सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 606

व्याप्त हुआ मन पर्याप्त देहाभिमान एकत्र कर लेता है। फिर चालीस से साठ वर्ष तक देह की उतरती कला पूर्ण
होकर शरीर पर झुर्रियाँ आने लगती हैं और काल उन इन्द्रियों की शक्ति नष्ट करने लगता है। जब काल शरीर को
क्षीण करना प्रारम्भ करता है, वह देह की सातवीं 'उत्तरावस्था' है। इस अवस्था का हाथ पकड़ कर आने वाली
'वार्धक्यावस्था' बड़े-बड़े शूरवीरों को भी विचलित कर देती है। इन्द्रियों के सुख विलास के व्यापार और
उत्तमोत्तम आहार शरीर को सहन नहीं होते। उस जरा ने शरीर की रचना अस्तव्यस्त कर दी होती है। दाँत टूट
कर वहाँ गड्ढे बन जाते हैं, भय से केश सफेद हो जाते हैं और मस्तक काँपने लगता है। वार्धक्य शरीर को
बिलकुल क्षीण कर देता है, फिर भी विषयों की इच्छा प्रबल रहती है। चिन्ता अपार और भयंकर ! आशा तो पूर्ण
नहीं होती। आँखों का तेज जाता रहता है, कानों से सुनायी नहीं पड़ता, मुँह से लार गिरने लगती है, फिर भी वह
देहाभिमान को बढ़ाता ही रहता है। समय आने पर मानसिक और शारीरिक रोग प्रकट होने लगते हैं, महामोह से
बुद्धि भ्रमित हो जाती है और विचार करने की शक्ति तो बिलकुल नष्ट हो जाती है। चलते समय पैर आपस में
लड़खड़ाने लगते हैं और सहारे के लिये लाठी लेनी पड़ती है। जीभ भारी हो जाती हे और शब्द स्पष्ट सुनाई नहीं
पड़ते। होंठ चूहे की तरह हिलते रहते हैं। आँखों से कीचड़ निकलता है, मुँह में लार भर जाती है, नाक से
निकलने वाला मल होठों पर बहने लगता है। मुख का चुम्बन भी कोई नहीं माँगता क्योंकि वह देने वाली स्त्री
थूक देख कर दूर भाग जाती है। खाँसी के कारण क्षण भर के लिये विश्राम नहीं मिलता, साँस फूलती है और
खाँसी का दौर चलता रहता है। शरीर काँपता रहता है, फिर भी देहाभिमान कम नहीं रहता। 'कल के बच्चे'
कहकर वह लोगों को पुरानी बातें सुनाने बैठ जाता है। अपानवायु का वाद्य तो निरन्तर बजने लगता है। इस
प्रकार जीवित अवस्था में ही जीव का उपहास करने वाली वह 'जरा' इस देह की आठवीं अवस्था है। जिस
प्रकार सुई के पीछे धागा रहता है, उसी प्रकार 'जरा' के साथ 'मरण' लगा हुआ है। जरा जब शरीर को क्षीण
करता है तो मृत्यु का झंडा लहराने लगता है। देह की नाड़ियाँ पोली होने लगती हैं, आवाज लड़खड़ाने लगती है,
फिर देह का आकर्षण रहता ही है। स्त्री और बच्चों की चाहत पहले से अधिक बढ़ने लगती है। मेरे बाद ये
अनाथ हो जायेंगे, इन्हें कौन सँभालेगा ? इस विचार से वह बच्चों को गले लगा कर फुक्का फाड़ कर रोने लगता
है। धन का लोभ तो बहुत कठिन है। अन्तकाल में भी वह स्वयं खर्च नहीं करता। औरों को दूर रखकर, केवल
अपने ही विश्वासपात्र लोगों को अपने खजाने की जानकारी देता है। वासना का चमत्कार आश्चर्यजनक है। देह
का विस्मरण कर जिस बात का सर्वाधिक स्मरण होता है, उसी वस्तु से वह तद्रूप हो जाता है। इस देह की
सम्पूर्ण स्मृति तत्काल नष्ट हो जाती है, और चेतना के साथ प्राण निकल जाता है। इसी का नाम है देह की मृत्यु।
यह नौवीं अवस्था है। इस प्रकार गर्भ से लेकर मृत्यु तक देह की नौ अवस्थाएँ हैं। जो विकारी होता है उसी को
देह की अवस्थाएँ होती हैं। आत्मा अविकारी होने के कारण अलिप्त ही रहता है। अब तुम कहोगे कि देह तो
जड़ है, उसमें विकार कैसे होता है ? सूर्य स्वयं होकर किसी को नहीं जगाता। उसके उदय होते ही लोग अपने
आप जग जाते हैं। इसलिये इन लोगों का क्रिया कर्म सूर्य के शरीर को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार विकार
प्रकट कर आत्मा अलिप्त ही रहता है। सूर्य किरण निकलते ही जिस प्रकार सूर्यकान्त मणि अपने शरीर से अग्नि
उत्पन्न करने लगता है, फिर उस अग्नि से यज्ञकार्य भी होते हैं और आग भी लगती है, किन्तु उस कर्म से सूर्य
अलग ही रहता है। उसी प्रकार चैतन्य के प्रकाश से मन शुभ-अशुभ कर्म करता रहता है। लेकिन चैतन्यपूर्ण
आत्मा उस मनोविकार से अलिप्त ही रहता है। इसलिये ये सारे विकार मन के ही किये हुए हैं। कर्माकर्म भी मन
ने ही किये हैं, यह जान लो। जन्म-मरण भी मन की ही क्रिया है और स्वर्ग या नरक में जाना यह भी मन की