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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 869 में से

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पृष्ठ 593

बाईसवाँ अध्याय ५७७
चाँदी की कांति है उसी प्रकार संसार में पुरुष के संग से प्रकृति का भी भास होता है। प्रखर सूर्य किरणों के योग
से जिस प्रकार मृगजल की बड़ी नदी का भास होता है, उसी प्रकार पुरुष के योग से सचमुच प्रकृति का भास
होता है। जिस प्रकार आकाश की नीलिमा आकाश से भिन्न नहीं दिखायी देती, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुषोत्तम
में हमें भिन्नता नहीं दिखायी देती। देह का जो देहपन है वही प्रकृति की बाध्यता है। लेकिन इस देह से अलग
पुरुष का भान दिखायी ही नहीं देता। 'मैं' के अनुभव को आत्मा कहते हैं, लेकिन वह स्फूर्ति भी देह के आकार
के कारण होती है। हे गोविन्द ! देह से अलग आत्मा की प्रतीति वास्तव में नहीं होती। हे गोविन्द ! यदि आँखों के
बिना दृष्टि सम्भव हो, बाती के बिना लौ जले तभी देह के बिना आत्मा का स्फुरण होगा। गोविन्द ! जिह्वा के
बिना यदि स्वाद मालूम हो सके, कान के बिना शब्द सुनायी दे, तभी देह के बिना आत्मा का बोध स्पष्ट हो
सकेगा। हे गोविन्द ! यदि कांटे के बिना कटहल मिले अथवा छिलके के बिना गन्ना बढ़े तभी देह के बिना आत्मा
मिलेगा। ब्रह्मप्राप्ति का कारण नरदेह है, यह आत्मज्ञान का मर्म आपही ने बताया और अन्त में देह के बिना
आत्मदर्शन होता है यह भी आपही प्रतिपादित करते हैं। आत्मा के बिना प्रकृति किसी भी प्रकार से व्यक्त स्वरूप
में नहीं आती। स्वरूप के बिना छाया अलग किस प्रकार दिखायी देगी? मिठास से यदि शक्कर अलग की जा
सके, सुगन्ध से कपूर अलग हो जाये तभी आत्मा के बिना प्रकृति दिखायी देगी। माधुर्य के बिना यदि ईख बढ़े,
दाने के बिना छिलका बढ़े तभी आत्मा के बिना मूर्तिमंत माया भी व्यवस्थित ढंग से आकार प्राप्त करेगी। आत्मा
का स्वरूप प्रकृति के लक्षणों से ही मालूम होता है और आत्मा ही प्रकृति को प्रकाशित करता है। इनका संयोग
अनादि काल से चलता चला आ रहा है। फिर उनका बोध अलग-अलग कैसे होगा? प्रकृति से भिन्न आत्मा हमें
कहीं नहीं दिखायी देता। इसी अर्थ की विनती उद्धव स्वयं कर रहा है।
प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ।
एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।
छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणैः ॥ २७॥
हे कमलनाभ ! हे कमलवदन ! हे कमलधाम ! हे कमलधरा ! हे कमलिनीनिवासा ! हे कमलनयन श्रीकृष्ण !
प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध अत्यन्त कठिन है। उनका स्पष्ट निर्णय योगियों की समझ में भी नहीं आता। इसी
सन्देश का विराट वृक्ष हृदय में बढ़ रहा है। हृदय में संशय की जड़ें जमीं, जो प्रकृतिरूपी भूमि पर पड़ीं, उस पर
विकल्प का पानी गिरा। उसके बल पर संशयरूपी वृक्ष बढ़ा और उसे अहंकाररूपी फल सर्वकाल लगने लगे।
उस वृक्ष के फल खाये बिना इस जीव को कभी चैन नहीं पड़ता। इससे सन्देह अधिक बलवान होता है और
चित्त को कभी विश्राम नहीं मिलता। अतः ऐसे वृक्ष को आप कृपया तोड़ डालें। ज्ञान के तीन प्रखर बाण छोड़कर
तुम स्वयं उसकी जड़ें और पत्ते उखाड़ दो। हे गोविन्द ! कितने ही योग साधन और याग किये, कितने ही शास्त्र
पढ़े, अथवा धर्म कर्म के कितने ही प्रयास किये लेकिन इस वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं टूटा यह बहुत बड़ा
संकट है। उस वृक्ष को तोड़ते-तोड़ते ब्रह्मदेव भी सन्देह में पड़ गया, इसीलिये तुमने हंसगीत कहकर अपने
सत्पुत्रों का उद्धार किया। जब साक्षात ब्रह्मदेव की यह दशा हुई तो औरों की क्या बिसात ? इसलिये इस वृक्ष को
तोड़ने वाला, तुम्हारे सिवा और कोई नहीं है। इसे यदि ऊपर से ही तोड़ा जाय तो वासना की जड़ें शेष रहती हैं
और फिर वह पहले से भी अधिक जोश से बढ़कर उसका विस्तार बहुत ही बड़ा होता है। इसलिये इसका मूल
गड़्ढा ही उखाड़ कर फेंकने वाले एक तुम ही हो। तुम्हारे सिवा कोई ज्ञाता इस सन्देह का नाश करने वाला नहीं