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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 661, कुल 869 में से

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पृष्ठ 661

चौबीसवाँ अध्याय

हे ओंकारस्वरूप गुणातीत ! तुम्हें नमस्कार है। हे व्यक्तिरहित ! हे अव्यक्त ! तुझमें द्वैत की बात ही नहीं है।
तुम अद्वैत में ही रहने वाले हो। अद्वैत ही तुम्हारा अपना निवास है। वहाँ देवी-देवता आदि का भेदभाव नहीं है।
वहाँ उदय-अस्त नहीं है, क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा को वहाँ कोई स्थान ही नहीं है। वहाँ शब्द के साथ वेद लीन
हो गया। बुद्धि को ज्ञान मिथ्या लगने लगा। वहाँ रत्तीभर भी भेदभाव नहीं है। एक अद्वयानंद ही भरा हुआ है।
ऐसे अद्वैत में प्रकृति पुरुषों की कहानी केवल अज्ञानी लोग ही ज्ञानी होने का ढोंग रचकर बड़ी चतुरता से सुनाते
हैं क्योंकि वास्तव में जहाँ 'मैं' और 'तू' के लिये स्थान नहीं है, वहाँ प्रकृति और पुरुष के लिये स्थान कहाँ मिल
पाएगा ? जिसके गर्भ में आने की भी सम्भावना नहीं रहती, उसकी जन्मपत्रिका बनाकर सुनाते हैं। जिसका जन्म
ही नहीं हुआ उसका श्राद्ध करना क्या उचित है? कोई बाँझ स्त्री के बेटे के विवाह समारोह में चलने के लिये
कहे तो अज्ञानी को यह बात सच और ज्ञानी को मिथ्या लगती है, वही बात प्रकृति-पुरुषों की है। इस प्रकार जो
मिथ्या है उसे सच बना दिया जाय और एक में ही अनेकता दिखाई जाय तो भी उसका एकपन नहीं टूटता। इस
प्रकार एकपन से एक ही होने के कारण वह स्वयं ही अपनी पत्नी बना और पत्नी का पति भी खुद ही बना। यह
विलक्षण प्रेम समझ से बाहर है। जिस प्रकार अर्धनारीश्वर की मूर्ति में जो पुरुष है वही स्त्री रहता है, उसी प्रकार
संसार में प्रकृति और पुरुष एक साथ रहते हैं। वह पुरुष और उस पतिव्रता में एकात्मभाव से अत्यन्त प्रेम है।
एक-दूसरे से अलग रहकर वे एक पग भी नहीं चल सकते। दोनों सदा एक साथ रहते हैं, दोनों का परिधान एक
है, दोनों एक ही सत्ता के अधीन रहते हैं, दोनों एक ही जीव बन कर रहते हैं। दोनों एक ही चीज देखते हैं, एक
ही चीज खाते हैं, दोनों की बातें एक-सी होती हैं और करना भी एक-सा ही होता है। दोनों का प्रेम कितना
अलौकिक है। वे एक-दूसरे के बिना विष भी नहीं खा सकते। वे दूसरे के बिना पानी भी नहीं पीते। एक-दूसरे
के बिना वे अन्धे ही रहते हैं। उसमें पत्नी का कर्तृत्व तो और भी विचित्र है। उस नपुंसक को यह पुरुषत्व प्रदान
करती है और फिर यह सदा उसी के अधीन रहता है। फिर यह उसी की आँखों से देखता है, उसके ही मुख से
बोलता हे, उसके ही कारण यह सुख-दुःख भोगता है, उसके ही कारण बन्ध मोक्ष का स्वाद चखता है। उसके
ही कारण 'मैं ब्रह्म' कहलाता है, उसके कारण यह कर्माकर्म करता है और उसके ही कारण धर्माधर्म के परिणाम
के अनुसार मरण और जन्म भोगता है। उसके ही कारण उसके हाथों पाप होता है, उसके ही कारण उसे पुण्य
प्राप्त होता है, उसके ही कारण उसका महत्त्व बढ़ता है और उसके ही कारण उसका अधःपतन होता है। अब
तक अपनी प्रकृति इस पुरुष ने बढ़ायी और प्रकृति ने भी पतिव्रत धर्म के अनुसार आचरण कर पति को अपने
वश में रखा। इन दोनों का रिश्ता विचित्र है। ये दोनों सगे भाई-बहन थे अथवा वह बाप और वह उसकी कन्या
थी और अधिक विचार करें तो वह उसका पुत्र होता है। इस प्रकार उन दोनों ने अगम्यागमन (जिन स्त्री-पुरुषों
के लिये संभोग निषिद्ध है, उनसे संभोग करना) कर किसी तीसरे का सम्पर्क हुए बिना अनेक लोग उत्पन्न किये।
इस प्रकार अव्यभिचार रूपी व्यभिचार कर संसार का आकार बढ़ाया है। वह शंकर आदि के लिये भी अतर्क्य,
अगोचर और दुर्गम असाध्य है। यह अपनी ही शक्ति प्रकृति के साथ मिलकर शिवत्व के सारे सुख भोगता है।
उसका कोई गाँव नहीं है, ठौर ठिकाना नहीं है, रूप, नाम, काल, समय नहीं है, फिर भी प्रकृति ने केवल अपने