता। कर्म जो भी कुछ
है वह सब अविद्यात्मक है और आत्मा विद्या-अविद्या से परे है तथा अत्यन्त निर्मल है। उसे कर्म का सुख-दुःख
होता है, ऐसा मूर्ख लोग देह के मोह के कारण मानते हैं। कर्म नितांत जड़ है और आत्मा शुद्ध है। कर्म सीमित है
तथा आत्मा अनंत है। कर्म अपनी कर्मठता के चलते नित्य बन्धनमुक्त है और आत्मा चिदानंदस्वरूप है। कर्म
मिथ्या तथा मायिक है और आत्मा नित्य होकर अमायिक है। कर्म का ब्रह्म से परिचय नहीं है इसलिये जहाँ ब्रह्म
है वहाँ कर्म नहीं रहता। रस्सी को सर्प मान लेने से, जब उसमें सर्प का अंश ही नहीं है तो उसके डसने से विष
कैसे फैलेगा ? उसी प्रकार स्वस्वरूप में कर्म मिथ्या ही है। वह आत्मा के लिये बाधक कैसे हो सकता है ? बाँझ
रानी का लाडला पोता जिस प्रकार राजसत्ता से संसार पर शासन करता है, उसी प्रकार कर्म के सुख-दुःख की
कथाएँ कर्मठों में ही अधिक प्रचलित रहती हैं। सारांश, यहाँ कर्म ही मिथ्या है। वह सुख-दुःख कैसे देगा? यह
निश्चित रूप से जान लेने पर कौन किस पर कोप करेगा? इस प्रकार कर्म सुख-दुःख तो नहीं ही देता, इसलिये
सुख-दुःख काल देता है, ऐसा कहें तो वह भी ठीक नहीं है।