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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 597, कुल 869 में से

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पृष्ठ 597

देता है। वे घट ही रहते हैं और समाप्त हो जाते हैं, लेकिन जैसा रहना चाहिये, वैसा ही रहता है। उसी प्रकार
चित्स्वरूप, परमात्मा श्रीपति उत्पत्ति, स्थिति और लय इन अवस्थाओं में अलिप्त ही रहता है। वह परमात्मा आदि
का अनादि है, बुद्धि की अनादि बुद्धि है और वास्तव में सिद्धि की अनादि सिद्धि भी वही परमात्मा है। प्रकाश
का प्रकाशक यही है, सूर्य का आदिसूर्य भी यही है; और त्रिपुटी का द्योतक भी यही परमात्मा है और वह
अलिप्त है। विवेक का भी विवेक यह है, सुख का सुखदायक भी यही है, बुद्धि का बोधक और प्रकाश का
प्रकाशक भी यही परमात्मा है। ज्ञानाभिमान से उसे जानने के लिये गये वेद भी लज्जित हो गये, स्मृति और पुराण
तो पगला गये। शास्त्र पठन से वाद-विवाद करने पर भी वह समझ में नहीं आता। देव, देवी और देवता; भोग्य,
भोग और भोक्ता; इस प्रकार नानाप्रकार की त्रिपुटी की जो त्रिगुणता उत्पन्न होती है, वह यह प्रकृति ही कराती
है। यह परमात्मा आदि, अव्यक्त और अतर्क्य है तथा प्रकृति से भिन्न है। उसे जानने के लिये दूसरों के विचार
उपयोगी नहीं है। इसे इसके ही सामर्थ्य से हृदय में देखना चाहिये, इसके ही योग से इसे परिपूर्णत्त्व से पहचानना
चाहिये, इसका ही हाथ पकड़ कर इसे प्राप्त करना चाहिये और वह भी उसकी ही कृपा से प्राप्त होता है। यह
स्वयं ही स्वप्रकाशित है। इसके ही प्रकाश से इसे देखें और इसके ही योग से इसके स्वरूप में मिल जायें।
अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत आदि का वर्णन नेत्र द्वारा यहाँ बतलाया, उसी प्रकार अन्य इन्द्रियों में भी उनकी
व्याप्ति किस प्रकार होती है, इसका वर्णन देव संक्षेप में करेंगे।
एवं त्वचादि श्रवणादि चक्षुर्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्।
योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलान्महतः प्रसूतः ॥ ३१ ॥ (अ)
प्रकृति से महत्तत्त्वादि द्वारा अनेक विकार फैलते हैं, और गुणों का क्षोभ होने के कारण वे विकार पूर्ण
रूप से उफन कर त्रिपुटी के स्वरूप में आडम्बर फैलाते हैं। जिस प्रकार सूर्य के योग से नेत्रादि इन्द्रियों के
व्यापार चलते हैं उसी प्रकार कर्ण, त्वचा, जिह्वा और नाक आदि ज्ञानेन्द्रिय पंचक का कार्य त्रिपुटी के रूप में
घटता रहता है। इसमें जो दूसरे पाँच कर्मेन्द्रिय हैं, वे ज्ञानेन्द्रिय के अधीन होते हैं। हाथ, पैर, गुहा, शिस्न और
पाँचवीं वाणी इन्हें ज्ञानेन्द्रिय प्रेरणा देते हैं, तभी वे कर्मेन्द्रिय क्रिया करने लगते हैं। इस प्रकार ये दो पंचक
मिलाकर दस इन्द्रिय होते हैं, इसे ध्यान में रखो। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन्हें ही चित्तचतुष्टय चमत्कार
कहते हैं। वास्तव में ये एक ही हैं किन्तु उनका प्रकार भिन्न-भिन्न है। जिसका जैसा व्यापार है, वैसा उसका
नाम है। उद्धव ! केवल देह के आकार के कारण ही जो 'मैं' की भावना आती है, वह प्रबल अहंकार है। गहन
संकल्प और विकल्प, यही मन है। पूर्व में किये भोगों का स्मरण ही चित्त का स्वरूप है। कोई दृढ़ निश्चय हो
जाना यही 'बुद्धि' है। गुणक्षोभ का यह लक्षण ही भोग के साधन से भोग्य बन जाता है। लेकिन भोक्ता उससे
अलग होता है। उसका भी लक्षण सुनो। जहाँ त्वचा को विषयों का स्पर्श होता है, वहाँ वायु अधिदैव है।
लेकिन परमात्मा उससे भिन्न होता है। ज्ञानस्वरूप होने के कारण वह अविकारी ही होता है। रसनेन्द्रिय अत्यन्त
श्रेष्ठ है और रस उसका विषय है। उसका अधिदैवत स्वयं वरुण है। लेकिन आनन्द से परिपूर्ण आत्मा उस रस
से अलग ही है। श्रवणेन्द्रिय का विषय शब्द है। वहाँ दिशा अधिदैव है यह प्रसिद्ध ही है। किन्तु शब्द में मूल
आत्मा निःशब्द ही रहता है और वह अविकृत रहता है। नेत्रेन्द्रिय का लक्षण पहले ही बता दिया है। ज्ञानेन्द्रियों
की स्थिति इस प्रकार है। इसी रीति से त्रिपुटी बनती है। इसमें चित्त नाम का जो इन्द्रिय है उसे चिंतन का
विषय प्राप्त है। वहाँ वासुदेव अधिदैव है। लेकिन आत्मा चित्त से अलग है। मन यह एक अत्यन्त चंचल