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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 869 में से

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पृष्ठ 662

६४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत

गुणों से उसे प्रबल किया है। प्रकृति ने अपने गुणों से ही वर्ण, व्यक्ति, रूप, नाम आदि नाना प्रकार के वैभव से
अपने पति को स्वरूप दिया। तब शिव ने अपना पूर्णत्व छोड़कर शिवत्व धारण किया और वह प्रकृति सुहागिन
पतिव्रता रहकर रूप और नाम से शिव की पूजा करती है। उन दोनों के संगम से ही सारा संसार उत्पन्न हुआ है।
लेकिन उसमें तीसरी कोई भी बात नहीं दिखायी देती, और भिन्नता दिखाने का प्रयत्न करने पर भी अनन्य भाव
से स्थापित एकता भंग नहीं होती। सारा त्रिभुवन ढूँढ़ने पर भी तीसरी चीज नहीं दिखायी देती। प्रकृति और पुरुष
से ही सारा संसार भरा हुआ है। दोनों में इतना प्रेम है कि वे अनन्य भाव से एक-दूसरे से चिपके रहते हैं। एक
अणु में भी वे अपनी मालकियत के हक से रहते हैं। यदि पति न हो तो वह पतिव्रता पूरी तरह समाप्त ही हो
जायेगी और पति स्त्री के बिना अस्तित्वहीन हो जायेगा। वह वास्तव में कुछ न होते हुए ही पति बन गया है।
शिव सचमुच सदा निःसंग, बिना कोई कर्म किये ही रहता है। लेकिन उसकी स्त्री अपने प्रेमपाश से उसे वश में
कर उसे अनेक प्रकार के सुख-दुःख भोगने को विवश करती है। इस प्रकार प्रकृति ने अपने पति को गृहकर्म में
उलझा दिया और फिर उस पर प्रपंच का अधिकार जताने लगी। प्रकृति पतिव्रता होती है तथा कभी पति से
वंचना नहीं करती। वह अनेक कर्माकर्म में कष्ट सह कर भी अनेक प्रकार के सुख-दुःख पति को देती है और
आश्चर्य की बात तो यह है कि पत्नी जो कमाती है, वह पति खाता है। कारण यह है कि पत्नी के बिना उसे
एक कौड़ी भी नहीं प्राप्त होती। प्रकृति पतिव्रताओं में बिल्कुल श्रेष्ठ है। उसने अपने गुणों से ही पति को वश में
किया है। वह सुगृहिणी रात-दिन पति से वासना तंतुरूपी सेवई का सेवन कराती है। जब प्रकृति के भय से वह
भी संसार सागर में जलक्रीड़ा करने लगता है, उस समय प्रकृति ही जबर्दस्ती से पुरुष को उसमें डुबाती है।
कभी-कँभी पुरुष भी प्रकृति को डुबोता है। ऐसी प्रकृति की सोहबत में जब पुरुष के पीछे पंचमहाभूत लग जाते
हैं, उस समय वह साकार होकर जन्म-मरण की डुबकी लगाता रहता है। ऐसी प्रकृति के भय से पुरुष पागल बन
गया है और अपना मूलरूप भूल जाने के कारण प्रकृति ने उसे दीनहीन बना दिया है। इस प्रकार पूर्णत्व को
भूलकर वह जीव और शिव का भेद स्वयं ही भोगने लगता है। उसे पुनः उसके मूलस्वरूप में लाने में गुरुराज ही
पूर्णरूप से कुशल हैं। उसके वचन का इतना प्रभाव रहता है कि उसके एक ही शब्द पर जीव का जीवत्व समाप्त
हो जाता है और शिव को शिव पद का स्थान मिलता है। उसका उपदेश भक्तिभाव से सुनने पर अहंकार तत्काल
नष्ट हो जाता है, जन्म-मरण का फेरा टूटता है और संसार का भय दृष्टि को दिखायी भी नहीं देता। जिसकी
कृपादृष्टि से जीव और शिव का बन्धन टूट जाता है माया मिथ्या होकर पूर्णरूप से उड़ जाती है और पूर्णत्व का
भण्डार खुल जाता है। शिव अपना शिवत्त्व भूलकर जब दूर चला जाता है, तभी वह अपने मूलस्वरूप में आने के
लिये जब गुरु से आज्ञा माँगता है तभी उसे उसका मूल शिवस्वरूप प्राप्त होता है। सद्गुरु की ऐसी महिमा है।
उसका वर्णन मैं शब्दों में कैसे करूँ? लेकिन गौरव की वाणी से वर्णन करने के लिये मेरे मुख से साक्षात् गुरुराज
ही बोलते हैं। अतः वर्णन करने का श्रेय मैं अपने माथे कैसे ले सकता हूँ? गुरु ने तो सारा अहंकार ही छीन
लिया है अतः मैं कर्त्ता कैसे हो सकता हूँ? तिस पर ऐसे प्रसंग में यदि मैं अहंता स्वीकार भी करता हूँ तो मेरे
'मैंपन' में गुरु का ही वास है। गुरु के सिवा कोई स्थान रिक्त नहीं है इसलिये 'मैंपन' के माथे पर गुरुराज ही हैं।
मेरा जो 'मैंपन' है वह सद्गुरु स्वयं ही बन गये हैं। अतः हम दोनों का रूप एक ही हो गया है, केवल नाम
अलग-अलग है। वैसे, एका और जनार्दन ये दोनों ऐक्य रूप से एक ही हैं। सर्वत्र जनार्दन ही है, लेकिन वही
उपनाम से एकनाथ हो गया है और उसी के नाम से श्रीमद्भागवत का अर्थ देशी भाषा में बताया। अब तेईसवें
अध्याय के अन्त में भगवान ने उद्धव से यह कहा था कि यदि हमें द्वंद्व भोग प्राप्त हों तो उन्हें शान्तिपूर्वक सहन