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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 869 में से

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पृष्ठ 665

चौबीसवाँ अध्याय ६४९
वही मूल माया का स्वरूप है। वहाँ हम ईश्वर के स्वस्वरूप से ही अपने सामने सन्मुख होते हैं। वास्तव में जो
शुद्ध और अद्वितीय ब्रह्म है, उसमें माया का सम्बन्ध मिथ्या है। किन्तु उस माया ने अभेद में भी भेद उत्पन्न कर
शिव और शक्ति (पुरुष और प्रकृति) अलग-अलग बना दिये।
तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका।
ज्ञानं त्वन्यतमो भावः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४॥
उन दो भागों में प्रकृति का भाग विकारयुक्त है तथा पुरुष का भाग अविकारी है ऐसा श्रीकृष्ण स्वयं बताते
हैं। वहाँ पुरुष स्वयं ही अपनी स्त्री बनता है और स्वयं ही उस स्त्री का पति बनता है। इस प्रकार एक में ही
द्विधाभाव दिखा कर शिव और शक्ति ये दो भाग बना दिये। जिस प्रकार हमारा शरीर एक ही होने पर भी उसमें
दायाँ और बायाँ ये दो भाग होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष ये भाग भी पूर्णरूप से मायिक हैं, ऐसा समझना
चाहिये। अर्धनारीश्वर में जो पुरुष है, वही स्त्री रहता है। प्रकृति पुरुष का भी वही प्रकार है। अर्थात् उन दोनों
का शरीर एक होकर, उनका आत्मा भी एक है। जब पुरुष का भाग छिपाती है तो प्रकृति को स्वेच्छा से नाचने
देती है और जब प्रकृति का भाग छिपाती है तो पुरुष का स्वरूप स्पष्ट दिखायी देता है। प्रकृति और पुरुष के
बीच का भिन्न भाग जब टूटता है तब न पुरुष रहता है, न प्रकृति। उस समय हमारा स्वस्वरूप ही प्रकट होता है।
सारांश, स्त्री-पुरुष व्यक्ति यह भेद ही समूल व्यर्थ है। इस प्रकार प्रकृति मायिक होने के कारण मिथ्या है। उससे
गुण उत्पन्न होते हैं और उन गुणों से संसार उत्पन्न होता है, ऐसा श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः।
मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन च॥५॥
प्रकृति पूर्णतयः गुणमयी है उसे पुरुषदृष्टि प्राप्त होने पर तीनों गुण प्रकट करती है। श्रीकृष्ण यही बात
अपने निरूपण में बताते हैं। सूर्य की दृष्टि पहुँचते ही कमल की कली अलग-अलग पंखुड़ियों से विकसित होती
है लेकिन वे सारी पंखुड़िया उस कली में ही होती हैं, उसी प्रकार प्रकृति ईश्वर की दृष्टि मात्र से ही अपने गर्भ
में गुणों को धारण कर गर्भिणी होती है और सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों को उत्पन्न करती है। जिस प्रकार
बीज पानी से फूल कर द्विदलों को खोलता है और उसमें से तीन पत्तों का अंकुर बाहर आता है, उसी प्रकार मुझ
परमात्मा ने स्वयं पुरुषत्व पाकर तथा प्रकृति को पूर्ण रूप से क्षुब्ध कर तीनों गुण प्रकट किये हैं। सूर्य की किरणों
से जिस प्रकार सूर्यकांत पत्थर से अग्नि प्रकट होता है, उसी प्रकार पुरुष जब प्रकृति का उपभोग करता है तो वह
तीनों गुण प्रकट करती है।
तेभ्यः समभवत् सूत्रं महान् सूत्रेण संयुतः।
ततो विकुर्वतो जातोऽहंकारो यो विमोहनः ॥ ६॥
वे तीनों गुण भिन्न-भिन्न हैं किन्तु उस भिन्नता में भी वे एक साथ बढ़ते रहते हैं। उनके नाम हैं सूत्र, प्रधान
और क्रिया। क्रियाशक्ति में जड़त्त्व होता है। उसमें जो चेतनात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है उसी का नाम महत्तत्त्व है।
यह अलग नाम उसे इसी कारण प्राप्त हुआ है। महत्तत्त्व और प्रधान इन दोनों का स्वरूप एक ही है। वहाँ क्रिया
और ज्ञान का स्फुरण होता है, इसीलिये दोनों के नाम भिन्न हैं। क्रियायुक्त जिस ज्ञान का स्फुरण होता है, वहीं
अभिमान जागृत होता है और तीन गुणों से पूर्ण अहंकार वहाँ उत्पन्न होता है। अहंकार जब भीषण रूप से
उफनता है तो वह शिव को शिवत्त्व का विस्मरण कराता है और देहात्मवाद का पूरी तरह भुलावा देकर जन्म-