श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
बाईसवाँ अध्याय ५७५
चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः।
जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु॥२१॥
अग्नि, जल और पृथ्वी आँखों को प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं वही सच्चे तत्त्व हैं; ऐसा वे मतवादी मानते हैं
और इन स्थूलों को चेतना देने वाले आत्मा को वे चौथा मानते हैं। उन तीनों के बिना सृष्टि को कभी साकारता
प्राप्त नहीं होगी। सृष्टि को मुख्य रूप से इनके ही कारण नाम, रूप, क्रिया और कारण प्राप्त होते हैं। इसलिये
तीन ही भूत प्रामाणिक हैं, ऐसा उनका मानना है। इस प्रकार तीन भूत और आत्मा चौथा इस प्रकार चार तत्त्वों की
व्यवस्था हो गयी। अब सत्रह तत्त्वों के प्रकार यथार्थ रीति से बताता हूँ, सुनो।
संख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च।
पञ्च पञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः॥२२॥
पाँच विषय, पाँच महाभूत, पाँच इन्द्रिय और मन और आत्मा मिलाकर सत्रह तत्त्व निश्चित हुए हैं। उसी
प्रकार आगे बताये जाने वाले सोलह तत्त्वों को भी ध्यान में रखो। वहीं तेरह तत्त्वों का लक्षण भी भगवान स्वयं
बतायेंगे।
तद्वत् षोडशसंख्याने आत्मैव मन उच्यते।
भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश॥२३॥
सत्रह तत्त्वों का पूरा निरूपण तुम्हें बताया। उनमें मन और आत्मा एक ही हैं। उनका लक्षण सुनो। कथा
सुनाते समय जिस प्रकार हाथ अपने आप हिलते हैं, उसी प्रकार मन की हलचल भी अपने आप होती रहती
है। राजा सिंहासन पर बैठता है, तो राजा कहलाता है और जब वसंत ऋतु में क्रीडा के लिये उद्यत होता है तो
क्या वह राजा नहीं रह जाता? समुद्र में जब ज्वार आता है तो उस समय भी वह समुद्र ही रहता है और उसका
पानी जब शान्त रहता है, उस समय भी वह समुद्र ही रहता है। उसी प्रकार मन के रूप में वह चंचल हो
अथवा आत्मस्वरूप से निश्चल हो तो भी दोनों में जो परमात्मा है उसका स्वरूप नहीं बदलता। इसलिये मन
का जो स्वरूप है वह आत्मसाक्षात्कार के बिना किसी की समझ में नहीं आता। यही मन का प्रमुख लक्षण है।
मन और आत्मा एक हो जाने के कारण, सत्रह में से एक कम हो जाने के कारण जो सोलह तत्त्व बचते हैं वही
सच्चे तत्त्व हैं। उसी प्रकार पाँच इन्द्रिय, पाँच महाभूत और मन को मिलाकर ग्यारह और उसमें जीव और शिव
को मिलाकर सारे तत्त्व तेरह निश्चित किये गये हैं। उद्धव! तत्त्वों के सम्बन्ध में और भी कई मत हैं। उनका
निर्णय भी तुम्हें बताता हूँ।
एकादशत्व आत्मासौ महाभूतेन्द्रियाणि च।
अष्टौ प्रकृतयश्चैव पुरुषश्च नवेत्यथ॥२४॥
जहाँ ग्यारह ही तत्त्व बताये गये हैं वहाँ पाँच इन्द्रिय, पाँच महाभूत और जीव, शिव तथा मन को एक ही
रूप मान कर ग्यारह तत्त्व माने गये हैं। सुगन्ध, मृदुता और पीतवर्ण ये तीनों गुण चम्पा के फूल में एकत्र मिलते
हैं या सुवास, मिठास और उत्तम रंग ये तीन गुण जिस प्रकार आम में एकत्र रहते हैं, अथवा जिस प्रकार सुवर्ण
के मणि सुवर्ण की ही तार में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार जीव, शिव और मन ये तीनों एक रूप ही हैं। पाँच
इन्द्रिय, पाँच महाभूत और जीव, शिव और मन मिलाकर एक, इस प्रकार ग्यारह तत्त्व इसी उद्देश्य से निश्चित
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किये गये हैं। इसके अतिरिक्त प्रकृति, पुरुष, महत्, अहंकार और अविकृति ये पंच महाभूत, इन नौ में सभी
विकार समुदायों का अंतर्भाव होता है। उसी प्रकार, उद्धव! ऋषिवर्यों के तत्त्वसम्बन्धी विचारों के अनुसार यह
संख्या नौ है। उसी प्रकार कुछ आत्मज्ञानी प्रकृति और पुरुष को दो ही तत्त्व मानते हैं क्योंकि इनके अतिरिक्त
कोई तीसरा तत्त्व जन में या वन में कहीं दिखायी नहीं देता। इससे भी अधिक जिनका निश्चय दृढ़ है वे कहते हैं
कि तत्त्व एक ही है। वही एक तत्त्व अनेक रूपों में भासित होता है। वास्तव में देखा जाय तो सब में एक ही
तत्त्व भरा हुआ है। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार में मूल सुवर्ण तो होता ही है, उसी प्रकार अनेक में ऐक्य रूप
से सचमुच एक ही तत्त्व होता है। जिस प्रकार गन्ने की मिठास गुड़ और चीनी में बढ़ती मात्रा में रहती है, उसी
प्रकार आत्म तत्त्व के सारे तत्त्व प्रकार हैं। उस आत्मतत्त्व को जानने के लिये श्रेष्ठ ऋषियों के अनेक मत हैं।
उनमें से बहुत ही कम मैंने यहाँ बतलाये हैं अन्यथा ग्रन्थों में उनकी संख्या असंख्य है।
इति नानाप्रसंख्यानं तत्त्वानाम्ऋषिभिः कृतम्।
सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम्॥ २५ ॥
लेकिन उनमें जो सर्वज्ञ और ज्ञानी होते हैं, वे मन में अनेक मतों का विचार कर तथा तत्त्वों का वास्तविक
स्वरूप ध्यान में रखकर उनके विभाग करना जानते हैं। आत्मतत्त्व जानने के लिये तत्त्वों का विचार करते समय
तत्त्वों की संख्या कम या अधिक है यह कहने में दोष नहीं लगता है। वास्तव में देखा जाय तो विकारों के
सम्बन्ध में ज्ञाता को बोलने लायक कुछ भी नहीं रहता क्योंकि विकार प्रकृति में रहते हैं। आत्मा शुद्ध अविकारी
ही है। प्रकृति से आत्मा भिन्न है। इसलिये वह अविकारी ही है, यह ध्यान में रखो। सारे विकार प्रकृति में ही हैं,
यही तत्त्वों का प्रमुख लक्षण है। इसलिये हे उद्धव! प्रकृति से पुरुष की भिन्नता जानने के लिये हमें तत्त्वों का
विचार करना चाहिये। कृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव को चमत्कार लगा और उसने विचार किया क्यों न
प्रकृति और पुरुष की भिन्नता के बारे में भगवान से ही पूछा जाय?
उद्धव उवाच
प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ।
अन्योन्यापाश्रयात्कृष्ण दृश्यते नभिदा तयोः॥ २६॥
प्रकृति और पुरुष भिन्न-भिन्न क्यों हैं? यह गहन प्रश्न उद्धव ने भगवान से साढ़े तीन श्लोकों में पूछा।
उद्धव मन में सोचने लगा कि यदि प्रकृति से पुरुष भिन्न है तो फिर इन दोनों से अलग श्रीकृष्ण दोनों का ही
साक्षी है। इसलिये उसने कहा, हे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण देवाधिदेव! लक्ष्मीपति! इसका अर्थ यह है कि प्रकृति और पुरुष
के व्यापार अलग ढंग से देखने वाले तुम एक निराले ही साक्षी हो क्योंकि प्रकृति और पुरुष ये दोनों भिन्न ही हैं।
एक जड़ है और एक चेतन है, यह मैं भी समझता हूँ। लेकिन वे अलग क्यों हैं, यह समझ में नहीं आता। जिस
प्रकार लौह का तप्त गोला बिलकुल अग्नि का सा दिखायी देता है, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष का समन्वय
ऐक्य रूप में बिलकुल दृढ़ हुआ रहता है। जिस प्रकार बीज को पेट में रखकर कणरहित अनाज का छिलका
बढ़ता रहता है, उसी प्रकार प्रकृति भी पुरुष के साथ समरस हो जाती है। अथवा पेट में उत्तम गरी रख कर नीरस
और कनेर करोंटी बड़ी होती है। उसी प्रकार पुरुष के बल पर प्रकृति भी बड़ी होकर विशाल सृष्टि उत्पन्न करती
है। दाने के बिना जिस प्रकार छिलका बड़ा नहीं होता, उसी प्रकार पुरुष के बिना प्रकृति भी दृष्टिगोचर नहीं
होती। अतः प्रकृति-पुरुष की यह पहेली तुम्हारे सिवा कोई हल नहीं कर सकता। सीप के शरीर पर जिस प्रकार
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चाँदी की कांति है उसी प्रकार संसार में पुरुष के संग से प्रकृति का भी भास होता है। प्रखर सूर्य किरणों के योग
से जिस प्रकार मृगजल की बड़ी नदी का भास होता है, उसी प्रकार पुरुष के योग से सचमुच प्रकृति का भास
होता है। जिस प्रकार आकाश की नीलिमा आकाश से भिन्न नहीं दिखायी देती, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुषोत्तम
में हमें भिन्नता नहीं दिखायी देती। देह का जो देहपन है वही प्रकृति की बाध्यता है। लेकिन इस देह से अलग
पुरुष का भान दिखायी ही नहीं देता। 'मैं' के अनुभव को आत्मा कहते हैं, लेकिन वह स्फूर्ति भी देह के आकार
के कारण होती है। हे गोविन्द ! देह से अलग आत्मा की प्रतीति वास्तव में नहीं होती। हे गोविन्द ! यदि आँखों के
बिना दृष्टि सम्भव हो, बाती के बिना लौ जले तभी देह के बिना आत्मा का स्फुरण होगा। गोविन्द ! जिह्वा के
बिना यदि स्वाद मालूम हो सके, कान के बिना शब्द सुनायी दे, तभी देह के बिना आत्मा का बोध स्पष्ट हो
सकेगा। हे गोविन्द ! यदि कांटे के बिना कटहल मिले अथवा छिलके के बिना गन्ना बढ़े तभी देह के बिना आत्मा
मिलेगा। ब्रह्मप्राप्ति का कारण नरदेह है, यह आत्मज्ञान का मर्म आपही ने बताया और अन्त में देह के बिना
आत्मदर्शन होता है यह भी आपही प्रतिपादित करते हैं। आत्मा के बिना प्रकृति किसी भी प्रकार से व्यक्त स्वरूप
में नहीं आती। स्वरूप के बिना छाया अलग किस प्रकार दिखायी देगी? मिठास से यदि शक्कर अलग की जा
सके, सुगन्ध से कपूर अलग हो जाये तभी आत्मा के बिना प्रकृति दिखायी देगी। माधुर्य के बिना यदि ईख बढ़े,
दाने के बिना छिलका बढ़े तभी आत्मा के बिना मूर्तिमंत माया भी व्यवस्थित ढंग से आकार प्राप्त करेगी। आत्मा
का स्वरूप प्रकृति के लक्षणों से ही मालूम होता है और आत्मा ही प्रकृति को प्रकाशित करता है। इनका संयोग
अनादि काल से चलता चला आ रहा है। फिर उनका बोध अलग-अलग कैसे होगा? प्रकृति से भिन्न आत्मा हमें
कहीं नहीं दिखायी देता। इसी अर्थ की विनती उद्धव स्वयं कर रहा है।
प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ।
एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।
छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणैः ॥ २७॥
हे कमलनाभ ! हे कमलवदन ! हे कमलधाम ! हे कमलधरा ! हे कमलिनीनिवासा ! हे कमलनयन श्रीकृष्ण !
प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध अत्यन्त कठिन है। उनका स्पष्ट निर्णय योगियों की समझ में भी नहीं आता। इसी
सन्देश का विराट वृक्ष हृदय में बढ़ रहा है। हृदय में संशय की जड़ें जमीं, जो प्रकृतिरूपी भूमि पर पड़ीं, उस पर
विकल्प का पानी गिरा। उसके बल पर संशयरूपी वृक्ष बढ़ा और उसे अहंकाररूपी फल सर्वकाल लगने लगे।
उस वृक्ष के फल खाये बिना इस जीव को कभी चैन नहीं पड़ता। इससे सन्देह अधिक बलवान होता है और
चित्त को कभी विश्राम नहीं मिलता। अतः ऐसे वृक्ष को आप कृपया तोड़ डालें। ज्ञान के तीन प्रखर बाण छोड़कर
तुम स्वयं उसकी जड़ें और पत्ते उखाड़ दो। हे गोविन्द ! कितने ही योग साधन और याग किये, कितने ही शास्त्र
पढ़े, अथवा धर्म कर्म के कितने ही प्रयास किये लेकिन इस वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं टूटा यह बहुत बड़ा
संकट है। उस वृक्ष को तोड़ते-तोड़ते ब्रह्मदेव भी सन्देह में पड़ गया, इसीलिये तुमने हंसगीत कहकर अपने
सत्पुत्रों का उद्धार किया। जब साक्षात ब्रह्मदेव की यह दशा हुई तो औरों की क्या बिसात ? इसलिये इस वृक्ष को
तोड़ने वाला, तुम्हारे सिवा और कोई नहीं है। इसे यदि ऊपर से ही तोड़ा जाय तो वासना की जड़ें शेष रहती हैं
और फिर वह पहले से भी अधिक जोश से बढ़कर उसका विस्तार बहुत ही बड़ा होता है। इसलिये इसका मूल
गड़्ढा ही उखाड़ कर फेंकने वाले एक तुम ही हो। तुम्हारे सिवा कोई ज्ञाता इस सन्देह का नाश करने वाला नहीं
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है। अब तुम कहोगे कि सन्देह का उद्भव तो हृदय में होता है और वहाँ तक शस्त्र भी नहीं पहुँचता तो मैं उसे
कैसे छेद पाऊँगा ? उसके बारे में भी बताता हूँ। तुम्हारे ही शब्दरूपी तेज से दीप्त तुम्हारा ज्ञानस्वरूप चक्र बड़ा
अलौकिक है। हे श्रीकृष्ण ! सन्देह का समूल छेदन करने वाला तुम्हारा एक वचन ही है। तुम्हारा भाषण
ज्ञानस्वरूप होने के कारण तुम्हारे कृपावलोकन मात्र से ही सारे संदेह का निर्दलन हो जाता है। तो हे मुकुंद ! तुम
मुझे सन्देह की इस पीड़ा से मुक्त करो। उद्धव के इस भाषण पर गोपियों के आराध्य श्रीकृष्ण ने 'मैं ही हूँ।' ऐसा
कहने का क्या कारण है ? तो उसका उद्देश्य भी सुनो।
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्रशक्तितः।
त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापरः ॥ २८ ॥
तुम्हारी माया शक्ति अतर्क्य है। इसलिये वह आनन्द की जितनी भी ऊर्मियाँ आती हैं, उन्हें रोककर विषय
की दृढ़तर आसक्ति लगा देती है। इससे जीव अज्ञानी हो जाते हैं। विषय का चिन्तन करते हुए जीव मन के
अधीन होकर रह जाता है और वह मन उसे दुर्बल, दीन-हीन, कंजूस, जड़ और मूढ़ बना देता है। ऐसे सम्पूर्ण
अज्ञानी जीव, केवल तुम्हारी कृपा से ही ज्ञानसम्पन्न हुए हैं। यह तुम्हारी ही परिपूर्ण कृपा है। हे श्रीकृष्ण ! जब
तुम्हारी पूर्ण कृपा होती है तो जीव तुम्हारे ही सामर्थ्य से माया का निर्दलन कर पूर्ण ब्रह्मत्व को प्राप्त करते हैं।
अब शायद तुम यह कहोगे कि मेरी गाँठ में न ज्ञान है और न अज्ञान ही है। फिर भी तुम स्वयं ही पूर्ण ज्ञानदाता
बन गये हो। उसके सम्बन्ध में सविस्तार सुनो। ब्रह्मदेव, सूर्य, सनत्कुमार, नारद, प्रह्लाद, अम्बरीष आदि तथा
प्रसंगानुसार अर्जुन को भी तुमने उपदेश किया है। तुम ऐसे ज्ञानदाता हो। तुम कहोगे कि संसार में ज्ञानसम्पन्न
लोग अनेक हैं, उनसे पूछ कर ज्ञान प्राप्त किया जाय ! लेकिन तुम्हारे सिवा माया पर नियंत्रण किसी और से नहीं
होगा। माया की उत्पत्ति, स्थिति और माया के निर्द्दलन के बारे में जानने वाले त्रिभुवन में एक तुम ही हो।
इसलिये हे श्रीपति ! मुझ पर कृपा करो। इस प्रकार उद्धव ने विनती के रूप में श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। अब
श्रीकृष्ण उद्धव को प्रकृतिपुरुष के विभाग विशद करके बतायेंगे। सूर्य से जिस प्रकार मृगजल उत्पन्न होता है,
अथवा आकाश से बादल उत्पन्न होता है, अथवा काँच की फर्श पर जल का भास होता है, उसी प्रकार पुरुष से
यह महाबली प्रकृति उत्पन्न होती है। इस प्रकार श्रीकृष्ण स्वयं प्रकृति-पुरुष का निरूपण समूल बता रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ।
एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २९ ॥
देखो ! प्रकृति और पुरुष ये दोनों निरन्तर भिन्न ही हैं। जिस प्रकार दिन और रात में एक का लोप होने पर
ही दूसरे का उदय होता है, दिन अस्त होते ही परिपूर्ण अन्धकार से युक्त रात्रि नक्षत्र और समस्त ग्रहों के साथ
बड़े उत्साह से प्रकट होती है। उसी प्रकार पुरुष का भान लुप्त होते ही प्रकृति कार्यों के साथ सत्त्वादि गुण लेकर
और ज्ञान-अज्ञान से परिपूर्ण होकर प्रबल होती है। इसमें प्रमुख रूप से देह का आकार ही प्रकृति का बड़ा किला
है। उसमें देहरूप अहंकाररूपी योद्धा ही किलेदार है। वही प्रकृति का सखा और मित्र है। प्रकृति उसी पर
सर्वाधिक विश्वास करती है। किले के ओर से लड़ने वाला वही एक है। वहाँ की सारी जिम्मेदारी वह अपने
माथे पर लेता है। इसीलिए उस अभिमान ने ही स्वयं होकर प्रकृति को अभय देकर और विकारों की सारी
सामग्री एकत्र कर महाभयानक किले पर अधिकार कर लिया है। हे नरपुंगव उद्धव ! सुनो। अपनी प्रकृति की
बाईसवाँ अध्याय ५७९
भक्ति से यही अभिमान देहरूप किले में प्रबल होकर सरजोर बन जाता है। देहरूप किले में तीन गुण और
अहंकारादि विकार की सामग्री भरी रहती है। यह वास्तविक प्रकृति है जो देहाकार दिखाई देने लगती है।
आकाश में आभासित गंधर्व नगर में अट्टालिकाएँ, शिखर, जंगल, बाग आदि दिखायी देते हैं, उसी प्रकार प्रकृति
स्वयं नाना रूपों में भासमान होती है। मृगजल की नदी दूर से बड़े प्रवाह के रूप में बहती दिखायी देती है, उसी
प्रकार प्रकृति के नाना प्रकारों का आभास होता है। इस प्रकार प्रकृति का यह किला अत्यन्त भयंकर है और
उसमें अहंकार कैसे-कैसे विकारों की सामग्री भर देता है, उसके सम्बन्ध में बताता हूँ।
ममाङ्ग माया गुणमप्यनेकधा विकल्पबुद्धींश्च गुणैर्विधत्ते ।
वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥ ३० ॥
मेरी माया ही स्वयं स्वरूप से त्रिगुणात्मक हो गयी है। लेकिन वे तीनों गुण, अभिमान ने अपने अधिकार
में रखे हैं। उसी देहरूपी किले के सामने उन तीन गुणों की खाई खन कर तथा त्रिपुटी की सुव्यवस्थित रचना कर
अभिमान भयानक मारकाट करता रहता है। उस किले की सुरक्षा त्रिपुटी करती है। उस त्रिपुटी का मूल स्वरूप
भी अब मैं तुम्हें बताता हूँ। हे बुद्धिमान उद्धव ! उस देहरूपी किले के तीन मार्ग हैं उसमें दो चोर रास्ते हैं और
एक सरल रास्ता है। उन सभी रास्तों के बारे में मैं तुम्हें बताता हूँ। उस मार्ग में दस स्थानों पर सेना खड़ी रहती है
और अन्त में युद्ध करने वाला सैनिक खड़ा निरीक्षण करता रहता है। वे मार्ग चारों ओर से अवरुद्ध रहते हैं और
तीन मार्गों पर रक्षक रहते हैं। फिर ऐसी जगह अत्यन्त कष्ट से जाने की ज्ञानी को क्या आवश्यकता है ? देहरूपी
किले पर कठोर सामग्री की व्यवस्था है। कार्य, कारण और कर्तव्यता; कर्म, क्रिया और अहं यह कर्त्ता; ध्येय
ध्यान और विषयों का ध्यान करने वाला; इस त्रिपुटी से यह किला बिल्कुल सुदृढ़ है और उसमें भोग्य, भोग
और भोक्ता; कर्म, कार्य और कर्त्ता; यह अभिमान प्रवृत्ति की सहमति से वहाँ अधिकार जमा कर बैठा हुआ है।
वह चोरद्वार से देखता रहता है और काम क्रोध की खिड़की खोल कर एकाएक हमला बोल देता है। तब सारे
लोग थरथर काँपने लगते हैं। उनकी दहशत से तपस्वी लोग इधर-उधर भागने लगते हैं। लंगोटी छोड़ कर
दिगम्बर घूमने वालों को भी क्रोध थर-थर कँपा देता है। लोभरूपी तोपखाना शुरू होकर गोलों की आवाज होने
लगती है, जिससे चारों ओर अज्ञान का धुआँ फैलने लगता है। महामोह के धुंध से दिशाएँ भर जाती हैं और कहीं
कुछ दिखायी नहीं देता। इस किले के चारों ओर नौ बारादरी रहती हैं, उन्हें दाग कर विषय गोलाबारी करते रहते
हैं। देहाभिमान का मुख्य चालक है, मन। उसकी मार महाभयंकर है। वह किसी भी तरह पीछे नहीं हटता और
किले के बंदोबस्त अपने हाथ में रखता है। इसलिये जब शत्रु भी सीढ़ी चढ़कर शीघ्रता से आगे बढ़ते हैं तो उस
दसवें द्वार का मार्ग भी किवाड़ लगाकर बन्द किया रहता है। इस प्रकार मन स्वयं ही इस देहरूपी किले की
सुरक्षा करता है और उसका अंतर्बाह्य संरक्षण करने के लिये स्वयं ही नीड़ बनाता है। काम का हाथ पकड़ कर
वही मन शत्रु से मुकाबला करता है और उसकी अगली पंक्ति के वीरों को धराशायी कर देता है। इस प्रकार मन
की मार अत्यन्त कठिन है। उसने अपने त्रिविध ताप से लोगों को जर्जर कर हाय-हाय करने के लिये बाध्य कर
दिया है। देवताओं से जो ताप होता है उसे आधिदैविक, मन से जो ताप होता है उसे आध्यात्मिक और
पंचमहाभूतों से जो ताप होता है, वह भौतिक, इस प्रकार ताप तीन प्रकार के होते हैं। महाभूत सत्त्वगुण से
अंतःकरण, रजोगुण से इन्द्रिय तथा तमोगुण से विषयभाव की उत्पत्ति करते हैं, यह ध्यान में रखो। इसके
अतिरिक्त इन तीन गुणों से नाना विकार उत्पन्न होते हैं, उसका कारण यह प्रकृति ही है। इस प्रकार इस किले पर
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पूरी तैयारी है और इसी कारण यह प्रपंच इतना फला फूला है। संकल्परूप महापर्जन्य के जल से तथा
वासनारूपी उदक से यहाँ की टंकियाँ भरी हुई हैं इसलिये किले में रहने वाले लोग यही पानी पीकर संसार के
सुख-दुःख में विहार करते हैं। अब इस किले के नौ द्वारों में से किसमें आधिदैव, आधिभूत और अध्यात्म है वह
भी बताता हूँ। किस द्वार में कौन-सा यंत्र रहता है, उसका चालक कौन रहता है, उसकी रचना कैसी है और
उससे विषयों का प्रहार कैसे होता है, यह भी सुनो।
दृग्रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति यः स्वतः खे।
आत्मा यदेषामपरो य आद्यः स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ॥ ३१॥
नेत्रेन्द्रिय एक बहुत बड़ी तोप है। वह स्त्रीस्वरूप की मार करती है और उस प्रहार से मर्मस्थान का भेद हो
जाने के कारण कोटि-कोटि सुरनर घायल हो जाते हैं। नेत्र गोल इन्द्रिय शरीर में और इस इन्द्रिय की अधिष्ठात्री
देवता सूर्य है इसलिये वह देखे हुए स्वरूप को अपने में अंकित करती है। वही सच्चा अध्यात्म है। नीला, पीला
आदि जो स्वरूप का आभास दृष्टि को होता है, वह दृष्टि को दृश्य का भान होना ही वास्तविक अधिभूत है।
अधिदैव सूर्य सिद्ध है, दृष्टि के सामने अधिभूत रखा हुआ है और शरीर में नेत्रगोल भी हैं, लेकिन यदि दृष्टि में
अध्यात्म तेज न हो तो अंधत्व ही रहता है। अधिदैव और अधिभूत होते हुए भी जब तक दृष्टि में अध्यात्म तेज
नहीं है, तब तक कुछ भी देखना सम्भव नहीं होता। वहाँ अंधत्व कायम ही रहता है। अथवा अध्यात्म और
अधिभूत दोनों हों और अधिदैव रूपी सूर्य अस्त हो गया हो तो भी आँखों का देखना अंधकार में लुप्त हो जाता
है। उस समय यदि बत्ती जलाकर प्रकाश भी किया जाय तो उसका प्रकाश सूर्य की तरह नहीं होता। चन्द्रोदय भी
सूर्यपकाश की बराबरी नहीं कर सकता। सूर्य रात्रि को समाप्त कर दृष्टि की सहायता करता है इसीलिये सूर्य को
अधिदैव कहते हैं। अध्यात्म और अधिभूत ये दोनों हों और अधिदैव सूर्य ही न हो, तो दृष्टि का कुछ बस नहीं
चलता। अध्यात्म और अधिदैव ये दोनों हों और गुरु की पूर्ण कृपा हो और अधिभूत का दृश्य दर्शन बन्द होता है,
तभी सचमुच ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। यहाँ जो अपने दृश्य का दर्शन होता है, उससे देह ही सब कुछ है, यह
देहबुद्धि दृढ़ हो जाती है। उस दृश्य का ही भान नष्ट करने से, देह के साथ संसार ही शून्य लगने लगता है। इस
प्रकार अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत यह त्रिपुटी किसे कहते हैं यह तुम्हें उसके विभागों के साथ विस्तारपूर्वक
बताया। इसमें त्रिपुटी का अर्थ स्वरूप अर्थात् दृश्य, द्रष्टा और दर्शन, कर्म, कर्त्ता और क्रिया का आचरण ध्येय,
ध्यान और ध्यातृत्त्व से है। इन्हें त्रिपुटी कहने का अर्थ यही है कि ये एक-दूसरे से सापेक्ष हैं। इसलिये अब
उनकी परस्पर अपेक्षाओं के लक्षण भी बताता हूँ। नाना प्रकार के सुखोपभोग होते हैं और उन्हें देखने के लिये
दृष्टि भी सक्षम रहती है। लेकिन वह सूर्य के बिना व्यर्थ ही रहती है। ऐसा यह परस्पर सम्बन्ध है। सूर्य हो किन्तु
आँख न हो तो भी दिखायी नहीं देता या आँख हो और सूर्य न हो तो भी कुछ भी नहीं दिखायी देता या सूर्य और
दृष्टि दोनों हो किन्तु देखने के लिये कुछ न हो तो भी दोनों का सामर्थ्य व्यर्थ हो जाता है। सूर्य स्वरूप को व्यक्त
करता है और अपने किरणों से दृष्टि में प्रवेश कर नाना प्रकार के आभास दिखलाता है। इसलिये यह देखने का
कार्य एक-दूसरे पर निर्भर है। लेकिन इतना होते हुए भी सूर्य अलिप्त होकर आकाश मण्डल में रहता है। उसी
प्रकार इस विश्वस्वरूप को व्यक्त करने वाला चिदात्मा सचमुच अलिप्त ही रहता है। वह इस जगत में भरा हुआ
है तथा जगत के हृदय में रहता है। यह सारा संसार उत्पन्न हो या उसका लय हो जाय लेकिन वह वैसा ही रहता
है। जिस प्रकार आकाश में हजारों घटाकाश निर्माण होने पर भी उन घटों में आकाश प्रत्यक्ष रूप से दिखायी ही
देता है। वे घट ही रहते हैं और समाप्त हो जाते हैं, लेकिन जैसा रहना चाहिये, वैसा ही रहता है। उसी प्रकार
चित्स्वरूप, परमात्मा श्रीपति उत्पत्ति, स्थिति और लय इन अवस्थाओं में अलिप्त ही रहता है। वह परमात्मा आदि
का अनादि है, बुद्धि की अनादि बुद्धि है और वास्तव में सिद्धि की अनादि सिद्धि भी वही परमात्मा है। प्रकाश
का प्रकाशक यही है, सूर्य का आदिसूर्य भी यही है; और त्रिपुटी का द्योतक भी यही परमात्मा है और वह
अलिप्त है। विवेक का भी विवेक यह है, सुख का सुखदायक भी यही है, बुद्धि का बोधक और प्रकाश का
प्रकाशक भी यही परमात्मा है। ज्ञानाभिमान से उसे जानने के लिये गये वेद भी लज्जित हो गये, स्मृति और पुराण
तो पगला गये। शास्त्र पठन से वाद-विवाद करने पर भी वह समझ में नहीं आता। देव, देवी और देवता; भोग्य,
भोग और भोक्ता; इस प्रकार नानाप्रकार की त्रिपुटी की जो त्रिगुणता उत्पन्न होती है, वह यह प्रकृति ही कराती
है। यह परमात्मा आदि, अव्यक्त और अतर्क्य है तथा प्रकृति से भिन्न है। उसे जानने के लिये दूसरों के विचार
उपयोगी नहीं है। इसे इसके ही सामर्थ्य से हृदय में देखना चाहिये, इसके ही योग से इसे परिपूर्णत्त्व से पहचानना
चाहिये, इसका ही हाथ पकड़ कर इसे प्राप्त करना चाहिये और वह भी उसकी ही कृपा से प्राप्त होता है। यह
स्वयं ही स्वप्रकाशित है। इसके ही प्रकाश से इसे देखें और इसके ही योग से इसके स्वरूप में मिल जायें।
अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत आदि का वर्णन नेत्र द्वारा यहाँ बतलाया, उसी प्रकार अन्य इन्द्रियों में भी उनकी
व्याप्ति किस प्रकार होती है, इसका वर्णन देव संक्षेप में करेंगे।
एवं त्वचादि श्रवणादि चक्षुर्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्।
योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलान्महतः प्रसूतः ॥ ३१ ॥ (अ)
प्रकृति से महत्तत्त्वादि द्वारा अनेक विकार फैलते हैं, और गुणों का क्षोभ होने के कारण वे विकार पूर्ण
रूप से उफन कर त्रिपुटी के स्वरूप में आडम्बर फैलाते हैं। जिस प्रकार सूर्य के योग से नेत्रादि इन्द्रियों के
व्यापार चलते हैं उसी प्रकार कर्ण, त्वचा, जिह्वा और नाक आदि ज्ञानेन्द्रिय पंचक का कार्य त्रिपुटी के रूप में
घटता रहता है। इसमें जो दूसरे पाँच कर्मेन्द्रिय हैं, वे ज्ञानेन्द्रिय के अधीन होते हैं। हाथ, पैर, गुहा, शिस्न और
पाँचवीं वाणी इन्हें ज्ञानेन्द्रिय प्रेरणा देते हैं, तभी वे कर्मेन्द्रिय क्रिया करने लगते हैं। इस प्रकार ये दो पंचक
मिलाकर दस इन्द्रिय होते हैं, इसे ध्यान में रखो। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन्हें ही चित्तचतुष्टय चमत्कार
कहते हैं। वास्तव में ये एक ही हैं किन्तु उनका प्रकार भिन्न-भिन्न है। जिसका जैसा व्यापार है, वैसा उसका
नाम है। उद्धव ! केवल देह के आकार के कारण ही जो 'मैं' की भावना आती है, वह प्रबल अहंकार है। गहन
संकल्प और विकल्प, यही मन है। पूर्व में किये भोगों का स्मरण ही चित्त का स्वरूप है। कोई दृढ़ निश्चय हो
जाना यही 'बुद्धि' है। गुणक्षोभ का यह लक्षण ही भोग के साधन से भोग्य बन जाता है। लेकिन भोक्ता उससे
अलग होता है। उसका भी लक्षण सुनो। जहाँ त्वचा को विषयों का स्पर्श होता है, वहाँ वायु अधिदैव है।
लेकिन परमात्मा उससे भिन्न होता है। ज्ञानस्वरूप होने के कारण वह अविकारी ही होता है। रसनेन्द्रिय अत्यन्त
श्रेष्ठ है और रस उसका विषय है। उसका अधिदैवत स्वयं वरुण है। लेकिन आनन्द से परिपूर्ण आत्मा उस रस
से अलग ही है। श्रवणेन्द्रिय का विषय शब्द है। वहाँ दिशा अधिदैव है यह प्रसिद्ध ही है। किन्तु शब्द में मूल
आत्मा निःशब्द ही रहता है और वह अविकृत रहता है। नेत्रेन्द्रिय का लक्षण पहले ही बता दिया है। ज्ञानेन्द्रियों
की स्थिति इस प्रकार है। इसी रीति से त्रिपुटी बनती है। इसमें चित्त नाम का जो इन्द्रिय है उसे चिंतन का
विषय प्राप्त है। वहाँ वासुदेव अधिदैव है। लेकिन आत्मा चित्त से अलग है। मन यह एक अत्यन्त चंचल
५८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इन्द्रिय है और संकल्प उसका शक्तिशाली विषय है और वहाँ निर्मल चन्द्रमा अधिदैव है। लेकिन आत्मा मन से
निराला ही है। 'अहंकार' यह इन्द्रिय अत्यन्त बलवान है। 'मैं' का भाव यही उसका विषय है। रुद्र उसका
अधिदैव है। किन्तु परमात्मा अहंकार से बिलकुल भिन्न है। बुद्धिरूप इन्द्रिय अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न है। 'जानना'
यही उसका विषय है। वहाँ ब्रह्मदेव 'अधिदैव' है लेकिन ज्ञानरूप आत्मा बुद्धि से बिलकुल अलग ही है। अब
तक कारण के साथ चित्तचतुष्टय और उसकी त्रिपुटी के बारे में बताया। अब कर्मेन्द्रियों का भी लक्षण
बताऊँगा, सुनो। वाणी के इन्द्रिय में भाषण यह विषय रहता है। वहाँ अग्नि अधिदैव रहता है। उसमें शक्ति
सरस्वती का निवास रहता है। लेकिन आत्मा महामौन रह कर उससे अलिप्त ही रहता है। हस्तेन्द्रिय का विषय
है, 'ग्रहण'। उसका अधिदैव इन्द्रिय है। वहाँ क्रियाशक्ति रहती है। लेकिन अपने अक्रियत्व से, वहाँ भी आत्मा
अलिप्त ही रहता है। पैर नामक इन्द्रिय का विषय गति है और उसका अधिदैव उपेन्द्र है। उसमें गमनशक्ति का
वास है। लेकिन निश्चलत्व के कारण आत्मा वहाँ भी अलिप्त ही रहता है। गुदेन्द्रिय का विषय मलोत्सर्ग है।
वहाँ अधिदैव निऋति है। उसमें क्षरशक्ति है लेकिन वहाँ भी आत्मा अलिप्त ही रहता है। शिस्नेन्द्रिय का विषय
है, रति। वहाँ प्रजापति अधिदैव है और वहाँ आनन्दशक्ति का निवास रहता है। किन्तु परमानन्द के योग के
कारण आत्मा वहाँ भी अलिप्त ही रहता है। ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय के योग से कर्म का आचरण घटता है।
यही चित्तचतुष्टय का लक्षण है। गुणक्षोभ का भी वही कारण होने के कारण वह सारा मायिक है। गुणक्षोभ का
प्रमुख मूल वही है। वही प्रकृति के विकार से जड़रूप होता है और आत्मा अविकारी और निर्मल होने के
कारण प्रकृति से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति पैत्रिक भूमि के साथ सभी साहित्य बड़े
अभिमान से घर में सम्पादन करता है, फिर भी उससे अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार इन तीन गुणों के क्षोभ
से अभिमान नाना प्रकार के विकारों का जंगल कायम करता है, किन्तु आत्मारूप वसंत निराला ही रहता है।
उसी का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतुर्वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥
आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यास्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः।
सचमुच 'मैं' और 'मेरा' इस लगन के कारण ही जीव के पीछे संसार लगा हुआ है। उस अहंकार की
निवृत्ति से ही जीव को संसार से छुटकारा मिलेगा। लेकिन यह असह्य अहंकार कहाँ से उत्पन्न हुआ? इसका भी
उत्तर देता हूँ। स्वस्वरूप को भूलकर मन में जिस दृढ़ अहं का स्फुरण होता है, वही अहंकार है। विकार से तीन
गुणों का क्षोभ वही करता है। जागृति का विस्मरण ही स्वप्न सृष्टि का विस्तार है और स्वरूप से विमुख होने
वाला अहंकार ही त्रिगुणात्मक संसार है। विकार के योग से तीन गुण क्षुब्ध होते हैं। विस्मरण मोह का लक्षण
है। उस विकार के तीन गुण विकृत हो गये इसलिये अब उसके भाग सुनो। मूल रूप में जिसे 'वैकारिक' कहा
है वही सात्त्विक अहंकार है। वही चित्तचतुष्टय का द्योतक तथा अधिदैवों का प्रकाशक है। सत्त्व से मन उत्पन्न
होता है और मन से प्रचण्ड विकार उत्पन्न होते हैं। इसीलिये सत्वगुण को भी विकृत गुण ही कहते हैं।
ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय पंचक ये दोनों मिलकर दशेन्द्रिय होते हैं। उन्हें रजोगुण प्रकाशित करता है, इसलिये
उस रजोगुण को 'इन्द्रिय सम्बन्धी' कहते हैं। अब इसमें तामस नाम का जो गुण है वह आकाशादि सूक्ष्म
पंचतत्त्व जो महाभूतों को आच्छादित करते हैं, उन्हें विषयों के साथ उत्पन्न करता है। इस प्रकार महाभूत और
पाँच विषय इनको तमोगुण प्रकाशित करता है इसलिये उसे आदरपूर्वक भूतादि (भूतों से पहले का) कहते हैं।
बाईसवाँ अध्याय ५८३
इस प्रकार तीन गुणों के विकार से और काम्य कर्म के संस्कार से, अहंकार से प्रबल होकर वह अनेक कारणों
से संसार में परिभ्रमण करता है। लेकिन प्रकृति के इस विकार से आत्मा अत्यन्त भिन्न है। मृगजल उत्पन्न कर
जिस प्रकार सूर्य आकाश में अलिप्त रहता है, सर्प का आकार प्रकट कर स्वयं डोर जिस प्रकार सर्प का स्पर्श
भी नहीं करती, उसी प्रकार परमात्मा भी संसार उत्पन्न कर स्वयं निःसंग और निर्विकार ही रहता है। जिस प्रकार
स्फटिक जिस रंग पर रखो उसी रंग का दिखायी देगा लेकिन वह स्वयं उन रंगों से अलग सफेद ही होता है,
उसी प्रकार गुणों के सम्पर्क से जीवात्मा भी बद्ध दिखायी देता है, फिर भी वह नितांत शुद्ध ही है। लेकिन यह
ज्ञान न होने के कारण भिन्न-भिन्न मत के लोग व्यर्थ का विवाद करते रहते हैं। कोई कहता है, आत्मा देहधारी
है, कोई उसे विदेही कहता है और कोई उसे स्पष्ट नकार देता है। कोई कहता है, आत्मा सगुण है, कोई कहता
है वह निर्गुण है तो कोई कहता है कि वह परमात्मा सगुण और निर्गुण दोनों है। कोई द्वैत को प्रतिपादित करता
है, तो कोई अद्वैत का प्रतिपादन करते हैं। कोई कहता है, ये दोनों असंबद्ध हैं और हमारे मत के अनुसार
देहात्मवाद ही सही है। कोई कहता है यह सभी गलत है। यहाँ जो प्रपंच दिखायी देता है, वही सच है ऐसा
कुछ लोग कहते हैं। इन सबका विचार करने पर ये सभी अज्ञानमूलक मालूम होते हैं क्योंकि आत्मा पूरी तरह
ज्ञानस्वरूप और सभी भेदों का निवारण करने वाला है। 'आत्मा परिज्ञानमयः' अर्थात् आत्मा प्राणस्वरूप है यही
मूल श्लोक है, इसलिये अज्ञान का भेद ही नहीं रह जाता। आत्मा शुद्ध, बुद्ध और ज्ञानरूप है, यही सिद्ध होता
है। जिस प्रकार नक्षत्र आदि के साथ रात्रि को समाप्त कर सूर्य प्रकट होता है, उसी प्रकार भेदों के साथ कार्य
का भी लोप कर ज्ञानसूर्य ज्ञानरूपी किरणों से प्रकट होता है। तब माया भी गुणों के साथ नष्ट हो जाती है,
वाद-विवाद भी तमाम भेदों के साथ मिट जाता है, अज्ञान समूल नष्ट हो जाता है और चारों ओर सच्चिदानन्द
भर जाता है। आत्मा सच्चिदानन्द से परिपूर्ण होने के कारण उसके आगे सारा अज्ञान व्यर्थ हो जाता है। अज्ञान
को नष्ट करने का वह सबसे अच्छा साधन है। विवेक अथवा सांख्य दर्शन व्यर्थ है, ऐसा लगता है। उसी विषय
का निरूपण आधे श्लोक में श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३॥
मूलतः अज्ञान मिथ्या होता है, इसलिये विषय का भान भी अज्ञानजन्य ही है। लेकिन यही देखकर लोग
भ्रम में पड़ जाते हैं अतः उन्हें स्वस्वरूप का विस्मरण हो जाता है। मैं साक्षात परमात्मा उनके हृदय में अत्यन्त
निकट होते हुए भी, उनकी बुद्धि मुझसे पराङ्मुख होती है और इसीलिये उनमें विषयासक्ति उत्पन्न होकर घरबार,
पत्नी-बच्चे, देह आदि में ही रुचि होने लगती है। स्वस्वरूप का विस्मरण ही विषय का चिन्तन बढ़ाता है और
उसी देहाभिमान के कारण जीवों को अनिवार्य जन्म-मरण प्राप्त होता है। उस देहाभिमान का नाश करने के लिये
ही मैंने वैराग्य युक्त ज्ञानध्यान का साधन करने का ढंग बताया क्योंकि वही समूल अज्ञान का विनाशक है। जब
तक शरीर में देहाभिमान है, तब तक साधन भी आवश्यक ही है। अज्ञान का पूरी तरह क्षालन होने पर, साधन
व्यर्थ हो जाता है, यह मैं भी मानता हूँ। यह वह अज्ञान है जो शुद्ध स्वरूप में जीव का भाव उत्पन्न करता है।
वही जीव में अनिवार्य जीवन-मरण का चक्र लगा देता है। हे उद्धव! आत्मस्वरूप का विस्मरण हो देह में जो
अहंता उत्पन्न होती है वही दृढ़ अज्ञान है। वही देहाभिमान है। अज्ञान यह नाम गौण ही है। वास्तव में देहाभिमान
ही मुख्य है। भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव चौंक उठा। इसलिये वह उसी अर्थ का प्रश्न भगवान से स्वयं
ही पूछने लगा। वह प्रश्न इस प्रकार था कि देहाभिमान किस तरह जन्म-मरण का भोग लगाता है ?
५८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव उवाच
त्वत्तः परावृत्तधियः स्वकृतैः कर्मभिः प्रभो।
उच्चावचान् यथा देहान् गृह्णन्ति विसृजन्ति च ॥ ३४ ॥
आकाश सर्वत्र सन्मुख ही होता है, कभी भी विन्मुख नहीं होता। उसी प्रकार आत्मा भी अंतर्बाह्य परिपूर्ण
ही है। फिर उसकी वृत्ति विन्मुख कैसे होगी ? जब आकाश को जाल में बाँधना सम्भव होगा, तभी अकर्त्ता को
कर्त्ता का बन्धन लगेगा। वंध्या का गर्भधारण करना जिस प्रकार मिथ्या है, उसी प्रकार मुक्त के लिये जन्म-मरण
का बन्धन झूठ है। आत्मा के सिवा जब कुछ भी खाली नहीं बचा तो फिर इस देह से उस देह में जाना कैसे
सम्भव है ? यदि पृथ्वी रूठ कर आश्रय देना बन्द कर दे, अथवा आकाश ही कहीं दूर चला जाय, तभी एक देह
का आत्मा दूसरे देह में प्रवेश कर सकेगा। चिऊँटी यदि सात समुद्र निगल सके तभी आत्मा को ऊँच-नीच
योनियों का भोग भोगना पड़ेगा। अर्थात्, यह असंभव है। यह बात अतर्क्य है। उसके संशोधन पर तर्क काम नहीं
करता। योगी भी भ्रम में पड़ गये।
तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभिः ।
न ह्येतत् प्रायशो लोके विद्वांसः सन्ति वञ्चिताः ॥ ३५ ॥
हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारी लीला अगाध है। वह किसी की समझ में नहीं आती। जिनका चित्त माया के भुलावे
में है, उन्हें तुम्हारी स्थिति का पता नहीं है। आत्मा केवल अद्वितीय, अविनाशी है, उसमें तुम उत्पत्ति, स्थिति और
नाश दिखाकर मिथ्या संसार का भास उत्पन्न करते हो। तुम्हारी यह लीला अतर्क्य है। उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं
चलता। इसमें वेद की मति गुंग हो गयी, उपनिषद पगला गये, पुराण मूक होकर बैठ गये। इन सबने सारे प्रयास
कर डाले लेकिन उसमें उनकी गति काम न आयी। तुम्हारे संबंध में ज्ञान तुम्हारी कृपा के बिना नहीं होगा।
इसलिये हरि की कृपा को जो पात्र नहीं है ऐसे जड़-मूढ़ लोगों का संसार का बन्धन नहीं टूटता। तुम्हारी
योगमाया की करनी अतर्क्य है। उसने बछड़ों को चुराते ब्रह्मदेव को भी भुलावे में रखा। मोहनी को देखकर शंकर
भी भुलावे में आ गये। इसीलिये गोविन्द की कीर्ति सारे त्रिभुवन में फैली हुई है। इसलिये आप कृपया मेरे इस
प्रश्न का उत्तर दें कि एक देह से दूसरे देह में जीव कैसे प्रवेश करता है ? और जीव को जन्म-मरण भी कैसे
आता है ? उद्धव का यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण हँस दिये और बोले, अरे! यह सब मायिक है, केवल मनोमय
कल्पना का खेल है।
श्रीभगवानुवाच
मनः कर्ममयं नृणामिन्द्रियैः पञ्चभिर्युतम्।
लोकाल्लोकंप्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते ॥ ३६ ॥
ग्यारह इन्द्रिय और पंचमहाभूत मिलकर सोलह कलाओं का लिंगदेह बनता है और अनेक विषयों की
कल्पना करने वाला मन ही उसमें प्रधान रहता है। इसमें लिंगदेह ही मन है और उस मन के अधीन इन्द्रिय रहते
हैं। मन से ही देह चलता रहता है। उसमें देहाभिमान रहता है, वह भी मन के साथ ही रहता है। मन जिसे
छोड़कर चला जाता है, वहाँ देहाभिमान खड़ा भी नहीं रहता। मन के योग से ही अभिमान देह का बोझ ढोता
रहता है। मन जब विषयासक्त होकर शुभाशुभ कर्माचरण करता है, उस समय जीव कर्माधीन होकर दूसरे देह में
बाईसवाँ अध्याय ५८५
प्रवेश करता रहता है। आत्मा देह से बिलकुल भिन्न और अलिप्त रहता है लेकिन देह के साथ रहने का आभास
कराता है। उसका यह कौशल अद्भुत है। उसका भी लक्षण सुनो। घट जिधर-जिधर जाता है, उधर-उधर उसके
साथ घटाकाश भी जाता दिखायी देता है लेकिन वास्तव में आकाश नहीं हिलता। उसी प्रकार इस आत्मा का
जाना है। घट में अमृत भरा हो या मलमूत्र, फिर भी उन दोनों से आकाश अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार देह में
रहने वाला आत्मा सुख-दुःख से अलग ही रहता है। घट पर पत्थर मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े भी कर दें
लेकिन आकाश पर एक खरोंच भी नहीं आती। उसी प्रकार नश्वरों में आत्मा सचमुच अनश्वर रहता है। घट जब
फूट कर नष्ट हो जाता है, उस समय भी आकाश स्वयंसिद्ध आकाश में ही रहता है। नया घर बनने पर आकाश
उसे भी व्याप लेता है। उसी प्रकार यह देह अशाश्वत है और आत्मा अखण्डता से परिपूर्ण है। उसे न दूसरे देह
में प्रवेश करना है और न जन्म-मरण का भोग भोगना है। जीव का एक देह से दूसरे देह में प्रवेश करना यह
क्रिया वासना मन के माध्यम से करती है। वह मन जीव के साथ दूसरे देह में कैसे जाता है, उसे सुनो।
ध्यायन्मनोऽनुविषयान् दृष्टान् वानुश्रुतानथ ।
उद्यत् सीदत् कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनुशाम्यति ॥ ३७ ॥
मन सदा देखी हुई और सुनी हुई बातों का ध्यान करता रहता है। मन का यह ध्यान बहुत कठिन और
भयंकर होता है। इसलिये उसे और कुछ भी नहीं सूझता। अंतकाल में मन किसी चहेती वस्तु के ध्यान में मग्न
हो जाता है और तब वह तदाकार हो जाता है। वह सर्वभाव से उसमें मिल जाता है। जब पहला भोग समाप्त हो
जाता है तो मन सहज ही पहले देह का अभिमान भूल जाता है और अगले देह का ही एकाग्र होकर ध्यान करता
रहता है। विषयवासना पर लुब्ध हुआ मन, अपने कर्मानुसार प्राण के साथ दूसरे देह में संचार करता है। पहले जो
देह छोड़ दिया है, उसका चित्त को जरा भी स्मरण नहीं होता और मैंने नया देह धारण कर लिया है इसका भी
मन को स्मरण नहीं होता।
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत् स्मरेत् पुनः ।
जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तस्मृतिः ॥ ३८ ॥
जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद ।
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः ॥ ३९ ॥
मन विषयलोलुपता से जिस स्वरूप का चिन्तन करता है, उसमें ही वह स्वयं पूर्वदेह की स्मृति भूलकर
तद्रूप बन कर रहता है। वह पूर्वदेह को कैसे भूलता है? तो जिस प्रकार आयु बढ़ने पर, प्रौढ़ होने पर हम अपना
बचपन भूल जाते हैं, उसी प्रकार वह भी अपने पूर्वदेह को भूल जाता है। इस प्रकार का सम्पूर्ण विस्मरण, यही
देह का मरण है। उस विस्मरण के साथ ही चेतना प्राणों के साथ चली जाती है। चेतना जब प्राणों के साथ चली
जाती है तब देह को प्रेत की अवस्था प्राप्त होती है। उद्धव! इसी का नाम मृत्यु है। अब जन्म की बात सुनो।
मृत्यु के समय स्नेह से, द्वेष से अथवा भय से जैसा ध्यान रहता है, उसी के तद्रूप वह होता है और उसे वैसा ही
जन्म प्राप्त होता है। भरत को अनुष्ठान करते समय स्नेह से मृग का ध्यान आ गया तो वह स्वयं मृग बन गया
क्योंकि उसके ध्यान के अनुरूप मन का जन्म हुआ। कीटकी भय से भृंग का ध्यान कर रही थी अतः वह तद्रूप
हो गयी। पौण्ड्रक ने द्वेष से श्रीकृष्ण का ध्यान किया अतः उसे तद्रूपता प्राप्त हुई। इससे मन को जिस विषय का
ध्यान लगा रहता है, वैसी ही गति उसे प्राप्त होती है। संसार का विस्तार हमने स्वयं किया रहता है अतः
५८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अंतकाल में वह सब प्रेम से प्रिय विषय बन जाता है। लेकिन इसमें भी जहाँ विशेष रूप से ध्यान बसता है उसी
स्वरूप का जन्म पुरुष प्राप्त करता है। फिर उस चिंतन के सामर्थ्य के अनुसार जैसे आकार का देह प्राप्त होता है,
वैसे ही देह का अभिमान उत्पन्न होता है और 'यह सारा देह मैं ही हूँ' ऐसा वह समझता है। इसमें मन और
अभिमान इनका स्वरूप देखें तो वह एक ही रहता है लेकिन उनके कार्य भिन्न-भिन्न रहते हैं। चित्त चतुष्टय का
यह स्वरूप ज्ञानी लोग एकात्मता से जानते रहते हैं। उस देह का बुरा या भला ईश्वर की कृपानुसार होता रहता
है। लेकिन वह देह का ही अभिमान लेकर नाचता रहता है। इसी का नाम है, पुरुष का जन्म। लेकिन यह देह
पहले का नहीं है, यह दूसरा देह है इसका भी उसे स्मरण नहीं रहता। इसलिये वह यहाँ भी पहले का ही
देहाभिमान लेकर बैठ जाता है। इसी अर्थ का दृष्टांत श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। जिस प्रकार स्वप्न में अथवा
मनोराज्य में अपने देह का भान नहीं रहता, कोई भिखारी अपने ही घर में सोया रहता है और वह स्वप्न में इन्द्र
बन जाता है, ऐरावत पर बैठ कर उर्वशी जैसी अप्सराओं के साथ रहता है। मेरा पहले का भिखारी का देह गया
और यह देवता का देह प्राप्त हो गया इसका उसे स्वप्न में भी स्मरण नहीं रहता। उसी प्रकार लोगों के जन्म की
स्थिति है। कोई मजदूर मन्दिर में घी की गगरी ले जाते समय मन में मनोराज्य करता रहता है कि मैं घोड़े पर
सवार हूँ, और उसी स्वकल्पित कल्पना तरंगों में ही मन ही मन उल्हसित होता रहता है। इतने में मनोराज्य में
घोड़े ने ऊँची छलांग लगायी यह सोच कर वह स्वयं ही कूद जाता है। उसके पास की घी की गगरी गिर कर
चूर-चूर हो जाती है और लोग जब पूछने लगते हैं, यह क्या हुआ ? वह उस मनोराज्य में ही कहता है, "मेरे
घोड़े ने जोर की छलांग लगायी।" लेकिन घी की गगरी गिर जाने के कारण, उस अपराध के लिये उसे बंदीगृह
में जाना पड़ता है लेकिन मन के ध्यान के कारण उसे उसका भान ही नहीं रहता। यहाँ तक का उसका विस्मरण
ही देह की मृत्यु है और मन का तीव्र ध्यान ही प्राणी का जन्म है। सारांश आत्मा का जन्म या मरण केवल भ्रम
का लक्षण है। उसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
स्वप्नं मनोरथ चेत्थं प्राक्तनं न स्मरत्यसौ।
तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्व चानुपश्यति ॥ ४० ॥
स्वप्न में पुरुष देहभान भूलकर स्वप्न की गृहस्थी का विस्तार अपने अभिमान के साथ बढ़ाता है। जागृत
अवस्था का देह उधर रह गया और यहाँ मुझे स्वप्नदेह प्राप्त हुआ है, इस प्रकार पहले के और अभी के देहों का
उस पुरुष को स्मरण नहीं होता। जागृति और स्वप्न इन दोनों स्थितियों में देहों को देखने वाला उनमें से कोई
भिन्न ही होता है, उसी प्रकार जीव जन्म और मृत्यु इन अवस्थाओं से भिन्न है। अर्थात् जीव को जन्म और मृत्यु
इनमें से कुछ भी नहीं है। सारांश जन्म और मृत्यु केवल देह के लिये ही हैं। आत्मा नित्य मुक्त और शाश्वत है
तथा स्वप्न के मनोरथों के तरंगों की तरह संसार अनेक प्रकार से विस्तृत है। देह को उत्पत्ति, स्थिति और लय
होने का कारण मन ही है। इसलिये संसार मन की कल्पना है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
इन्द्रियायनसृष्ट्येदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि।
बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृत् यथा ॥ ४१ ॥
सारा संसार मन की ही कल्पना है। इन्द्रियों के समस्त व्यवहार मन के कारण ही होते हैं और कर्म की
कसौटी के अनुसार मन ने ही इस त्रिपुटी को बढ़ाया है। अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत ये तीन प्रकार भी मन
ने ही किये हैं। सचमुच, आत्मवस्तु अखण्ड होते हुए भी उसमें तीन प्रकार की कल्पना का आभास होता है।
बाईसवाँ अध्याय ५८७
कुम्हार जब मटकी बनाता है, उस समय आकाश भी उसी के आकार का दिखायी देने लगता है, सच पूछो तो
आकाश पूरी तरह निर्विकार है लेकिन मटकी के कारण वह भी विकृत हुआ दिखायी देता है। उसी प्रकार आत्मा
अविकृत, नित्य और शुद्ध ही है। उसे मन तीन प्रकार की कल्पनाओं और नाना प्रकार की त्रिपुटी से अनेक प्रकार
का भेद उत्पन्न करता है। वह भेद कैसे बढ़ता है, सुनो। कार्य, कर्म और कर्त्ता, ध्येय, ध्यान और ध्याता; ज्ञान और
ज्ञाता; ये तीन त्रिपुटी मन द्वारा ही कल्पित है। 'अहं' का अर्थ मैं 'कोहं' अर्थात् मैं कौन यह आशंका और 'सोहं'
अर्थात् मैं ही हूँ, यह भेद; अथवा 'त्वं' अर्थात् जीव, 'तत्' अर्थात् ब्रह्म और 'अस्ति' अर्थात् तू है, ये पद; अथवा
सत्, चित् और आनन्द ये सारे सम्बन्ध मायिक हैं। असत् अर्थात् मिथ्या जो माया है, उसे दूर करने के लिये
वेदवाणी भी सत् का प्रतिपादन करती है और जड़ का विलय होने के लिये आत्मवस्तु को ही चैतन्यतत्त्व कहते
हैं। दुःख का निर्मूलन करने के लिये परब्रह्म को ही परमानन्द कहते हैं। इसलिये सच्चिदानंद भी मायिक ही सिद्ध
होता है। असत् मिथ्या होने के कारण मायिक है। वैसा तत्त्व यथास्थान कौन रख पायेगा? जहाँ जड़ के लिये ही
स्थान नहीं है वहाँ चैतन्य का तत्त्व किस प्रकार हाथ लगेगा? जहाँ दुःख का बिलकुल सम्बन्ध नहीं है, वहाँ कोई
आनन्द किसे कहेगा? इसलिये परब्रह्म के स्थान पर सच्चिदानन्द का सम्बन्ध लगाना भी मायिक है। जहाँ संसार
का आभास होता है, वह त्रिगुणों की त्रिपुटी का ही खेल है। इसलिये वह सब भी मायिक और मन का किया
हुआ है। आत्मा नित्य, मुक्त, शुद्ध और ज्ञानस्वरूप है। उसमें जो तीन प्रकार का भेद दिखायी देता है वह मन द्वारा
किया हुआ गुण सम्बन्धी भेद है। इसलिये स्पष्ट ही वह मायामय है। कोई पुरुष अग्निहोत्री है तथा सदाचारी है।
लेकिन उसकी स्त्री यदि व्यभिचारी है तो उसका पति दोषी है, ऐसा लोग कहते हैं, उसी प्रकार यह आत्मा के
भेद की बात है अर्थात् आत्मा वास्तव में अलिप्त रहता है और गुणों के दोष उस पर आरोपित रहते हैं। जिस
प्रकार स्वप्न में अकेला व्यक्ति सारा संसार बन जाता है, लेकिन वह सारा चमत्कार वास्तव में निद्रा के कारण
होता है, उसी प्रकार का भेद का मायिक प्रकार ब्रह्मा में भी है। जड़ और अजड़ यह देह के भेद; अथवा अलग
से किया हुआ जीव का भेद; यह स्वप्न की तरह माया का आभास है। आत्मा, नित्य, शुद्ध और अद्वितीय है। इस
प्रकार माया द्वारा किये गये भेद पर जिसकी निष्ठा है, ऐसे लोगों को वैराग्य प्राप्त करने के लिये काल ने जन्म-
मरण का फेरा लगा दिया। उसी का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च।
कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥ ४२ ॥
उन्होंने कहा, हे उद्धव! सुनो। स्थावर जंगम आदि जो भी देहस्वरूप हैं, उन्हें काल के प्रभाव से नित्य नया
जन्म-मृत्यु का जंजाल लगा हुआ है। काल अपनी सूक्ष्म गति से सारे संसार को ग्रस लेता है। शरीर से चिपके
हुए वे जन्म-मृत्यु जीव को माया के मोह के कारण समझ में नहीं आते। माँ अपने बेटे के अवयव खुले होते हुए
भी उसे नग्न अवस्था में लाड़-प्यार करती है लेकिन वही माँ बेटा बड़ा होने पर उससे शरमाती है। वह
बाल्यावस्था काल ले गया और यह नयी प्रौढ़ावस्था प्राप्त होने पर माँ बेटे से शरमाने लगी। यह सारा परिवर्तन
काल ने ही किया है। यह सूक्ष्म काल इस प्रकार प्राणिमात्र को नित्य नया विनाश और नित्य नया जन्म देता रहता
है। लेकिन भ्रम से भ्रांत हुए प्राणी इस जन्म-मृत्यु का मार्ग नहीं जानते। जीवन की जिस अवस्था का भाग काल
ले जाता है, उसके साथ ही देह भी जाता है। आगे नयी उम्र आते ही काल उसे नया शरीर देता है ऐसा समझना
चाहिये। काल ने किया हुआ उद्भव और विनाश नित्य नया दिखाई देता है। इसलिये देह तीन प्रकारों से युक्त है
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यह हम स्वयं देख सकते हैं। काल की गति अतर्क्य है, इससे प्राणियों को जीवन-मरण प्राप्त होता है। उस
अत्यन्त काल गति के सम्बन्ध में ही श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः।
तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः ॥ ४३ ॥
दीपक की ज्वाला क्षण-प्रतिक्षण नयी उत्पन्न होती रहती है, किन्तु वे नयी उत्पन्न होते समय या पुरानी
नष्ट होते समय आँखों को दिखायी नहीं देतीं। यमुना के जल का प्रवाह लहरों के द्वारा तीव्र गति से बहता
रहता है लेकिन उस प्रवाह का जल प्रत्येक क्षण नया हो रहा है, यह किसी को दिखायी नहीं देता। फल, वृक्ष
का डंठल छोड़े बिना कड़ुआ, कसैला, खट्टा या मीठा भी होता है। काल की अदृश्य सत्ता अतर्क्य है। वही
काल देह के साथ नित्य नया कैसे उत्पन्न होता है? इसका उत्तर यह है कि वह बाल्य, युवा और वार्धक्य ये
देह की अवस्थाएँ बदलता रहता है। इसके सिवा मूढ़, चतुर, निर्बल ऐसी नयी-नयी अवस्थाएँ पूर्व की अवस्था
को नष्ट कर उत्पन्न होती है। उस समय 'जो पहला था वही सचमुच' मैं हूँ यह स्मरण किस कारण से होता
है? ऐसी कल्पना भी तुम्हारे मन में आ सकती है। इसलिये श्रीकृष्ण इस विषय का निरूपण करते समय
अखण्ड स्फूर्ति का रहस्य बता रहे हैं।
सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम्।
सोऽयं पुमानिति मृषा धीर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥
उद्धव! दीपक की ज्वाला भले ही नयी उत्पन्न होती हों और पुरानी नष्ट हो, लेकिन उनमें का अग्नि पहले
की ही तरह एक जैसा होता है, इसीलिये उसे दीया कहते हैं। अथवा जल के प्रवाह में बड़ी-बड़ी लहरें बह कर
आती हैं, फिर भी पानी अखण्ड एक ही रहता है। इसीलिये सब लोग उसे पानी कहते हैं। उसी प्रकार उद्धव!
देह में भी उम्र के अनुसार निरनिराली अवस्थाएँ आती हैं और जाती हैं, फिर भी आत्मा अखण्ड सर्वव्यापी ही
रहता है। इसी कारण से 'वही मैं' वाली स्फूर्ति का स्फुरण होता है। तुम कहोगे कि मैं के 'अहं के कारण यह
अहंकार उत्पन्न हुआ है', तो उसका उत्तर यह है कि वह भी अज्ञान के कारण जड़-मूढ़ ही है। उसका दृढ़
प्रकाशक आत्मा ही है। इसलिये वही हमेशा परब्रह्म स्वरूप से स्फुरण प्राप्त करता है। किन्तु यह जो जन्म-मरण
है, वह देह के ही लिये होता है। आत्मा अपने सर्वव्यापित्त्व के कारण परिपूर्ण ही है। देह ही आत्मा है और वही
मैं हूँ, ऐसा जो कहते हैं, वह भी मिथ्या है। विषयों की कार्यसिद्धि होना अथवा देह में 'मैं' का अहं होना यह भी
सचमुच मिथ्या ही है। उसी कारण मनुष्य संसार बन्धन में उलझ जाता है। कर्मभूमि में अनायास ही नरदेह की
प्राप्ति होने पर, जो लोग विषयसुख में लिप्त होकर रह जाते हैं, उनका यह कार्य अमृत के बदले माँड पीने, रत्नों
के बदले अनाज के छिलके खरीदने, पर्वत त्याग कर कीट पाने, और ईंट के बदले हाथी बेचने जैसा है। आँखें
फोड़ कर कोई उसमें काजल लगा ले, अथवा नाक काट कर होली खेलने जैसा है। इस प्रकार वे नरदेह की
विडम्बना करते हैं और जीवन का सत्यानाश कर लेते हैं। लाखों की सम्पत्ति खर्च करने पर भी जीवन का एक
क्षण भी वापस नहीं मिलेगा ऐसा जीवन जो लोग विषयों के लिए खर्च कर देते हैं वे कर्मदरिद्री और नितांत मूढ़
हैं। देह स्वयं ही काल्पनिक है। इसलिये उसका अभिमान भी काल्पनिक है। वही यह देहबुद्धि की 'अहंता',
संसार को दृढ़ बन्धन लगा देता है। यदि उस 'मैं पन'को ही छोड़ दें तो फिर कैसा जन्म और कैसा मृत्यु? जब
संसार ही नहीं रहेगा तो फिर संसार बन्धन कैसा? देखो! बगुले का भय मिथ्या रहता है लेकिन जैसे बालक उसे
बाईसवाँ अध्याय ५८९
सच मान लेता है, उसी प्रकार देह भी मिथ्या और काल्पनिक है। लेकिन अज्ञानी लोग उसी को सच मानते हैं।
जो देह और बुद्धि दोनों को ही मिथ्या मानता है, उसे भविष्य में जन्मसिद्धि की क्या चिन्ता है? क्योंकि
मिथ्यारूपी पदार्थों की वृद्धि होती ही नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।
म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्निर्दारुसंयुतः ॥ ४५ ॥
देहात्मवाद से देहाभिमान उत्पन्न होता है, जिससे लोगों में गूढ़ वासनाबीज उत्पन्न होता है और अपनी
वासनाओं के संकल्प से ही मनुष्य स्वयं मिथ्या जन्म-मरण को ही सत्य मानने लगता है। उस देहाभिमान के
कारण ही क्रिया चरण करने वाला कर्मकर्ता मैं हूँ यह मान कर निष्कर्म को कर्मबन्धन है और अमर को जन्म-
मरण है, यह मान लेता है। गड्ढे में एकत्र पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, इसलिये वहीं सूर्य का
जन्म हुआ और पानी जब सूख जाता है तो सूर्य का जीवन समाप्त हो गया, ऐसा बालक कहता है। उसी प्रकार
अजन्मा को जन्म-कर्म है ऐसा मानना केवल माया का भ्रम है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण सरल दृष्टांत देते हैं।
वास्तव में अग्नि अजन्मा होने के कारण अव्यक्त है, लेकिन वह लकड़ी में ही उत्पन्न हुआ ऐसा कहा जाता है।
वह उस लकड़ी के आकार का ही दिखायी देता है। इसलिये लकड़ी समाप्त होने पर अग्नि नष्ट हो गया ऐसा
कहते हैं। उस लकड़ी की ही तरह यहाँ जन्म और विनाश ये दोनों देह के ही लिये हैं। दृष्टांत के अग्नि की ही
तरह आत्मा नित्य और अविनाशी है। उस देह की नौ अवस्थाएँ होती हैं, जिनका वर्णन श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम्।
वयोमध्यं जरामृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव ॥ ४६ ॥
देह की नौ अवस्थाएँ हैं, उनकी भी स्थिति सुनो। उन भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का विस्तार भी सुनो। पिता के
देह में शुक्लरूप प्राप्त कर माता के उदर में प्रवेश करने को 'निषेक' कहते हैं। यही उस देह की पहली अवस्था
है। फिर माता के उदर में रक्तयुक्त संचित होकर, पिण्ड बनता है और धीरे-धीरे बड़ा होकर उसे 'गर्भ' का
स्वरूप आता है। यह देह की दूसरी अवस्था है। फिर प्रसूति वायु के आघात से पेट से बाहर आना, इसे 'जन्म'
कहते हैं। यह देह की तीसरी अवस्था है, यह अच्छी तरह जान लो। स्तनपान ही सबसे अच्छा लगता है, माता
ही सबसे श्रेष्ठ तथा रोने में ही सारा बल दिखायी देता है यह देह की चौथी 'बाल्यावस्था' है। केवल अज्ञान के
कारण मलमूत्र में लोटता है, सारे इन्द्रियों की शक्ति गुप्त रहती है, विचार करने की बिलकुल शक्ति नहीं रहती,
मधुर, कोमल, तुतला कर बोलता यह पंचवार्षिक 'बाल्यावस्था' है। फिर इन्द्रियों की शक्ति बढ़ती जाती है, किन्तु
शरीर में विषय का स्वार्थ नहीं होता, खेल पर ही मन आसक्त रहता है, यह उस देह की पाँचवीं 'कुमारावस्था'
है। इसके बाद 'युवावस्था' उसमें इन्द्रियों में परिपूर्ण शक्ति आती है और मन में बुद्धिमान होने का अभिमान
हिलोरें मारने लगता है। उस समय मन में स्त्री की वासना उत्पन्न होने लगती है, धन का लोभ बढ़ने लगता है,
घर-बार से प्रेम होने लगता है और समाज में नाम रूप की कीर्ति बढ़ने लगती है। सम्पत्ति के मद से मन में
अहंकार भरा रहता है, बाल-बच्चों में ही मन रमता है। बढ़ती आशा के कारण अधिक से अधिक भोग भोगने की
चाह होती है; और काम क्रोध का बड़ा-सा चक्र चारों ओर घूमता रहता है। कोई अपमान करता है तो वह सहन
नहीं होता। कोई 'तू' कहता है तो तैश में उठ कर खड़ा हो जाता है। ऐसी अनर्थकारी 'यौवनावस्था' देह की
छठवीं अवस्था है। पन्द्रह से पचीस वर्ष तक पूर्ण यौवन का जोर रहता है। उसमें नाना प्रकार के विकारों से
व्याप्त हुआ मन पर्याप्त देहाभिमान एकत्र कर लेता है। फिर चालीस से साठ वर्ष तक देह की उतरती कला पूर्ण
होकर शरीर पर झुर्रियाँ आने लगती हैं और काल उन इन्द्रियों की शक्ति नष्ट करने लगता है। जब काल शरीर को
क्षीण करना प्रारम्भ करता है, वह देह की सातवीं 'उत्तरावस्था' है। इस अवस्था का हाथ पकड़ कर आने वाली
'वार्धक्यावस्था' बड़े-बड़े शूरवीरों को भी विचलित कर देती है। इन्द्रियों के सुख विलास के व्यापार और
उत्तमोत्तम आहार शरीर को सहन नहीं होते। उस जरा ने शरीर की रचना अस्तव्यस्त कर दी होती है। दाँत टूट
कर वहाँ गड्ढे बन जाते हैं, भय से केश सफेद हो जाते हैं और मस्तक काँपने लगता है। वार्धक्य शरीर को
बिलकुल क्षीण कर देता है, फिर भी विषयों की इच्छा प्रबल रहती है। चिन्ता अपार और भयंकर ! आशा तो पूर्ण
नहीं होती। आँखों का तेज जाता रहता है, कानों से सुनायी नहीं पड़ता, मुँह से लार गिरने लगती है, फिर भी वह
देहाभिमान को बढ़ाता ही रहता है। समय आने पर मानसिक और शारीरिक रोग प्रकट होने लगते हैं, महामोह से
बुद्धि भ्रमित हो जाती है और विचार करने की शक्ति तो बिलकुल नष्ट हो जाती है। चलते समय पैर आपस में
लड़खड़ाने लगते हैं और सहारे के लिये लाठी लेनी पड़ती है। जीभ भारी हो जाती हे और शब्द स्पष्ट सुनाई नहीं
पड़ते। होंठ चूहे की तरह हिलते रहते हैं। आँखों से कीचड़ निकलता है, मुँह में लार भर जाती है, नाक से
निकलने वाला मल होठों पर बहने लगता है। मुख का चुम्बन भी कोई नहीं माँगता क्योंकि वह देने वाली स्त्री
थूक देख कर दूर भाग जाती है। खाँसी के कारण क्षण भर के लिये विश्राम नहीं मिलता, साँस फूलती है और
खाँसी का दौर चलता रहता है। शरीर काँपता रहता है, फिर भी देहाभिमान कम नहीं रहता। 'कल के बच्चे'
कहकर वह लोगों को पुरानी बातें सुनाने बैठ जाता है। अपानवायु का वाद्य तो निरन्तर बजने लगता है। इस
प्रकार जीवित अवस्था में ही जीव का उपहास करने वाली वह 'जरा' इस देह की आठवीं अवस्था है। जिस
प्रकार सुई के पीछे धागा रहता है, उसी प्रकार 'जरा' के साथ 'मरण' लगा हुआ है। जरा जब शरीर को क्षीण
करता है तो मृत्यु का झंडा लहराने लगता है। देह की नाड़ियाँ पोली होने लगती हैं, आवाज लड़खड़ाने लगती है,
फिर देह का आकर्षण रहता ही है। स्त्री और बच्चों की चाहत पहले से अधिक बढ़ने लगती है। मेरे बाद ये
अनाथ हो जायेंगे, इन्हें कौन सँभालेगा ? इस विचार से वह बच्चों को गले लगा कर फुक्का फाड़ कर रोने लगता
है। धन का लोभ तो बहुत कठिन है। अन्तकाल में भी वह स्वयं खर्च नहीं करता। औरों को दूर रखकर, केवल
अपने ही विश्वासपात्र लोगों को अपने खजाने की जानकारी देता है। वासना का चमत्कार आश्चर्यजनक है। देह
का विस्मरण कर जिस बात का सर्वाधिक स्मरण होता है, उसी वस्तु से वह तद्रूप हो जाता है। इस देह की
सम्पूर्ण स्मृति तत्काल नष्ट हो जाती है, और चेतना के साथ प्राण निकल जाता है। इसी का नाम है देह की मृत्यु।
यह नौवीं अवस्था है। इस प्रकार गर्भ से लेकर मृत्यु तक देह की नौ अवस्थाएँ हैं। जो विकारी होता है उसी को
देह की अवस्थाएँ होती हैं। आत्मा अविकारी होने के कारण अलिप्त ही रहता है। अब तुम कहोगे कि देह तो
जड़ है, उसमें विकार कैसे होता है ? सूर्य स्वयं होकर किसी को नहीं जगाता। उसके उदय होते ही लोग अपने
आप जग जाते हैं। इसलिये इन लोगों का क्रिया कर्म सूर्य के शरीर को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार विकार
प्रकट कर आत्मा अलिप्त ही रहता है। सूर्य किरण निकलते ही जिस प्रकार सूर्यकान्त मणि अपने शरीर से अग्नि
उत्पन्न करने लगता है, फिर उस अग्नि से यज्ञकार्य भी होते हैं और आग भी लगती है, किन्तु उस कर्म से सूर्य
अलग ही रहता है। उसी प्रकार चैतन्य के प्रकाश से मन शुभ-अशुभ कर्म करता रहता है। लेकिन चैतन्यपूर्ण
आत्मा उस मनोविकार से अलिप्त ही रहता है। इसलिये ये सारे विकार मन के ही किये हुए हैं। कर्माकर्म भी मन
ने ही किये हैं, यह जान लो। जन्म-मरण भी मन की ही क्रिया है और स्वर्ग या नरक में जाना यह भी मन की
ही क्रिया है। लक्ष्यालक्ष्य भी मन ने ही किया है और बंध तथा मोक्ष भी मन ने ही किये हैं। यही निरूपण साक्षात
श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः ।
गुणसङ्गादुपादत्ते क्वचित् कश्चिज्जहाति च ॥ ४७ ॥
अभिमान से युक्त मन, संस्कार विकार का आभास कराता है और स्वर्ग और नरक में जाना यह भी
देहाभिमान के कारण होता है। इससे आत्मा स्वभावतः भिन्न है। वह ज्ञानमय तथा ज्ञानस्वरूप है। उसे मन स्पर्श
भी नहीं कर सकता और शुद्ध तत्त्व में अभिमान भी नहीं रहता। मन और अभिमान को माया ही उत्पन्न करती है,
अभिमान ने ही गुणों को उत्पन्न किया है और उन गुणों ने मायात्मक विकार सामग्री के साथ यह देह तैयार किया
है। देह के पास जिस प्रकार छाया रहती है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में मिथ्यारूप माया रहती है। ऐसे
आत्मस्वरूप में जन्म-मरण के साथ इस देह के प्रवेश के लिये स्थान ही नहीं है। आत्मा शुद्ध और देह मलिन है।
उसी प्रकार देह जड़ तथा आत्मा चैतन्यस्वरूप है। आत्मा अजन्मा, अव्यय और परिपूर्ण है। जन्म-मरण केवल
देह को है। तीन गुण, तीन अवस्था, कार्य, कर्म, मैं कर्त्ता यह अभिमान, ये सब देहाभिमान के विकार हैं। आत्मा
सर्वथा अलिप्त ही है। इस प्रकार आत्मा स्वभाव से ही चैतन्यस्वरूप होने के कारण, विकारों से भिन्न ही है। अब
तुम कहोगे कि 'जीव को ही देहाभिमान है', तो उसके बारे में भी सुनो। जीव माया के गुणों से अलिप्त रहता है।
स्फटिक जिस रंग पर रखिये, उस रंग का वह दिखायी देता है। लेकिन स्फटिक मूलतः शुद्ध होने के कारण वह
उस रंग से भिन्न रहता है। उसी प्रकार सत्त्वादि गुणों में खेलते हुए भी जीव सचमुच अलिप्त ही रहता है।
स्फटिक को काजल पर रखो तो वह काला दिखाई देता है किन्तु वह कालेपन से भिन्न रहता है। उसी प्रकार
तमोगुण से जीव मलिन दिखाई दे, फिर भी वह तमोगुण से अलग रहता है। उसी स्फटिक को यदि लाल रंग पर
रख दिया जाय तो उसकी प्रभा लाल दिखायी देती है, लेकिन फिर भी वह लाल रंग से अलग रहता है। जीव
रजोगुण में रहकर भले ही राजसी लीलाएँ करे फिर भी वह सब भोग कर जीवात्मा अलग ही रहता है। श्वेत रंग
पर स्फटिक रखने से उसका रंग श्वेत दिखायी देता है लेकिन वह श्वेत रंग से बिलकुल अलग रहता है। उसी
प्रकार जीवात्मा सत्वगुण में रहने पर बड़ा ज्ञानसम्पन्न दिखायी देता है, लेकिन वह गुण और ज्ञान से अलग रहता
है। इस प्रकार जीव तीन गुणों से किस प्रकार अलिप्त रहता है, यह तुम्हें बताया। अब वह देह में रहते हुए भी
किस प्रकार युक्त रहता है, यह बताता हूँ। जिस प्रकार घट में रहने वाला पानी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब घट में लाता
है, उसी प्रकार जीवत्व शुद्ध आत्मा को देह में देहाभिमान के रूप में देखता है। घट निश्चल हो तो बिम्ब भी
निश्चल रहता है। घट हिलता है तो बिम्ब भी हिलता है। उसी प्रकार ये सारी अवस्थाएँ देह की हैं लेकिन
जीवात्मा उसे अपनी ही मानता रहता है। घट में काजल घोलने से पूरा पानी काला हो जाता है लेकिन उसके
अन्दर के बिम्ब को अथवा प्रतिबिम्ब को कालिख नहीं लगती। उसी प्रकार देह के सुख-दुःख की अथवा पाप
पुण्य की बात जीव के अथवा आत्मा के माथे पर नहीं आती। अहंकार के कारण देह ही वह सब कुछ भोगता
रहता है। इस घड़े का पानी उस घड़े में भर दें तो उसमें भी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखायी ही देता है। उसी
प्रकार इस देह का जीव उस देह में चला जाता है, इसीलिये उसे जीवात्मा कहते हैं। चन्द्रमा आकाश में अलिप्त
ही रहता है। वह मिथ्या ही प्रतिबिम्ब रूप में घट में भासमान होता है। उसी प्रकार आत्मतत्व परब्रह्मस्वरूप में
स्थिर रहता है तथा देहात्मसंयोग से ही उसे जीव की चाह लगी रहती है। इस प्रकार देह धारण करने वाला जीव
५९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीन गुणों से भिन्न होकर देहसंग से भी अलिप्त रहता है। इस प्रकार मैंने जीव और शिव का साद्यंत दर्शन करा
दिया। लेकिन यह सब लोगों की समझ में न आने के कारण देहात्मवाद से वे भ्रांति में पड़े हैं। इससे अभिमान
उन्हें स्वर्ग-नरक के चक्र में डालकर नाना प्रकार की योनियों का भ्रमण कराता है। द्विज देह से प्रारम्भ कर
परमेष्ठी देह तक जाते हैं और सभी प्रकार के स्वर्गसुख को भोगते हैं। लेकिन जो पापी होता है वह अधोमुख
होकर ब्राह्मण से नीचे की जाति में जन्म लेकर अनेक प्रकार की दुःख योनियों को भोगता है। पाप और पुण्य का
कर्माचरण ही जन्म-मरण बढ़ाता है। उसमें भी जन्म-मरण के चक्र को काटने वाला कोई विरला भाग्यवान होता
है। जिन्होंने इच्छारहित रह कर पुण्य की राशियाँ बटोरी हैं, जिन्होंने स्वधर्म का जोड़ प्राप्त किया है, जिनके
अंतःकरण में प्राणिमात्र के प्रति दया रहती है और ब्राह्मण भजन में जिन्हें प्रेम रहता है, जो अहिंसा का मैका है,
'वसुधैव कुटुम्बकं' जिनका मन अद्वैतयुक्त है, जो सारासार राजहंस हैं और जो जीवन-मरण के चक्र से ऊब चुके
हैं जो उपनिषदों का अर्थ चातक की तरह ग्रहण करते हैं जो जीव के उत्पादक का संशोधन करते हैं, जो
आत्मतत्त्व के साधक हैं और जो सचमुच ही भावार्थी हैं, संतचरणों पर जिनकी पूर्ण भक्ति है और जो गुरुवचन
पर बिक चुके हैं, वे मेरी कृपा से इसी देह में विदेहता प्राप्त करते हैं। वे ही आत्मज्ञान के योग से देह का बन्धन
तोड़कर, जन्म-मरण के करोड़ों फेरे बचाकर सायुज्य की पताका लहराते हैं और उस पार पहुँचते हैं। जिस प्रकार
मृगजल में डूबने का भय नहीं है, उसी प्रकार संसाररूपी भँवर उन्हें बचाकर निकल गये। लेकिन मुक्त पुरुष
संसार में बहुत कम ही दिखायी देते हैं। सारा संसार ढूँढ़ने पर एकआध ही कोई दिखायी देता है। अस्तु ! लेकिन
यदि ऐसा कोई दिखायी दिया तो उसे पहचानेगा कौन ? क्योंकि उद्धव ! वहाँ भी आत्मा दिखायी नहीं देता।
ज्ञानसम्पन्न व्यक्ति यदि पास आकर मिला भी और उसका देह प्रपंच में व्यवहार करते दिखायी भी दिया तो भी
उसके भीतर का आत्मा किसी को दिखायी नहीं देता। आत्मा आया-गया ऐसा कहते अवश्य हैं किन्तु उसका
आना-जाना कोई देखता नहीं है। उसी की उत्पत्ति श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।
न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षणः ॥ ४८ ॥
पिता का आत्मा गया इसलिये पिता का देह नष्ट हो गया ऐसा कहते हैं लेकिन उसे जाते हुए कोई नहीं
देखता। कोई कहता है, पुत्र का जन्म होते ही आत्मा का जन्म होता है। लेकिन पुत्रोत्सव मनाते समय उसके देह
का ही गौरव किया दिखाई देता है। आत्मा दुर्गम ही रहता है, वह दिखायी नहीं देता। इसलिये इस संसार में
आत्मा का आना-जाना वास्तव में नहीं होता। इस दृष्टांत से सिद्ध होता है कि जन्म और मरण देह के ही लिये
है। आत्मा साक्षीरूप में अविनाशी ही है। इसी अर्थ का विवेचन श्रीकृष्ण विशद करके बता रहे हैं।
तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वाज्जन्मसंयमौ।
तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥
पर्वत पर बीज की उत्पत्ति और वृद्धि होने के कारण पर्वत उस वृक्ष का साक्षी होता है। लेकिन उस वृक्ष
को काटने से पर्वत को कोई दुःख नहीं होता। उसी प्रकार द्रष्टा देह का साक्षी है। प्रत्येक देह को द्रष्टा साक्षी है
किन्तु इस देह के धर्म द्रष्टा पर लागू नहीं होते। वह देह में रहते हुए भी विदेही ही रहता है। इसलिये उसे
संसारबंधन का स्पर्श नहीं होता। लेकिन यह रहस्य न जानकर लोग इस संसार से जुड़े हुए हैं। यही बात स्वयं
श्रीकृष्ण पाँच श्लोकों में वर्णन कर रहे हैं।
बाईसवाँ अध्याय ५९३
प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्यबुधः पुमान्।
त्वेन स्पर्शसम्मूढः संसारं प्रतिपद्यते॥५०॥
कर्म, अकर्म अथवा कर्त्तापन आत्मा के लिये नहीं है। इस अर्थ का निरूपण पहले ही आ चुका है। आत्मा
इनमें से किसी भी गुण का स्पर्श नहीं करता। देह में रहने वाला आत्मा देह से बिलकुल भिन्न रहता है क्योंकि
पुरुष प्रकृति से भिन्न है। यह आत्मज्ञान जिसे नहीं होता वही व्यक्ति संसार में घरजमाई बन कर बैठ जाता है।
उसने देहाभिमान से सामंजस्य स्थापित कर लिया है। विषय का सुख यही उसका पुरुषार्थ है, ऐसा दृढ़ निश्चय
होने के कारण वही इस संसार में शुभाशुभ कर्म के योग से नाना योनि का भोग भोगने को बाध्य करता है। विषय
सुख के अभिमान से देहाभिमान ही पुनः जन्म और पुनः मरण इस प्रकार नाना प्रकार की योनियों में फेरे लगाने
को बाध्य करता है। लेकिन उन अनेक योनियों में गर्भवास का दुःख मूर्ख लोग देहाभिमान के कारण ही भोगते
हैं। इसलिये उन नाना तत्त्वों का रूपक श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
सत्त्वसङ्गादृषीन् देवान् रजसासुरमानुषान्।
तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभिः॥५१॥
उद्धव! देहाभिमान के कारण इन तीन गुणों के कर्म घटते रहते हैं और उनके योग से तीन प्रकार के संसार
पीछे लग जाते हैं। वे इस प्रकार हैं—कृष्णार्पण किये बिना सात्त्विक कर्म करने से सत्त्वगुण क्षुब्ध होकर उत्तम देह
में जन्म होता है और उस सत्त्वगुण का अत्यन्त उत्कर्ष होने पर देवर्षि, ब्रह्मर्षि होकर उस सत्त्वगुण की समसाम्य
स्थिति से वे अजानबाहु तथा कल्प तक जीवित रहने वाले दीर्घायुषी हो जाते हैं। सत्त्वगुण युक्त कर्म घटने पर वे
स्वर्ग के देवता बन कर रहते हैं और वहाँ का भोग भोगने के बाद पुण्य समाप्त होने पर उनका अधःपात हो जाता
है और वे पुनः इस योनी में जन्म लेकर सत्त्वगुणसम्पन्न बन जाते हैं। राजस लोग रजोगुण का आश्रय लेकर राजसी
कर्म का आचरण करते हैं और जब राजसगुण क्षुब्ध हो जाता है तो वह किस योनी में जन्म दिलाता है? तो जो
लोग राजस कर्म ब्रह्मार्पण कर देते हैं, वे दैत्य जन्म लेकर भी भगवद्भक्त होते हैं और जो रजोगुण के उत्कर्ष से
सुखोपभोग की इच्छा करते हैं, वे महायोद्धा असुर होते हैं। जो रजोगुण से ही स्वकर्माचरण करते हैं, वे उस कर्म
के कारण ही ब्राह्मणजन्म पाते हैं और इसी रजोगुण के कम या अधिक परिमाण से चारों वर्णों का जन्म होता है।
तामस की संगति से तामस कर्माचरण करने से तमोगुण क्षुब्ध होता है, जो भयंकर नीच योनी में जन्म दिलाता है
और भूत, प्रेत, पिशाच, पक्षी, पाषाण आदि अनगिनत योनी के भोग भोगने को बाध्य करता है। (आशंका) कर्म
वास्तव में त्रिगुणात्मक है, किन्तु कर्मफलों का भोक्ता ईश्वर है यह निश्चय वेदशास्त्रों के आधार पर आपने कर ही
लिया। देह का साक्षी वह आत्मा निराला ही है, ऐसा सिद्धान्त आपने पिछले श्लोक में निश्चित किया था तो
कर्मफलों का भोक्ता यदि कर्म से अलग है तो फिर वह कर्मों का फल कैसे भोगता है? इस प्रकार की आशंका से
युक्त उद्धव का अंतःकरण जानकर श्रीकृष्ण इसी अर्थ का उत्तर विशद करके बता रहे हैं।
नृत्यतो गायतः पश्यन् यथेवानुकरोति तान्।
एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥५२॥
सभापति यदि कला-कौशल में निपुण हो और उसके सामने नृत्य और संगीत का कार्यक्रम हो रहा हो तो
नाचने-गाने वाले के सुर पर वह भी ताल देने लगता है। अब यदि यह पूछोगे कि वह ताल कैसे देता है, तो
प्रकृति केवल जड़ का अंश है और आत्मा ज्ञाता है। इसीलिये उसे भोक्ता कहते हैं। सभा में जो शांत बैठा रहता
५९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, वह भी नृत्यगायन के सुरों पर ठेका देता रहता है। इस प्रकार प्रकृति से अलग होते हुए भी पुरुष प्रकृति की
लीला का अनुसरण करता है। (आशंका) प्रकृति का अनुकरण कर यदि आत्मा सचमुच नित्यमुक्तता नष्ट हो
जायेगी क्योंकि जो कर्मफल का उपभोग करेगा, उसी पर कर्म का बन्धन लागू होगा और उस कर्म से आत्मा को
भी जन्म-मरण लगा हुआ है, यह कहना पड़ेगा और यदि वैसा हुआ तो आत्मा नित्यमुक्त और विकारातीत है यह
बात बहुत दूर चली गयी। अर्थात् आत्मा सांसारिक, गुणविकारी तथा बद्ध है। उद्धव! ऐसी शंका तुम करोगे।
किन्तु आत्मा गुणकर्म से अलिप्त है यह बात श्रीकृष्ण और दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः॥५३॥
जिस प्रकार कोई आदमी नदी के किनारे पर के वृक्ष को पानी में बहते हुए देखता है, उसी प्रकार माया के
गुणों के संसर्ग से आत्मा में भी विकार का आभास होता है। जिसकी आँखों के आगे चक्कर आता है उसे सारी
पृथ्वी के ही घूमने का आभास होता है। उसी प्रकार इस माया के विकारों का समुदाय भी आत्मा के लिये मिथ्या
ही है। जो घोड़े पर बैठकर पानी के प्रवाह की ओर देखता है उसे स्वयं पानी में ही बहने का आभास होता है।
इस प्रकार आत्मा नित्य और निर्विकार है और उसमें अनेक गुण हैं जो मायात्मक हैं। वे वास्तव में कल्पनामय
होने पर भी, लोग उन्हें सच मान लेते हैं, ब्रह्मदेव से लेकर तृण तक जो असंख्य योनी हैं, वे विकारयुक्त हैं और
उनमें कर्म, क्रिया, फल का भोग ये सारी बातें मन से ही उत्पन्न हुई हैं। भगवान की ये बातें सुनकर उद्धव को
अतीव आनन्द हुआ और उस आनन्द के आवेग में वह भी वैसी ही लीलायें करने लगा। उद्धव के मन का ताप
दूर करने के लिये सर्वज्ञ श्रीकृष्ण स्वयं ज्ञानोपदेश कर रहे थे। इसलिये. जिससे उद्धव को आनन्द प्राप्त हो ऐसा
ही निरूपण श्रीकृष्ण करते थे।
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।
स्वप्नदृष्टाश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥५४॥
आत्मा नित्ययुक्त और अविकृत ही है। लगता है वह संकल्प से ही विकारी हो गया है। वास्तव में वह
असंसारी ही है किन्तु मनोविकारों से ही उसे संसारी कहते हैं। इस प्रकार वहाँ दूसरा कोई न होने के कारण कथा
वार्त्ता कुछ भी नहीं कहा जा सकता। श्रोता और वक्ता अलग-अलग हों तभी यह सम्भव है। अकेला आदमी
चलते-चलते थक जाने पर स्वयं ही राजा बन जाता है और अपना मनोराज्य चलाता है और शत्रु के आने की
कल्पना कर युद्ध के लिये तैयार होता है और उस युद्ध के लिये उसमें इतना अधिक स्फुरण होता है कि वह
अपने ही स्थान पर उछलने-कूदने लगता है। इतने में पैर किसी वस्तु में फँस कर वह लड़खड़ा कर गिर पड़ता
है। इस प्रकार वह मिथ्या भ्रम और भ्रान्ति में पड़ जाता है और चलते-चलते मृगजल से उस पार जाने के लिए
उसमें कूद पड़ता है। आकाश में जब बड़े-बड़े बादल एकत्र हो जाते हैं तो उसमें बड़े-बड़े, महल और
अट्टालिकाएँ दिखायी देने लगती हैं लेकिन जोर की हवा चलने पर वहाँ शून्याकार हो जाता है। इस प्रकार यह
संसार ही काल्पनिक होने के कारण उसके सुख-दुःख भी मेरे भक्तों को मायिक मालूम होते हैं। दाशार्ह वंश में
जन्म लेकर तुम उत्तम स्थिति तक पहुँचे हो। स्वप्न के सुखोपभोगों को जिस प्रकार हम स्वप्न में ही सच मानते
हैं, उसी प्रकार संसार एक दीर्घ स्वप्न है, इसलिये वह केवल मिथ्या और मायिक है। जागृत होने पर जिस प्रकार
स्वप्न मिथ्या मालूम होता है, उसी प्रकार निरहंकार में स्वप्न भी मिथ्या ही है। उद्धव! ब्रह्मज्ञान की यही प्रमुख