श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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किन्तु वास्तव में सूर्य और राहु की भेंट भी नहीं होती और अन्त तक उनका परस्पर स्पर्श भी नहीं होता।
ग्रहमण्डल भले ही तीव्र गति से पूर्व से पश्चिम की ओर जाता दिखायी दे लेकिन सूर्य चन्द्रादि की वास्तविक
गति वैसी नहीं होती। वे अपनी मर्यादा के अनुसार ही चलते रहते हैं (नक्षत्रमण्डल के क्रम के अनुसार पश्चिम
से पूर्व की ओर जाते रहते हैं। वास्तव में वे पूर्व से पश्चिम की ओर नहीं चलते लेकिन केवल वैसा आभास होता
है। सूर्यलोक से लक्ष-लक्ष योजन ऊपर चन्द्रलोक है (तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण और श्रीमद्भागवत की
ऐसी कल्पना है)। चन्द्रलोक से लक्ष-लक्ष योजन की दूरी पर नक्षत्रलोक है। उसके ऊपर दो लक्ष योजन के
अन्तर पर बुधलोक है। उसके ऊपर दो लक्ष योजन के अन्तर पर शुक्र लोक है। सारे दैत्य एक साथ मिलकर
जिसकी नित्य शरण में आते हैं वही दैत्यों का गुरु शुक्राचार्य है। शुक्र लोक से ऊपर दो लक्ष योजन के अन्तर पर
मंगल लोक आकाश में है। उससे ऊपर दो लाख योजन के अन्तर पर देवगुरु निवास करते हैं। इन्द्र, चन्द्र, वरुण,
सूर्य आदि देवता आदरपूर्वक नित्य आकर जिनके चरणों का वन्दन करते हैं, उसी गुरु का वह वृहस्पति लोक है।
उससे भी ऊपर दो लाख योजन के अन्तर पर सूर्यपुत्र शनि का वास है। उससे ऊपर एक लाख योजन के अन्तर
पर सप्तऋषि का निवासस्थान है। जहाँ सप्तऋषियों का समुदाय रहता है, वहीं अरुंधती भी रहती है और उससे
भी ऊपर इन्द्र के वैभव से सुशोभित अमरावती बसी हुई है। वहीं इन्द्र रहता है, ऐरावत पर आरोहण करता है,
मरुद्गण जिसके सभासद हैं, देवतागण ही जिसकी सेना है, जहाँ उच्चैःश्रवा नामक अश्व है, कल्पतरु का मनोहर
बगीचा है। कामधेनुओं के झुण्ड हैं और क्रीड़ा करने के लिये नंदनवन है। जहाँ की सीढ़ियाँ चिन्तामणि की बनी
हुई हैं जहाँ रंभा-उर्वशी सरीखी विलासिनी स्त्रियाँ हैं, जहाँ अष्टनायिकायें नृत्यांगना बनकर रंगसभा में नृत्य
प्रस्तुत करती हैं, ऐसे उस इन्द्र के वैभव से सजी हुई अमरावती का अधिपति इन्द्र है। यहीं स्वर्ग की सीमा
समाप्त होती है। यही सचमुच त्रैलोक्य है। अब इस त्रैलोक्य के बाहर एक लाख योजन के अन्तर पर
भक्तवत्सल श्रीहरि ने अपनी कृपा से ध्रुवमण्डल का निर्माण किया है। त्रैलोक्य में प्रलय ही क्यों न आ जाय
लेकिन ध्रुव को कभी भी अपने स्थान से नहीं हटना पड़ता। वह सदा अटल रहता है। इसीलिये ध्रुवपद को
अटल कहा जाता है। पृथ्वी से एक करोड़ योजन के अन्तर पर महर्लोक है, यह ध्यान में रखो। वहाँ कल्पांत तक
की आयु के लोग रहते हैं। वही उनका वसतिस्थान है और देखो। वहाँ से एक कोटि योजन के अन्तर पर
जनोलोक है। वहाँ जितेन्द्रिय तथा महोयोगी जैसे सनकादिक वास करते हैं। वहाँ से आगे जाने पर दो कोटि
योजन के अन्तर पर तपोलोक है। तपस्वी वैराजदेव ही वहाँ के सच्चे निवासी हैं। वहाँ से ऊपर चार कोटि योजन
के अन्तर पर जो प्रदेश है, वहाँ सत्यलोक है। वहाँ के अधिपति ब्रह्मदेव हैं। वहाँ चारों वेद मूर्तिमंत हैं, सुप्रसिद्ध
सर्व धर्ममूर्तिमंत है। शुद्ध ब्रह्मचर्य मूर्तिमंत है और साक्षात तप भी मूर्तिमंत है। वहाँ गायत्री मूर्तिमंत रहती है, वाणी
मूर्तिमंत रहती है, दया मूर्तिमंत रहती है और उस ब्रह्मदेव के घर में योग भी मूर्तिमंत रहता है। दक्षिणाग्नि,
गार्हपरय तथा आहवनीय इस प्रकार जो तीन अग्नि वास्तव में एकरूप होते हुए भी भिन्न-भिन्न मालूम होते हैं, वे
वहाँ मूर्तिमंत रहते हैं। सत्यलोक में सत्य मूर्तिमंत रहता है, वहाँ असत्य रहता ही नहीं है। वहाँ रहने वाले लोग
कौन हैं, बताता हूँ। गायत्री मंत्र का जाप करने वाले, ब्राह्मणों का चरणतीर्थ प्राशन करने वाले और यज्ञयाग के
निष्काम उपासक वहीं रहते हैं। जिन्होंने ब्राह्मणों का कार्य करते मृत्यु प्राप्त की, जिन्होंने गौरक्षा के लिये अपने
प्राणों की बलि चढ़ा दी जो परोपकार करते-करते दरिद्र बन गये, वही लोग सत्यलोक में गये हैं। जिन्होंने
निष्काम बुद्धि से ब्राह्मणों की सेवा की, जिन्होंने निष्काम बुद्धि से ब्राह्मणों की पूजा की, जिन्होंने निष्काम बुद्धि
से ब्राह्मणों को भोजन कराया, वे सत्यलोक पहुँच गये। जो दीनजनों पर उपकार करने के लिये कृपालु बने, संसार