श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 599, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ अध्याय ५८३
इस प्रकार तीन गुणों के विकार से और काम्य कर्म के संस्कार से, अहंकार से प्रबल होकर वह अनेक कारणों
से संसार में परिभ्रमण करता है। लेकिन प्रकृति के इस विकार से आत्मा अत्यन्त भिन्न है। मृगजल उत्पन्न कर
जिस प्रकार सूर्य आकाश में अलिप्त रहता है, सर्प का आकार प्रकट कर स्वयं डोर जिस प्रकार सर्प का स्पर्श
भी नहीं करती, उसी प्रकार परमात्मा भी संसार उत्पन्न कर स्वयं निःसंग और निर्विकार ही रहता है। जिस प्रकार
स्फटिक जिस रंग पर रखो उसी रंग का दिखायी देगा लेकिन वह स्वयं उन रंगों से अलग सफेद ही होता है,
उसी प्रकार गुणों के सम्पर्क से जीवात्मा भी बद्ध दिखायी देता है, फिर भी वह नितांत शुद्ध ही है। लेकिन यह
ज्ञान न होने के कारण भिन्न-भिन्न मत के लोग व्यर्थ का विवाद करते रहते हैं। कोई कहता है, आत्मा देहधारी
है, कोई उसे विदेही कहता है और कोई उसे स्पष्ट नकार देता है। कोई कहता है, आत्मा सगुण है, कोई कहता
है वह निर्गुण है तो कोई कहता है कि वह परमात्मा सगुण और निर्गुण दोनों है। कोई द्वैत को प्रतिपादित करता
है, तो कोई अद्वैत का प्रतिपादन करते हैं। कोई कहता है, ये दोनों असंबद्ध हैं और हमारे मत के अनुसार
देहात्मवाद ही सही है। कोई कहता है यह सभी गलत है। यहाँ जो प्रपंच दिखायी देता है, वही सच है ऐसा
कुछ लोग कहते हैं। इन सबका विचार करने पर ये सभी अज्ञानमूलक मालूम होते हैं क्योंकि आत्मा पूरी तरह
ज्ञानस्वरूप और सभी भेदों का निवारण करने वाला है। 'आत्मा परिज्ञानमयः' अर्थात् आत्मा प्राणस्वरूप है यही
मूल श्लोक है, इसलिये अज्ञान का भेद ही नहीं रह जाता। आत्मा शुद्ध, बुद्ध और ज्ञानरूप है, यही सिद्ध होता
है। जिस प्रकार नक्षत्र आदि के साथ रात्रि को समाप्त कर सूर्य प्रकट होता है, उसी प्रकार भेदों के साथ कार्य
का भी लोप कर ज्ञानसूर्य ज्ञानरूपी किरणों से प्रकट होता है। तब माया भी गुणों के साथ नष्ट हो जाती है,
वाद-विवाद भी तमाम भेदों के साथ मिट जाता है, अज्ञान समूल नष्ट हो जाता है और चारों ओर सच्चिदानन्द
भर जाता है। आत्मा सच्चिदानन्द से परिपूर्ण होने के कारण उसके आगे सारा अज्ञान व्यर्थ हो जाता है। अज्ञान
को नष्ट करने का वह सबसे अच्छा साधन है। विवेक अथवा सांख्य दर्शन व्यर्थ है, ऐसा लगता है। उसी विषय
का निरूपण आधे श्लोक में श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३॥
मूलतः अज्ञान मिथ्या होता है, इसलिये विषय का भान भी अज्ञानजन्य ही है। लेकिन यही देखकर लोग
भ्रम में पड़ जाते हैं अतः उन्हें स्वस्वरूप का विस्मरण हो जाता है। मैं साक्षात परमात्मा उनके हृदय में अत्यन्त
निकट होते हुए भी, उनकी बुद्धि मुझसे पराङ्मुख होती है और इसीलिये उनमें विषयासक्ति उत्पन्न होकर घरबार,
पत्नी-बच्चे, देह आदि में ही रुचि होने लगती है। स्वस्वरूप का विस्मरण ही विषय का चिन्तन बढ़ाता है और
उसी देहाभिमान के कारण जीवों को अनिवार्य जन्म-मरण प्राप्त होता है। उस देहाभिमान का नाश करने के लिये
ही मैंने वैराग्य युक्त ज्ञानध्यान का साधन करने का ढंग बताया क्योंकि वही समूल अज्ञान का विनाशक है। जब
तक शरीर में देहाभिमान है, तब तक साधन भी आवश्यक ही है। अज्ञान का पूरी तरह क्षालन होने पर, साधन
व्यर्थ हो जाता है, यह मैं भी मानता हूँ। यह वह अज्ञान है जो शुद्ध स्वरूप में जीव का भाव उत्पन्न करता है।
वही जीव में अनिवार्य जीवन-मरण का चक्र लगा देता है। हे उद्धव! आत्मस्वरूप का विस्मरण हो देह में जो
अहंता उत्पन्न होती है वही दृढ़ अज्ञान है। वही देहाभिमान है। अज्ञान यह नाम गौण ही है। वास्तव में देहाभिमान
ही मुख्य है। भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव चौंक उठा। इसलिये वह उसी अर्थ का प्रश्न भगवान से स्वयं
ही पूछने लगा। वह प्रश्न इस प्रकार था कि देहाभिमान किस तरह जन्म-मरण का भोग लगाता है ?