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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 595, कुल 869 में से

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पृष्ठ 595

बाईसवाँ अध्याय ५७९
भक्ति से यही अभिमान देहरूप किले में प्रबल होकर सरजोर बन जाता है। देहरूप किले में तीन गुण और
अहंकारादि विकार की सामग्री भरी रहती है। यह वास्तविक प्रकृति है जो देहाकार दिखाई देने लगती है।
आकाश में आभासित गंधर्व नगर में अट्टालिकाएँ, शिखर, जंगल, बाग आदि दिखायी देते हैं, उसी प्रकार प्रकृति
स्वयं नाना रूपों में भासमान होती है। मृगजल की नदी दूर से बड़े प्रवाह के रूप में बहती दिखायी देती है, उसी
प्रकार प्रकृति के नाना प्रकारों का आभास होता है। इस प्रकार प्रकृति का यह किला अत्यन्त भयंकर है और
उसमें अहंकार कैसे-कैसे विकारों की सामग्री भर देता है, उसके सम्बन्ध में बताता हूँ।
ममाङ्ग माया गुणमप्यनेकधा विकल्पबुद्धींश्च गुणैर्विधत्ते ।
वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥ ३० ॥
मेरी माया ही स्वयं स्वरूप से त्रिगुणात्मक हो गयी है। लेकिन वे तीनों गुण, अभिमान ने अपने अधिकार
में रखे हैं। उसी देहरूपी किले के सामने उन तीन गुणों की खाई खन कर तथा त्रिपुटी की सुव्यवस्थित रचना कर
अभिमान भयानक मारकाट करता रहता है। उस किले की सुरक्षा त्रिपुटी करती है। उस त्रिपुटी का मूल स्वरूप
भी अब मैं तुम्हें बताता हूँ। हे बुद्धिमान उद्धव ! उस देहरूपी किले के तीन मार्ग हैं उसमें दो चोर रास्ते हैं और
एक सरल रास्ता है। उन सभी रास्तों के बारे में मैं तुम्हें बताता हूँ। उस मार्ग में दस स्थानों पर सेना खड़ी रहती है
और अन्त में युद्ध करने वाला सैनिक खड़ा निरीक्षण करता रहता है। वे मार्ग चारों ओर से अवरुद्ध रहते हैं और
तीन मार्गों पर रक्षक रहते हैं। फिर ऐसी जगह अत्यन्त कष्ट से जाने की ज्ञानी को क्या आवश्यकता है ? देहरूपी
किले पर कठोर सामग्री की व्यवस्था है। कार्य, कारण और कर्तव्यता; कर्म, क्रिया और अहं यह कर्त्ता; ध्येय
ध्यान और विषयों का ध्यान करने वाला; इस त्रिपुटी से यह किला बिल्कुल सुदृढ़ है और उसमें भोग्य, भोग
और भोक्ता; कर्म, कार्य और कर्त्ता; यह अभिमान प्रवृत्ति की सहमति से वहाँ अधिकार जमा कर बैठा हुआ है।
वह चोरद्वार से देखता रहता है और काम क्रोध की खिड़की खोल कर एकाएक हमला बोल देता है। तब सारे
लोग थरथर काँपने लगते हैं। उनकी दहशत से तपस्वी लोग इधर-उधर भागने लगते हैं। लंगोटी छोड़ कर
दिगम्बर घूमने वालों को भी क्रोध थर-थर कँपा देता है। लोभरूपी तोपखाना शुरू होकर गोलों की आवाज होने
लगती है, जिससे चारों ओर अज्ञान का धुआँ फैलने लगता है। महामोह के धुंध से दिशाएँ भर जाती हैं और कहीं
कुछ दिखायी नहीं देता। इस किले के चारों ओर नौ बारादरी रहती हैं, उन्हें दाग कर विषय गोलाबारी करते रहते
हैं। देहाभिमान का मुख्य चालक है, मन। उसकी मार महाभयंकर है। वह किसी भी तरह पीछे नहीं हटता और
किले के बंदोबस्त अपने हाथ में रखता है। इसलिये जब शत्रु भी सीढ़ी चढ़कर शीघ्रता से आगे बढ़ते हैं तो उस
दसवें द्वार का मार्ग भी किवाड़ लगाकर बन्द किया रहता है। इस प्रकार मन स्वयं ही इस देहरूपी किले की
सुरक्षा करता है और उसका अंतर्बाह्य संरक्षण करने के लिये स्वयं ही नीड़ बनाता है। काम का हाथ पकड़ कर
वही मन शत्रु से मुकाबला करता है और उसकी अगली पंक्ति के वीरों को धराशायी कर देता है। इस प्रकार मन
की मार अत्यन्त कठिन है। उसने अपने त्रिविध ताप से लोगों को जर्जर कर हाय-हाय करने के लिये बाध्य कर
दिया है। देवताओं से जो ताप होता है उसे आधिदैविक, मन से जो ताप होता है उसे आध्यात्मिक और
पंचमहाभूतों से जो ताप होता है, वह भौतिक, इस प्रकार ताप तीन प्रकार के होते हैं। महाभूत सत्त्वगुण से
अंतःकरण, रजोगुण से इन्द्रिय तथा तमोगुण से विषयभाव की उत्पत्ति करते हैं, यह ध्यान में रखो। इसके
अतिरिक्त इन तीन गुणों से नाना विकार उत्पन्न होते हैं, उसका कारण यह प्रकृति ही है। इस प्रकार इस किले पर