श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरण का भोग भोगने को बाध्य करता है। उस अहंकार की सम्मोहक शक्ति संसार के भ्रम से भ्रमित करती है।
अहंकार से किस प्रकार विकार उत्पन्न होते हैं, उसके बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं।
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत्।
तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥७॥
अहंकार अत्यन्त असाध्य है। सत्त्वादि गुणों के अनुसार उसके तीन प्रकार हैं। गुण और अहंता यही बड़ा
संसार है। गुणों का विकार ऐसा है कि पहले सात्त्विक अहंकार उत्पन्न होकर, वह अंतःकरण को प्रकाशित करता
है। वही अनेक देवताओं में विकार उत्पन्न करने वाला है, इसलिये उसे 'वैकारिक' कहते हैं। राजस अहंकार
ज्ञानेन्द्रियों का तथा कर्मेन्द्रियों का प्रकाशक रहता है। राजस तेज का विलास उसे अच्छा लगता है इसलिये उसे
'तैजस' कहते हैं। तामस अहंकार का परिणाम यह होता है कि वह सूक्ष्म परमाणुरूप भूतों को उत्पन्न करता है।
इसीलिये, हे उद्धव! उसे 'भूतादि' कहते हैं। अहंकार का प्रभाव विचित्र है। वह सचेतन को अचेतन (माया) से
जोड़ता है और ज्ञान-अज्ञान से पक्का मेल कराकर बड़े प्रेम से अपना ब्याह रचाता है। जीव ज्ञानस्वरूप है,
उसका जड़ देह के साथ ब्याह करा देता है। अभिमान ही 'ॐ पुण्याहं' कहकर उसे एक करने वाला ज्योतिषी
है। जीव विशुद्ध ज्ञानस्वरूप है तथा उसे हड्डियों के ढाँचे में जकड़ देता है। इस प्रकार अहंकार अत्यन्त उत्पाती
है। वही सात्त्विक, राजस और तामस का चारों ओर विस्तार कर संसार की वृद्धि करता है।
अर्थस्तन्मात्रिकाज्जज्ञे तामसादिन्द्रियाणि च।
तैजसाद् देवता आसन्नेकादश च वैकृतात् ॥८॥
विषय ही महाभूत हैं। तामसगुण ने उन पंचमहाभूतों का एक-दूसरे से मिले बिना अलग-अलग निर्माण
किया है। वे पंचमहाभूत विषयों से उत्पन्न होते हैं। अब उनके ही बारे में बताता हूँ, सुनो। शब्द से आकाश उत्पन्न
होता है, स्पर्श से वायु उत्पन्न होता है, रूप से तेज उत्पन्न होता है और रस से जल उत्पन्न होता है। गंध से कठोर
पृथ्वी का जल में निर्माण हुआ है। इस प्रकार इनका निर्माण अलग-अलग होता दिखायी देने पर भी उनकी परस्पर
एकता भंग नहीं होती। उसका कारण इस प्रकार है—निःशब्द (परब्रह्म) से शब्द का निर्माण हुआ और उसने
आकाश उत्पन्न किया। आकाश में सूक्ष्म स्पर्श उत्पन्न हुआ और उस स्पर्श ने वायु का निर्माण किया। इस प्रकार वायु
में शब्द और स्पर्श इन दोनों का वास रहता है। उस वायु ने रूप उत्पन्न किया और उस रूप से तेज का उदय हुआ।
उत्पन्न हुए उस तेज में शब्द, स्पर्श और रूप इन तीनों का वास रहता है। रूप से रस उत्पन्न हुआ और उस रस से
जल का उद्भव हुआ। इस प्रकार जन्म लेनेवाले जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस का वास रहता है। इस प्रकार
विषयों में विषय मिलकर एक साथ रहते हैं। जल में गंध उत्पन्न होता है और उस गन्ध से शुद्ध पृथ्वी का निर्माण
होता है। ऐसी यह पृथ्वी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच विषयों से युक्त है। ऐसे ये विषययुक्त विविध
पंचमहाभूत जो पहले सूक्ष्म रीति से विलीन हुए रहते हैं, वे ही अब स्थूल रूप लेकर पंचमहाभूत के नाम से प्रसिद्ध
हो जाते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और कान आदि दस इन्द्रिय राजस अहंकार से अपने आप ही उत्पन्न होते
हैं। सत्त्वाहंकार के विकारों से मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आदि चित्तचातुष्ट्य का चमत्कार उत्पन्न होता है और
प्रजापति-इंद्रादि ग्यारह देवतागण इन्द्रियों के अधिष्ठाता बन जाते हैं। वास्तव में महाभूत अत्यन्त जड़ हैं। इन्द्रियाँ
उनकी प्रवर्त्तक हैं, अंतःकरण उनका चालक है तथा देवता कर्म के प्रकाशक हैं। तीन प्रकार की अहंकार वृत्ति
गुणक्षोभ से क्षोभक शक्ति बन जाती है। इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है।