सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 610, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 610

५९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, वह भी नृत्यगायन के सुरों पर ठेका देता रहता है। इस प्रकार प्रकृति से अलग होते हुए भी पुरुष प्रकृति की
लीला का अनुसरण करता है। (आशंका) प्रकृति का अनुकरण कर यदि आत्मा सचमुच नित्यमुक्तता नष्ट हो
जायेगी क्योंकि जो कर्मफल का उपभोग करेगा, उसी पर कर्म का बन्धन लागू होगा और उस कर्म से आत्मा को
भी जन्म-मरण लगा हुआ है, यह कहना पड़ेगा और यदि वैसा हुआ तो आत्मा नित्यमुक्त और विकारातीत है यह
बात बहुत दूर चली गयी। अर्थात् आत्मा सांसारिक, गुणविकारी तथा बद्ध है। उद्धव! ऐसी शंका तुम करोगे।
किन्तु आत्मा गुणकर्म से अलिप्त है यह बात श्रीकृष्ण और दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः॥५३॥
जिस प्रकार कोई आदमी नदी के किनारे पर के वृक्ष को पानी में बहते हुए देखता है, उसी प्रकार माया के
गुणों के संसर्ग से आत्मा में भी विकार का आभास होता है। जिसकी आँखों के आगे चक्कर आता है उसे सारी
पृथ्वी के ही घूमने का आभास होता है। उसी प्रकार इस माया के विकारों का समुदाय भी आत्मा के लिये मिथ्या
ही है। जो घोड़े पर बैठकर पानी के प्रवाह की ओर देखता है उसे स्वयं पानी में ही बहने का आभास होता है।
इस प्रकार आत्मा नित्य और निर्विकार है और उसमें अनेक गुण हैं जो मायात्मक हैं। वे वास्तव में कल्पनामय
होने पर भी, लोग उन्हें सच मान लेते हैं, ब्रह्मदेव से लेकर तृण तक जो असंख्य योनी हैं, वे विकारयुक्त हैं और
उनमें कर्म, क्रिया, फल का भोग ये सारी बातें मन से ही उत्पन्न हुई हैं। भगवान की ये बातें सुनकर उद्धव को
अतीव आनन्द हुआ और उस आनन्द के आवेग में वह भी वैसी ही लीलायें करने लगा। उद्धव के मन का ताप
दूर करने के लिये सर्वज्ञ श्रीकृष्ण स्वयं ज्ञानोपदेश कर रहे थे। इसलिये. जिससे उद्धव को आनन्द प्राप्त हो ऐसा
ही निरूपण श्रीकृष्ण करते थे।
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।
स्वप्नदृष्टाश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥५४॥
आत्मा नित्ययुक्त और अविकृत ही है। लगता है वह संकल्प से ही विकारी हो गया है। वास्तव में वह
असंसारी ही है किन्तु मनोविकारों से ही उसे संसारी कहते हैं। इस प्रकार वहाँ दूसरा कोई न होने के कारण कथा
वार्त्ता कुछ भी नहीं कहा जा सकता। श्रोता और वक्ता अलग-अलग हों तभी यह सम्भव है। अकेला आदमी
चलते-चलते थक जाने पर स्वयं ही राजा बन जाता है और अपना मनोराज्य चलाता है और शत्रु के आने की
कल्पना कर युद्ध के लिये तैयार होता है और उस युद्ध के लिये उसमें इतना अधिक स्फुरण होता है कि वह
अपने ही स्थान पर उछलने-कूदने लगता है। इतने में पैर किसी वस्तु में फँस कर वह लड़खड़ा कर गिर पड़ता
है। इस प्रकार वह मिथ्या भ्रम और भ्रान्ति में पड़ जाता है और चलते-चलते मृगजल से उस पार जाने के लिए
उसमें कूद पड़ता है। आकाश में जब बड़े-बड़े बादल एकत्र हो जाते हैं तो उसमें बड़े-बड़े, महल और
अट्टालिकाएँ दिखायी देने लगती हैं लेकिन जोर की हवा चलने पर वहाँ शून्याकार हो जाता है। इस प्रकार यह
संसार ही काल्पनिक होने के कारण उसके सुख-दुःख भी मेरे भक्तों को मायिक मालूम होते हैं। दाशार्ह वंश में
जन्म लेकर तुम उत्तम स्थिति तक पहुँचे हो। स्वप्न के सुखोपभोगों को जिस प्रकार हम स्वप्न में ही सच मानते
हैं, उसी प्रकार संसार एक दीर्घ स्वप्न है, इसलिये वह केवल मिथ्या और मायिक है। जागृत होने पर जिस प्रकार
स्वप्न मिथ्या मालूम होता है, उसी प्रकार निरहंकार में स्वप्न भी मिथ्या ही है। उद्धव! ब्रह्मज्ञान की यही प्रमुख