सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 594, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 594

५७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। अब तुम कहोगे कि सन्देह का उद्भव तो हृदय में होता है और वहाँ तक शस्त्र भी नहीं पहुँचता तो मैं उसे
कैसे छेद पाऊँगा ? उसके बारे में भी बताता हूँ। तुम्हारे ही शब्दरूपी तेज से दीप्त तुम्हारा ज्ञानस्वरूप चक्र बड़ा
अलौकिक है। हे श्रीकृष्ण ! सन्देह का समूल छेदन करने वाला तुम्हारा एक वचन ही है। तुम्हारा भाषण
ज्ञानस्वरूप होने के कारण तुम्हारे कृपावलोकन मात्र से ही सारे संदेह का निर्दलन हो जाता है। तो हे मुकुंद ! तुम
मुझे सन्देह की इस पीड़ा से मुक्त करो। उद्धव के इस भाषण पर गोपियों के आराध्य श्रीकृष्ण ने 'मैं ही हूँ।' ऐसा
कहने का क्या कारण है ? तो उसका उद्देश्य भी सुनो।
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्रशक्तितः।
त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापरः ॥ २८ ॥
तुम्हारी माया शक्ति अतर्क्य है। इसलिये वह आनन्द की जितनी भी ऊर्मियाँ आती हैं, उन्हें रोककर विषय
की दृढ़तर आसक्ति लगा देती है। इससे जीव अज्ञानी हो जाते हैं। विषय का चिन्तन करते हुए जीव मन के
अधीन होकर रह जाता है और वह मन उसे दुर्बल, दीन-हीन, कंजूस, जड़ और मूढ़ बना देता है। ऐसे सम्पूर्ण
अज्ञानी जीव, केवल तुम्हारी कृपा से ही ज्ञानसम्पन्न हुए हैं। यह तुम्हारी ही परिपूर्ण कृपा है। हे श्रीकृष्ण ! जब
तुम्हारी पूर्ण कृपा होती है तो जीव तुम्हारे ही सामर्थ्य से माया का निर्दलन कर पूर्ण ब्रह्मत्व को प्राप्त करते हैं।
अब शायद तुम यह कहोगे कि मेरी गाँठ में न ज्ञान है और न अज्ञान ही है। फिर भी तुम स्वयं ही पूर्ण ज्ञानदाता
बन गये हो। उसके सम्बन्ध में सविस्तार सुनो। ब्रह्मदेव, सूर्य, सनत्कुमार, नारद, प्रह्लाद, अम्बरीष आदि तथा
प्रसंगानुसार अर्जुन को भी तुमने उपदेश किया है। तुम ऐसे ज्ञानदाता हो। तुम कहोगे कि संसार में ज्ञानसम्पन्न
लोग अनेक हैं, उनसे पूछ कर ज्ञान प्राप्त किया जाय ! लेकिन तुम्हारे सिवा माया पर नियंत्रण किसी और से नहीं
होगा। माया की उत्पत्ति, स्थिति और माया के निर्द्दलन के बारे में जानने वाले त्रिभुवन में एक तुम ही हो।
इसलिये हे श्रीपति ! मुझ पर कृपा करो। इस प्रकार उद्धव ने विनती के रूप में श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। अब
श्रीकृष्ण उद्धव को प्रकृतिपुरुष के विभाग विशद करके बतायेंगे। सूर्य से जिस प्रकार मृगजल उत्पन्न होता है,
अथवा आकाश से बादल उत्पन्न होता है, अथवा काँच की फर्श पर जल का भास होता है, उसी प्रकार पुरुष से
यह महाबली प्रकृति उत्पन्न होती है। इस प्रकार श्रीकृष्ण स्वयं प्रकृति-पुरुष का निरूपण समूल बता रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ।
एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २९ ॥
देखो ! प्रकृति और पुरुष ये दोनों निरन्तर भिन्न ही हैं। जिस प्रकार दिन और रात में एक का लोप होने पर
ही दूसरे का उदय होता है, दिन अस्त होते ही परिपूर्ण अन्धकार से युक्त रात्रि नक्षत्र और समस्त ग्रहों के साथ
बड़े उत्साह से प्रकट होती है। उसी प्रकार पुरुष का भान लुप्त होते ही प्रकृति कार्यों के साथ सत्त्वादि गुण लेकर
और ज्ञान-अज्ञान से परिपूर्ण होकर प्रबल होती है। इसमें प्रमुख रूप से देह का आकार ही प्रकृति का बड़ा किला
है। उसमें देहरूप अहंकाररूपी योद्धा ही किलेदार है। वही प्रकृति का सखा और मित्र है। प्रकृति उसी पर
सर्वाधिक विश्वास करती है। किले के ओर से लड़ने वाला वही एक है। वहाँ की सारी जिम्मेदारी वह अपने
माथे पर लेता है। इसीलिए उस अभिमान ने ही स्वयं होकर प्रकृति को अभय देकर और विकारों की सारी
सामग्री एकत्र कर महाभयानक किले पर अधिकार कर लिया है। हे नरपुंगव उद्धव ! सुनो। अपनी प्रकृति की