श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 600, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें५८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव उवाच
त्वत्तः परावृत्तधियः स्वकृतैः कर्मभिः प्रभो।
उच्चावचान् यथा देहान् गृह्णन्ति विसृजन्ति च ॥ ३४ ॥
आकाश सर्वत्र सन्मुख ही होता है, कभी भी विन्मुख नहीं होता। उसी प्रकार आत्मा भी अंतर्बाह्य परिपूर्ण
ही है। फिर उसकी वृत्ति विन्मुख कैसे होगी ? जब आकाश को जाल में बाँधना सम्भव होगा, तभी अकर्त्ता को
कर्त्ता का बन्धन लगेगा। वंध्या का गर्भधारण करना जिस प्रकार मिथ्या है, उसी प्रकार मुक्त के लिये जन्म-मरण
का बन्धन झूठ है। आत्मा के सिवा जब कुछ भी खाली नहीं बचा तो फिर इस देह से उस देह में जाना कैसे
सम्भव है ? यदि पृथ्वी रूठ कर आश्रय देना बन्द कर दे, अथवा आकाश ही कहीं दूर चला जाय, तभी एक देह
का आत्मा दूसरे देह में प्रवेश कर सकेगा। चिऊँटी यदि सात समुद्र निगल सके तभी आत्मा को ऊँच-नीच
योनियों का भोग भोगना पड़ेगा। अर्थात्, यह असंभव है। यह बात अतर्क्य है। उसके संशोधन पर तर्क काम नहीं
करता। योगी भी भ्रम में पड़ गये।
तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभिः ।
न ह्येतत् प्रायशो लोके विद्वांसः सन्ति वञ्चिताः ॥ ३५ ॥
हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारी लीला अगाध है। वह किसी की समझ में नहीं आती। जिनका चित्त माया के भुलावे
में है, उन्हें तुम्हारी स्थिति का पता नहीं है। आत्मा केवल अद्वितीय, अविनाशी है, उसमें तुम उत्पत्ति, स्थिति और
नाश दिखाकर मिथ्या संसार का भास उत्पन्न करते हो। तुम्हारी यह लीला अतर्क्य है। उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं
चलता। इसमें वेद की मति गुंग हो गयी, उपनिषद पगला गये, पुराण मूक होकर बैठ गये। इन सबने सारे प्रयास
कर डाले लेकिन उसमें उनकी गति काम न आयी। तुम्हारे संबंध में ज्ञान तुम्हारी कृपा के बिना नहीं होगा।
इसलिये हरि की कृपा को जो पात्र नहीं है ऐसे जड़-मूढ़ लोगों का संसार का बन्धन नहीं टूटता। तुम्हारी
योगमाया की करनी अतर्क्य है। उसने बछड़ों को चुराते ब्रह्मदेव को भी भुलावे में रखा। मोहनी को देखकर शंकर
भी भुलावे में आ गये। इसीलिये गोविन्द की कीर्ति सारे त्रिभुवन में फैली हुई है। इसलिये आप कृपया मेरे इस
प्रश्न का उत्तर दें कि एक देह से दूसरे देह में जीव कैसे प्रवेश करता है ? और जीव को जन्म-मरण भी कैसे
आता है ? उद्धव का यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण हँस दिये और बोले, अरे! यह सब मायिक है, केवल मनोमय
कल्पना का खेल है।
श्रीभगवानुवाच
मनः कर्ममयं नृणामिन्द्रियैः पञ्चभिर्युतम्।
लोकाल्लोकंप्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते ॥ ३६ ॥
ग्यारह इन्द्रिय और पंचमहाभूत मिलकर सोलह कलाओं का लिंगदेह बनता है और अनेक विषयों की
कल्पना करने वाला मन ही उसमें प्रधान रहता है। इसमें लिंगदेह ही मन है और उस मन के अधीन इन्द्रिय रहते
हैं। मन से ही देह चलता रहता है। उसमें देहाभिमान रहता है, वह भी मन के साथ ही रहता है। मन जिसे
छोड़कर चला जाता है, वहाँ देहाभिमान खड़ा भी नहीं रहता। मन के योग से ही अभिमान देह का बोझ ढोता
रहता है। मन जब विषयासक्त होकर शुभाशुभ कर्माचरण करता है, उस समय जीव कर्माधीन होकर दूसरे देह में