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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 596, कुल 869 में से

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पृष्ठ 596

५८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूरी तैयारी है और इसी कारण यह प्रपंच इतना फला फूला है। संकल्परूप महापर्जन्य के जल से तथा
वासनारूपी उदक से यहाँ की टंकियाँ भरी हुई हैं इसलिये किले में रहने वाले लोग यही पानी पीकर संसार के
सुख-दुःख में विहार करते हैं। अब इस किले के नौ द्वारों में से किसमें आधिदैव, आधिभूत और अध्यात्म है वह
भी बताता हूँ। किस द्वार में कौन-सा यंत्र रहता है, उसका चालक कौन रहता है, उसकी रचना कैसी है और
उससे विषयों का प्रहार कैसे होता है, यह भी सुनो।
दृग्रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति यः स्वतः खे।
आत्मा यदेषामपरो य आद्यः स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ॥ ३१॥
नेत्रेन्द्रिय एक बहुत बड़ी तोप है। वह स्त्रीस्वरूप की मार करती है और उस प्रहार से मर्मस्थान का भेद हो
जाने के कारण कोटि-कोटि सुरनर घायल हो जाते हैं। नेत्र गोल इन्द्रिय शरीर में और इस इन्द्रिय की अधिष्ठात्री
देवता सूर्य है इसलिये वह देखे हुए स्वरूप को अपने में अंकित करती है। वही सच्चा अध्यात्म है। नीला, पीला
आदि जो स्वरूप का आभास दृष्टि को होता है, वह दृष्टि को दृश्य का भान होना ही वास्तविक अधिभूत है।
अधिदैव सूर्य सिद्ध है, दृष्टि के सामने अधिभूत रखा हुआ है और शरीर में नेत्रगोल भी हैं, लेकिन यदि दृष्टि में
अध्यात्म तेज न हो तो अंधत्व ही रहता है। अधिदैव और अधिभूत होते हुए भी जब तक दृष्टि में अध्यात्म तेज
नहीं है, तब तक कुछ भी देखना सम्भव नहीं होता। वहाँ अंधत्व कायम ही रहता है। अथवा अध्यात्म और
अधिभूत दोनों हों और अधिदैव रूपी सूर्य अस्त हो गया हो तो भी आँखों का देखना अंधकार में लुप्त हो जाता
है। उस समय यदि बत्ती जलाकर प्रकाश भी किया जाय तो उसका प्रकाश सूर्य की तरह नहीं होता। चन्द्रोदय भी
सूर्यपकाश की बराबरी नहीं कर सकता। सूर्य रात्रि को समाप्त कर दृष्टि की सहायता करता है इसीलिये सूर्य को
अधिदैव कहते हैं। अध्यात्म और अधिभूत ये दोनों हों और अधिदैव सूर्य ही न हो, तो दृष्टि का कुछ बस नहीं
चलता। अध्यात्म और अधिदैव ये दोनों हों और गुरु की पूर्ण कृपा हो और अधिभूत का दृश्य दर्शन बन्द होता है,
तभी सचमुच ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। यहाँ जो अपने दृश्य का दर्शन होता है, उससे देह ही सब कुछ है, यह
देहबुद्धि दृढ़ हो जाती है। उस दृश्य का ही भान नष्ट करने से, देह के साथ संसार ही शून्य लगने लगता है। इस
प्रकार अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत यह त्रिपुटी किसे कहते हैं यह तुम्हें उसके विभागों के साथ विस्तारपूर्वक
बताया। इसमें त्रिपुटी का अर्थ स्वरूप अर्थात् दृश्य, द्रष्टा और दर्शन, कर्म, कर्त्ता और क्रिया का आचरण ध्येय,
ध्यान और ध्यातृत्त्व से है। इन्हें त्रिपुटी कहने का अर्थ यही है कि ये एक-दूसरे से सापेक्ष हैं। इसलिये अब
उनकी परस्पर अपेक्षाओं के लक्षण भी बताता हूँ। नाना प्रकार के सुखोपभोग होते हैं और उन्हें देखने के लिये
दृष्टि भी सक्षम रहती है। लेकिन वह सूर्य के बिना व्यर्थ ही रहती है। ऐसा यह परस्पर सम्बन्ध है। सूर्य हो किन्तु
आँख न हो तो भी दिखायी नहीं देता या आँख हो और सूर्य न हो तो भी कुछ भी नहीं दिखायी देता या सूर्य और
दृष्टि दोनों हो किन्तु देखने के लिये कुछ न हो तो भी दोनों का सामर्थ्य व्यर्थ हो जाता है। सूर्य स्वरूप को व्यक्त
करता है और अपने किरणों से दृष्टि में प्रवेश कर नाना प्रकार के आभास दिखलाता है। इसलिये यह देखने का
कार्य एक-दूसरे पर निर्भर है। लेकिन इतना होते हुए भी सूर्य अलिप्त होकर आकाश मण्डल में रहता है। उसी
प्रकार इस विश्वस्वरूप को व्यक्त करने वाला चिदात्मा सचमुच अलिप्त ही रहता है। वह इस जगत में भरा हुआ
है तथा जगत के हृदय में रहता है। यह सारा संसार उत्पन्न हो या उसका लय हो जाय लेकिन वह वैसा ही रहता
है। जिस प्रकार आकाश में हजारों घटाकाश निर्माण होने पर भी उन घटों में आकाश प्रत्यक्ष रूप से दिखायी ही