श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।
नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम् ॥ ५६ ॥
काल शीतकाल में ठंडक की पीड़ा देता है, गर्मियों में गर्मी से त्रस्त रहता है, वर्षाऋतु में जल बरसाता है
और तीन-तीन मंजिल वाले मकानों को ध्वस्त कर देता है। सात-सात दिन तक लगातार अखण्ड वर्षा के कारण
आँख भी खोलने नहीं देता। इसलिये सभी प्राणियों को पीड़ा होती है और खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न हो जाती
है। खाद्यान्न के अभाव के कारण पशु, पक्षी तथा प्राणी व्याकुल हो जाते हैं। उस समय कोई भी सुख-दुःख की
बात नहीं करता क्योंकि उस समय काल ही दुःख देनेवाला होता है। भीषण गर्मी, भीषण सर्दी अथवा अत्यधिक
वायु के साथ काल संसार को खाता रहता है। इसलिये संसार भी काल से थर-थर काँपता रहता है। काल के
पराक्रम की बात सुनकर देवता भी तत्काल काँप उठते हैं। औरों की क्या बात की जाय? साक्षात् ब्रह्मदेव भी
अंतःकरण में काल से भयभीत रहते हैं। अतिवृष्टि और अनावृष्टि के साथ काल अनेक प्रकार के संकटों से लोगों
को पीड़ा देता है और अन्त में प्रलय कर देता है। ऐसा यह महाकाल सृष्टि को दुःख देने वाला है ऐसे बड़े-बड़े
ज्ञानी लोग कहते हैं लेकिन वे अपने ज्ञानी होने के कारण ही मूर्ख बने रहते हैं क्योंकि काल ही ईश्वर है और वह
सबके लिये सुखदायी है। ईश्वर से जो काल को अलग कहता है वह जड़, मूर्ख और अज्ञानी है। काल ही ईश्वर
है, यह जान लो। वह विश्वात्मा है तथा पूर्णरूप से दयालु है। काल योग्य समय पर बारिश करता है तथा संतप्त
हुए लोगों को सुखी करता है और धरती को गीली बनाकर उसे खेती करने के लिये बीज डालने लायक बनाता
है। उस समय यदि शीतल हवा नहीं बहेगी तो बोया हुआ बीज जल कर राख हो जायेगा। इसलिये उस समय
पानी बरसा कर अनाज फलद्रूप करता है। पका हुआ अनाज गीला रहता है और उसे उसी प्रकार संग्रह करना
सम्भव नहीं है, इसलिये ग्रीष्म की गर्मी लाकर अनाज का गीलापन सोख लेता है। इस प्रकार प्राणियों के हित में
जाड़ा, धूप, वर्षा आदि की योजना काल करता है। किन्तु देह स्वयं ही 'मैं' के भ्रम में होने के कारण वही उसे
दुःखदायक मालूम होता है। पुराने वस्त्रों को बदलकर जो आस्थापूर्वक नये वस्त्र पहनाता है, उसी कल्याणकर्ता
काल को मूर्ख लोग शत्रु कहते हैं। उसी प्रकार वृद्धावस्था से जर्जर होकर जो देह विगलित हो जाता है, उसे काल
योग्य समय पर नष्ट कर देता है और तत्काल नया देह देता है। इस प्रकार काल लोगों पर उपकार करता है।
पुराना लेकर जो बदले में नया देता है ऐसे उपकार कर्ता को देह के लोभ से लोभी बने लोग अपकार कर्ता कहते
हैं। मनुष्य जिस भावना से जो भी दृढ़ वासना मन में रखता है, उसी के अनुरूप देह उसे कृपालु काल तत्काल
देता है। पिता आनन्दपूर्वक पुत्र के पुराने वस्त्र उतार कर उसे पहनने के लिये नये वस्त्र देता है, उसी प्रकार
प्रलयकाल संसार को भी नये-नये रूप देता है। काल प्रलयकाल में संसार के सभी पुराने देहों का विनाश कर,
फिर उन सबको कृपापूर्वक नया देह देकर उनका गौरव करता है। इस प्रकार काल कृपालु है। मूर्ख लोग उसे बैरी
कहते हैं। काल स्वयं ही संसार का वास्तविक आत्मा है। वह किसी को भी दुःख देकर छल नहीं करता। देखो!
लोगों की देह पर ही भक्ति रहती है, इसलिये काल भी लोगों की भक्ति के अनुसार एक के बाद एक देह उत्पन्न
करता है और इसीलिये यह जन्म-मरण का झगड़ा बढ़ता है। जो सचमुच ही विदेह भावना की ही इच्छा करता
है, उसका अहम्भाव काल नष्ट करता है और स्वयं आत्मानन्द से तृप्त कर जन्म-मरण का ठिकाना ही तोड़
देता है। जिसकी जैसी बुद्धि होती है, उसके ही अनुरूप काल उसे सिद्धि देता है। किन्तु काल सचमुच ही कृपालु
है, यह बात देह के मोह से अन्धे हुए लोग नहीं जानते। संसार में काल ही हमारा आत्मा है। यह बात जो
आत्मज्ञानी जानता है वहाँ कौन किसका दुःख मानेगा? क्योंकि दूसरा कोई होता ही नहीं है। यहाँ मैं दुःख देने