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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 667, कुल 869 में से

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पृष्ठ 667

चौबीसवाँ अध्याय ६५१
मया संचोदिता भावाः सर्वे संहत्यकारिणः।
अण्डमुत्पादयामासुर्मायातनमुत्तमम् ॥९॥
भूतों में एक-दूसरे के प्रति वैरभाव रहता है। जल, पृथ्वी को निगलने के लिये दौड़ता रहता है; तेज
(अग्नि) निश्चित रूप से उस जल का विनाश करता है, तेज को वायु निगल लेता है, वायु को आकाश निगल
जाता है। इस प्रकार भूतों में भी परस्पर प्रेम भाव नहीं होता। उसमें मैं अंतःकरणस्वरूप से स्वयं प्रवेश कर सभी
भूतों को एकत्र लाकर उनकी मर्यादा की रक्षा करता हूँ। मैंने मर्यादा की सीमारेखा बना दी है इसलिये जल पृथ्वी
को घुला नहीं सकता। तेज ही शोषण क्रिया का नख उदक को नहीं लगा पाता। उसी प्रकार वायु भी तेज को
नहीं निगलता और वायु कितनी भी स्वेच्छाचारिता क्यों न करे लेकिन उसे आकाश कभी नहीं निगलता और न
उसकी गति पर ही प्रतिबन्ध लगाता है। इस प्रकार इन सारे महाभूतों ने मिलकर मुझ महापुरुष के रहने के लिये
इस ब्रह्माण्ड का निर्माण किया है। विशाल सप्त आवरणों के साथ विस्तीर्ण स्थान व्याप कर मयूर के अण्डे के
आकार का ब्रह्माण्ड निर्मित किया है।
तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थितौ।
मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चात्मभूः ॥१०॥
इस प्रकार आज जो ब्रह्माण्ड अस्तित्व में है; उसमें स्वयंभू विश्वात्मा रहने वाला मैं नारायण अपनी लीला
से देहधारी बन गया। मेरी उस नाभि में विश्व का आधारभूत नाभिकमल उत्पन्न हुआ और उसमें उत्तम 'आत्मभू'
नामक ब्रह्मदेव का जन्म हुआ। वह उदर में गर्भस्थ रहकर योनिद्वार से इस संसार में नहीं आया था, बल्कि वह
मेरे आत्मा से स्वयंभू ही उत्पन्न हुआ था। इसीलिये ब्रह्मदेव को 'आत्मभू' कहते हैं। ब्रह्माण्ड स्वयं ही विराट् देह
है और विग्रह उसका प्रमुख भाग है। इस प्रकार ब्रह्मदेव मेरे नाभिकमल से उत्पन्न हुआ है। सृष्टि का निर्माण
करने के लिये पद्मनाभ के नाभिकमल में रजोगुण की प्रधानता बढ़ाकर ब्रह्मदेव ने स्वयं ही जन्म लिया।
सोऽसृजत्तपसा युक्तो रजसा मदनुग्रहात्।
लोकान् सपालान् विश्वात्मा भूर्भुवःस्वरिति त्रिधा ॥११॥
इस प्रकार रजोगुण प्रधान ब्रह्मदेव, जन्म से लेकर नाभिकमल में बैठ गया लेकिन वह उसके जन्म का
कारण जो मैं नारायण हूँ, उसे नहीं देख सका। वह स्वयं कमल में बैठा था, इसलिये कमल का मूल नहीं देख
सका। वह रजोगुण में लीन था इसलिये उसे सर्वत्र एकरूप समुद्र का जल ही दिखायी देने लगा। उस कमल का
मूल देखने के लिये उसने समुद्र में डुबकी ली और कितने ही दिन तक वह पानी में ही था फिर भी उसे कमल
के मूल का पता नहीं चला। अन्त में वह पानी के भय से घबरा गया और पानी के बाहर आकर लम्बी साँस लेने
लगा। फिर वह पुनः कमल पर आकर बैठ गया, लेकिन आगे क्या किया जाय, उसकी समझ में नहीं आ रहा
था। वह बोला, “हे अच्युत! दौड़कर आ जाओ और मुझ पर प्रसन्न हो। मुझ पर संसार के प्रति आया अंधत्व दूर
करो। तुम्हारे सिवा मेरा पूरी तरह संरक्षण करने वाला कोई नहीं है।” ब्रह्मदेव आखिर मेरी ही सृष्टि था। बेचारा
रज से अन्धा हो गया था। वह जब नाभिकमल से ही चिपक कर बैठ गया तो मुझे तत्काल उस पर दया आ
गयी। मुझ विश्वात्मा का ही वह पुत्र था लेकिन केवल जड़त्त्व के कारण स्तब्ध होकर रह गया। तब मैंने उस
तपोनिष्ठ को सृष्टि का निर्माण करने का उपदेश दिया। महाकल्पादिक के प्रारम्भ में मैंने अपनी आकाशवाणी से
'तप तव' इन दो शब्दों से श्रेष्ठ ब्रह्मदेव को उपदेश दिया। मेरे उपदेश के अनुसार तप करने के कारण उसके