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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 869 में से

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पृष्ठ 601

बाईसवाँ अध्याय ५८५
प्रवेश करता रहता है। आत्मा देह से बिलकुल भिन्न और अलिप्त रहता है लेकिन देह के साथ रहने का आभास
कराता है। उसका यह कौशल अद्भुत है। उसका भी लक्षण सुनो। घट जिधर-जिधर जाता है, उधर-उधर उसके
साथ घटाकाश भी जाता दिखायी देता है लेकिन वास्तव में आकाश नहीं हिलता। उसी प्रकार इस आत्मा का
जाना है। घट में अमृत भरा हो या मलमूत्र, फिर भी उन दोनों से आकाश अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार देह में
रहने वाला आत्मा सुख-दुःख से अलग ही रहता है। घट पर पत्थर मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े भी कर दें
लेकिन आकाश पर एक खरोंच भी नहीं आती। उसी प्रकार नश्वरों में आत्मा सचमुच अनश्वर रहता है। घट जब
फूट कर नष्ट हो जाता है, उस समय भी आकाश स्वयंसिद्ध आकाश में ही रहता है। नया घर बनने पर आकाश
उसे भी व्याप लेता है। उसी प्रकार यह देह अशाश्वत है और आत्मा अखण्डता से परिपूर्ण है। उसे न दूसरे देह
में प्रवेश करना है और न जन्म-मरण का भोग भोगना है। जीव का एक देह से दूसरे देह में प्रवेश करना यह
क्रिया वासना मन के माध्यम से करती है। वह मन जीव के साथ दूसरे देह में कैसे जाता है, उसे सुनो।
ध्यायन्मनोऽनुविषयान् दृष्टान् वानुश्रुतानथ ।
उद्यत् सीदत् कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनुशाम्यति ॥ ३७ ॥
मन सदा देखी हुई और सुनी हुई बातों का ध्यान करता रहता है। मन का यह ध्यान बहुत कठिन और
भयंकर होता है। इसलिये उसे और कुछ भी नहीं सूझता। अंतकाल में मन किसी चहेती वस्तु के ध्यान में मग्न
हो जाता है और तब वह तदाकार हो जाता है। वह सर्वभाव से उसमें मिल जाता है। जब पहला भोग समाप्त हो
जाता है तो मन सहज ही पहले देह का अभिमान भूल जाता है और अगले देह का ही एकाग्र होकर ध्यान करता
रहता है। विषयवासना पर लुब्ध हुआ मन, अपने कर्मानुसार प्राण के साथ दूसरे देह में संचार करता है। पहले जो
देह छोड़ दिया है, उसका चित्त को जरा भी स्मरण नहीं होता और मैंने नया देह धारण कर लिया है इसका भी
मन को स्मरण नहीं होता।
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत् स्मरेत् पुनः ।
जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तस्मृतिः ॥ ३८ ॥
जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद ।
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः ॥ ३९ ॥
मन विषयलोलुपता से जिस स्वरूप का चिन्तन करता है, उसमें ही वह स्वयं पूर्वदेह की स्मृति भूलकर
तद्रूप बन कर रहता है। वह पूर्वदेह को कैसे भूलता है? तो जिस प्रकार आयु बढ़ने पर, प्रौढ़ होने पर हम अपना
बचपन भूल जाते हैं, उसी प्रकार वह भी अपने पूर्वदेह को भूल जाता है। इस प्रकार का सम्पूर्ण विस्मरण, यही
देह का मरण है। उस विस्मरण के साथ ही चेतना प्राणों के साथ चली जाती है। चेतना जब प्राणों के साथ चली
जाती है तब देह को प्रेत की अवस्था प्राप्त होती है। उद्धव! इसी का नाम मृत्यु है। अब जन्म की बात सुनो।
मृत्यु के समय स्नेह से, द्वेष से अथवा भय से जैसा ध्यान रहता है, उसी के तद्रूप वह होता है और उसे वैसा ही
जन्म प्राप्त होता है। भरत को अनुष्ठान करते समय स्नेह से मृग का ध्यान आ गया तो वह स्वयं मृग बन गया
क्योंकि उसके ध्यान के अनुरूप मन का जन्म हुआ। कीटकी भय से भृंग का ध्यान कर रही थी अतः वह तद्रूप
हो गयी। पौण्ड्रक ने द्वेष से श्रीकृष्ण का ध्यान किया अतः उसे तद्रूपता प्राप्त हुई। इससे मन को जिस विषय का
ध्यान लगा रहता है, वैसी ही गति उसे प्राप्त होती है। संसार का विस्तार हमने स्वयं किया रहता है अतः