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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 869 में से

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पृष्ठ 659

तेईसवाँ अध्याय ६४३
जीव का जीवत्व नष्ट हो जाता है और अद्वय के योग से सम्पूर्ण परब्रह्म ही बन जाता है। सुवर्ण के सर्पाकार
अलंकार बनाने पर उस पर नाग के ही अनुरूप फन, पूँछ आदि सुशोभित रहते हैं, लेकिन यदि नाग के आकार का
वह अलंकार तोड़ा न जाय तो सुवर्ण सुवर्ण के ही रूप में होने के कारण आग को उसका भान ही नहीं रहता। उसी
प्रकार पूर्ण ब्रह्म जानकर संसार को तोड़े बिना ही जीव जीवत्व भूल जाता है और मन मनस्वरूप से वंचित हो उठता
है। विवेक की ऐसी युक्ति से मन मेरे स्वरूप में प्रवेश करता है। जहाँ मन मनस्वरूप से उद्वेलित नहीं होता, उसी का
नाम मनोनिग्रह है। हे चतुर चित्तचिंतामणि! हे विवेक चक्रवर्त्ति चूड़ामणि! हे भक्तशिरोमणि उद्धव! तुम मनोनिग्रह
करने का प्रयास करो। श्रीकृष्ण मानों प्रेम से पागल हो गया था। उसने कहा—"अरे भाई! तुम यहाँ आदरपूर्वक
मनोनिग्रह करो। जो आदरपूर्वक मन का निग्रह कर मन से उत्पन्न होने वाले भेद का त्याग करता है, उसे, जिस
प्रकार माँ अपने बच्चों को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार शान्ति उसे नहीं छोड़ती। सच्ची आत्मशान्ति यदि मन में रचबस
गयी हो तो उसे किसी प्रकार का भेदभाव पीड़ा नहीं पहुँचाता। जिसे बड़े-बड़े सिद्ध और योगी 'योगसंग्रह' कहते
हैं, वह यही है। संसार की स्फूर्ति छोड़कर चित्स्वरूप की ओर वृत्ति मुड़ती है और जीव-शिव एकसाथ आते हैं,
उसी का नाम है 'योगसंग्रह स्थिति'। ऐसे योगसंग्रह की शान्ति प्राप्त होने पर साधकों को द्वंद्व की बाधा नहीं होती।
लेकिन अब इतना ही पर्याप्त है। सारांश जिस किसी को भी यह भिक्षुगीत की भक्ति प्राप्त होगी उसे द्वंद्वों से मुक्ति
मिल जायेगी।"
य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥६२॥
शान्ति प्राप्त करने के लिये कोटि-कोटि साधन करने पर भी वह नहीं प्राप्त होती। किन्तु इस भिक्षुगीत का
रहस्य मन में रखने से वह साधकों को अपने आप ही प्राप्त हो जाती है। वह योगनिष्ठा और ब्रह्मज्ञान ही
भिक्षुगीत का निरुपण है जो ध्यानपूर्वक इस मन में रखता है, उसके पास शान्ति दासी बनकर रहती है। इस
भिक्षुगीत का गूढार्थ जो शान्त चित्त से ध्यान में रखता है, उसे द्वंद्व की पीड़ा नहीं सताती और आत्मज्ञान से वह
बिलकुल शान्त हो जाता है। भिक्षुगीत के रहस्य के अनुरूप चलने से समाधान होगा इसमें आश्चर्य करने की
बात नहीं है। लेकिन जो केवल भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करेगा, उसे भी द्वंद्व पीड़ा नहीं पहुँचाएंगे। पति अधिक
समय तक दूसरे देश में गया हो तो उसका पत्र पत्नी जिस उत्कंठा से सुनती है, उसी एकाग्रता से भिक्षुगीत सुनना
चाहिये। लड़का घर से भाग गया हो और उसका पता लगने का समाचार जब कोई उसकी माँ को देता है तो भाग
जाने का कारण आदि सुनकर माँ मन ही मन छटपटाती है, विह्वल होती है। ऐसे समय उसके पास जो अन्य
स्त्रियाँ होती हैं वे भी स्नेह से विह्वल हो उठती हैं किन्तु माँ के मन में जो छटपटाहट होती है वह अन्य स्त्रियों में
नहीं होती। उसी प्रकार भिक्षुगीत का श्रवण करते समय जिसका मन द्रवित हो उठता है, जो सात्त्विक वृत्ति से
परिपूर्ण हो जाता है, वह द्वंद्वों के चक्कर में नहीं फँसता। अस्तु! इस प्रकार आदरपूर्वक श्रवण सम्भव न भी हो तो
भी इसका नित्य पठन करने से भिक्षुगीत के प्रभाव से द्वंद्व उसका स्पर्श भी नहीं करते। सिंह के शरीर के दर्प से
ही मदोन्मत्त हाथी भागना शुरु करते हैं, उसी प्रकार भिक्षुगीत के पठन से द्वंद्वों में भगदड़ प्रारम्भ हो जाती है। मन
में लोभरहित होकर, जो साधु-सन्तों के सान्निध्य में भिक्षुगीत सुनेगा, उसे द्वंद्व स्पर्श भी नहीं करेंगे। इस भिक्षुगीत
का अर्थ अथवा इस भिक्षुगीत पाठ का श्रवण करने से यह भिक्षुगीत द्वंद्वों का निवारण करता है। यह मर्म श्रीकृष्ण
को मालूम था। उसने उसे उद्धव के कल्याण के लिये बतलाया। जिस भिक्षु के गीत की फलश्रुति स्वयं श्रीकृष्ण
अपने मुख से सुना रहे हों, उस भिक्षु के भाग्य का क्या वर्णन किया जाय? त्रिभुवन में वही एक धन्य पुरुष है।