श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यह हम स्वयं देख सकते हैं। काल की गति अतर्क्य है, इससे प्राणियों को जीवन-मरण प्राप्त होता है। उस
अत्यन्त काल गति के सम्बन्ध में ही श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः।
तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः ॥ ४३ ॥
दीपक की ज्वाला क्षण-प्रतिक्षण नयी उत्पन्न होती रहती है, किन्तु वे नयी उत्पन्न होते समय या पुरानी
नष्ट होते समय आँखों को दिखायी नहीं देतीं। यमुना के जल का प्रवाह लहरों के द्वारा तीव्र गति से बहता
रहता है लेकिन उस प्रवाह का जल प्रत्येक क्षण नया हो रहा है, यह किसी को दिखायी नहीं देता। फल, वृक्ष
का डंठल छोड़े बिना कड़ुआ, कसैला, खट्टा या मीठा भी होता है। काल की अदृश्य सत्ता अतर्क्य है। वही
काल देह के साथ नित्य नया कैसे उत्पन्न होता है? इसका उत्तर यह है कि वह बाल्य, युवा और वार्धक्य ये
देह की अवस्थाएँ बदलता रहता है। इसके सिवा मूढ़, चतुर, निर्बल ऐसी नयी-नयी अवस्थाएँ पूर्व की अवस्था
को नष्ट कर उत्पन्न होती है। उस समय 'जो पहला था वही सचमुच' मैं हूँ यह स्मरण किस कारण से होता
है? ऐसी कल्पना भी तुम्हारे मन में आ सकती है। इसलिये श्रीकृष्ण इस विषय का निरूपण करते समय
अखण्ड स्फूर्ति का रहस्य बता रहे हैं।
सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम्।
सोऽयं पुमानिति मृषा धीर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥
उद्धव! दीपक की ज्वाला भले ही नयी उत्पन्न होती हों और पुरानी नष्ट हो, लेकिन उनमें का अग्नि पहले
की ही तरह एक जैसा होता है, इसीलिये उसे दीया कहते हैं। अथवा जल के प्रवाह में बड़ी-बड़ी लहरें बह कर
आती हैं, फिर भी पानी अखण्ड एक ही रहता है। इसीलिये सब लोग उसे पानी कहते हैं। उसी प्रकार उद्धव!
देह में भी उम्र के अनुसार निरनिराली अवस्थाएँ आती हैं और जाती हैं, फिर भी आत्मा अखण्ड सर्वव्यापी ही
रहता है। इसी कारण से 'वही मैं' वाली स्फूर्ति का स्फुरण होता है। तुम कहोगे कि मैं के 'अहं के कारण यह
अहंकार उत्पन्न हुआ है', तो उसका उत्तर यह है कि वह भी अज्ञान के कारण जड़-मूढ़ ही है। उसका दृढ़
प्रकाशक आत्मा ही है। इसलिये वही हमेशा परब्रह्म स्वरूप से स्फुरण प्राप्त करता है। किन्तु यह जो जन्म-मरण
है, वह देह के ही लिये होता है। आत्मा अपने सर्वव्यापित्त्व के कारण परिपूर्ण ही है। देह ही आत्मा है और वही
मैं हूँ, ऐसा जो कहते हैं, वह भी मिथ्या है। विषयों की कार्यसिद्धि होना अथवा देह में 'मैं' का अहं होना यह भी
सचमुच मिथ्या ही है। उसी कारण मनुष्य संसार बन्धन में उलझ जाता है। कर्मभूमि में अनायास ही नरदेह की
प्राप्ति होने पर, जो लोग विषयसुख में लिप्त होकर रह जाते हैं, उनका यह कार्य अमृत के बदले माँड पीने, रत्नों
के बदले अनाज के छिलके खरीदने, पर्वत त्याग कर कीट पाने, और ईंट के बदले हाथी बेचने जैसा है। आँखें
फोड़ कर कोई उसमें काजल लगा ले, अथवा नाक काट कर होली खेलने जैसा है। इस प्रकार वे नरदेह की
विडम्बना करते हैं और जीवन का सत्यानाश कर लेते हैं। लाखों की सम्पत्ति खर्च करने पर भी जीवन का एक
क्षण भी वापस नहीं मिलेगा ऐसा जीवन जो लोग विषयों के लिए खर्च कर देते हैं वे कर्मदरिद्री और नितांत मूढ़
हैं। देह स्वयं ही काल्पनिक है। इसलिये उसका अभिमान भी काल्पनिक है। वही यह देहबुद्धि की 'अहंता',
संसार को दृढ़ बन्धन लगा देता है। यदि उस 'मैं पन'को ही छोड़ दें तो फिर कैसा जन्म और कैसा मृत्यु? जब
संसार ही नहीं रहेगा तो फिर संसार बन्धन कैसा? देखो! बगुले का भय मिथ्या रहता है लेकिन जैसे बालक उसे