श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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इन्द्रिय है और संकल्प उसका शक्तिशाली विषय है और वहाँ निर्मल चन्द्रमा अधिदैव है। लेकिन आत्मा मन से
निराला ही है। 'अहंकार' यह इन्द्रिय अत्यन्त बलवान है। 'मैं' का भाव यही उसका विषय है। रुद्र उसका
अधिदैव है। किन्तु परमात्मा अहंकार से बिलकुल भिन्न है। बुद्धिरूप इन्द्रिय अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न है। 'जानना'
यही उसका विषय है। वहाँ ब्रह्मदेव 'अधिदैव' है लेकिन ज्ञानरूप आत्मा बुद्धि से बिलकुल अलग ही है। अब
तक कारण के साथ चित्तचतुष्टय और उसकी त्रिपुटी के बारे में बताया। अब कर्मेन्द्रियों का भी लक्षण
बताऊँगा, सुनो। वाणी के इन्द्रिय में भाषण यह विषय रहता है। वहाँ अग्नि अधिदैव रहता है। उसमें शक्ति
सरस्वती का निवास रहता है। लेकिन आत्मा महामौन रह कर उससे अलिप्त ही रहता है। हस्तेन्द्रिय का विषय
है, 'ग्रहण'। उसका अधिदैव इन्द्रिय है। वहाँ क्रियाशक्ति रहती है। लेकिन अपने अक्रियत्व से, वहाँ भी आत्मा
अलिप्त ही रहता है। पैर नामक इन्द्रिय का विषय गति है और उसका अधिदैव उपेन्द्र है। उसमें गमनशक्ति का
वास है। लेकिन निश्चलत्व के कारण आत्मा वहाँ भी अलिप्त ही रहता है। गुदेन्द्रिय का विषय मलोत्सर्ग है।
वहाँ अधिदैव निऋति है। उसमें क्षरशक्ति है लेकिन वहाँ भी आत्मा अलिप्त ही रहता है। शिस्नेन्द्रिय का विषय
है, रति। वहाँ प्रजापति अधिदैव है और वहाँ आनन्दशक्ति का निवास रहता है। किन्तु परमानन्द के योग के
कारण आत्मा वहाँ भी अलिप्त ही रहता है। ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय के योग से कर्म का आचरण घटता है।
यही चित्तचतुष्टय का लक्षण है। गुणक्षोभ का भी वही कारण होने के कारण वह सारा मायिक है। गुणक्षोभ का
प्रमुख मूल वही है। वही प्रकृति के विकार से जड़रूप होता है और आत्मा अविकारी और निर्मल होने के
कारण प्रकृति से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति पैत्रिक भूमि के साथ सभी साहित्य बड़े
अभिमान से घर में सम्पादन करता है, फिर भी उससे अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार इन तीन गुणों के क्षोभ
से अभिमान नाना प्रकार के विकारों का जंगल कायम करता है, किन्तु आत्मारूप वसंत निराला ही रहता है।
उसी का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतुर्वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥
आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यास्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः।
सचमुच 'मैं' और 'मेरा' इस लगन के कारण ही जीव के पीछे संसार लगा हुआ है। उस अहंकार की
निवृत्ति से ही जीव को संसार से छुटकारा मिलेगा। लेकिन यह असह्य अहंकार कहाँ से उत्पन्न हुआ? इसका भी
उत्तर देता हूँ। स्वस्वरूप को भूलकर मन में जिस दृढ़ अहं का स्फुरण होता है, वही अहंकार है। विकार से तीन
गुणों का क्षोभ वही करता है। जागृति का विस्मरण ही स्वप्न सृष्टि का विस्तार है और स्वरूप से विमुख होने
वाला अहंकार ही त्रिगुणात्मक संसार है। विकार के योग से तीन गुण क्षुब्ध होते हैं। विस्मरण मोह का लक्षण
है। उस विकार के तीन गुण विकृत हो गये इसलिये अब उसके भाग सुनो। मूल रूप में जिसे 'वैकारिक' कहा
है वही सात्त्विक अहंकार है। वही चित्तचतुष्टय का द्योतक तथा अधिदैवों का प्रकाशक है। सत्त्व से मन उत्पन्न
होता है और मन से प्रचण्ड विकार उत्पन्न होते हैं। इसीलिये सत्वगुण को भी विकृत गुण ही कहते हैं।
ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय पंचक ये दोनों मिलकर दशेन्द्रिय होते हैं। उन्हें रजोगुण प्रकाशित करता है, इसलिये
उस रजोगुण को 'इन्द्रिय सम्बन्धी' कहते हैं। अब इसमें तामस नाम का जो गुण है वह आकाशादि सूक्ष्म
पंचतत्त्व जो महाभूतों को आच्छादित करते हैं, उन्हें विषयों के साथ उत्पन्न करता है। इस प्रकार महाभूत और
पाँच विषय इनको तमोगुण प्रकाशित करता है इसलिये उसे आदरपूर्वक भूतादि (भूतों से पहले का) कहते हैं।