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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 607, कुल 869 में से

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पृष्ठ 607

ही क्रिया है। लक्ष्यालक्ष्य भी मन ने ही किया है और बंध तथा मोक्ष भी मन ने ही किये हैं। यही निरूपण साक्षात
श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः ।
गुणसङ्गादुपादत्ते क्वचित् कश्चिज्जहाति च ॥ ४७ ॥
अभिमान से युक्त मन, संस्कार विकार का आभास कराता है और स्वर्ग और नरक में जाना यह भी
देहाभिमान के कारण होता है। इससे आत्मा स्वभावतः भिन्न है। वह ज्ञानमय तथा ज्ञानस्वरूप है। उसे मन स्पर्श
भी नहीं कर सकता और शुद्ध तत्त्व में अभिमान भी नहीं रहता। मन और अभिमान को माया ही उत्पन्न करती है,
अभिमान ने ही गुणों को उत्पन्न किया है और उन गुणों ने मायात्मक विकार सामग्री के साथ यह देह तैयार किया
है। देह के पास जिस प्रकार छाया रहती है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में मिथ्यारूप माया रहती है। ऐसे
आत्मस्वरूप में जन्म-मरण के साथ इस देह के प्रवेश के लिये स्थान ही नहीं है। आत्मा शुद्ध और देह मलिन है।
उसी प्रकार देह जड़ तथा आत्मा चैतन्यस्वरूप है। आत्मा अजन्मा, अव्यय और परिपूर्ण है। जन्म-मरण केवल
देह को है। तीन गुण, तीन अवस्था, कार्य, कर्म, मैं कर्त्ता यह अभिमान, ये सब देहाभिमान के विकार हैं। आत्मा
सर्वथा अलिप्त ही है। इस प्रकार आत्मा स्वभाव से ही चैतन्यस्वरूप होने के कारण, विकारों से भिन्न ही है। अब
तुम कहोगे कि 'जीव को ही देहाभिमान है', तो उसके बारे में भी सुनो। जीव माया के गुणों से अलिप्त रहता है।
स्फटिक जिस रंग पर रखिये, उस रंग का वह दिखायी देता है। लेकिन स्फटिक मूलतः शुद्ध होने के कारण वह
उस रंग से भिन्न रहता है। उसी प्रकार सत्त्वादि गुणों में खेलते हुए भी जीव सचमुच अलिप्त ही रहता है।
स्फटिक को काजल पर रखो तो वह काला दिखाई देता है किन्तु वह कालेपन से भिन्न रहता है। उसी प्रकार
तमोगुण से जीव मलिन दिखाई दे, फिर भी वह तमोगुण से अलग रहता है। उसी स्फटिक को यदि लाल रंग पर
रख दिया जाय तो उसकी प्रभा लाल दिखायी देती है, लेकिन फिर भी वह लाल रंग से अलग रहता है। जीव
रजोगुण में रहकर भले ही राजसी लीलाएँ करे फिर भी वह सब भोग कर जीवात्मा अलग ही रहता है। श्वेत रंग
पर स्फटिक रखने से उसका रंग श्वेत दिखायी देता है लेकिन वह श्वेत रंग से बिलकुल अलग रहता है। उसी
प्रकार जीवात्मा सत्वगुण में रहने पर बड़ा ज्ञानसम्पन्न दिखायी देता है, लेकिन वह गुण और ज्ञान से अलग रहता
है। इस प्रकार जीव तीन गुणों से किस प्रकार अलिप्त रहता है, यह तुम्हें बताया। अब वह देह में रहते हुए भी
किस प्रकार युक्त रहता है, यह बताता हूँ। जिस प्रकार घट में रहने वाला पानी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब घट में लाता
है, उसी प्रकार जीवत्व शुद्ध आत्मा को देह में देहाभिमान के रूप में देखता है। घट निश्चल हो तो बिम्ब भी
निश्चल रहता है। घट हिलता है तो बिम्ब भी हिलता है। उसी प्रकार ये सारी अवस्थाएँ देह की हैं लेकिन
जीवात्मा उसे अपनी ही मानता रहता है। घट में काजल घोलने से पूरा पानी काला हो जाता है लेकिन उसके
अन्दर के बिम्ब को अथवा प्रतिबिम्ब को कालिख नहीं लगती। उसी प्रकार देह के सुख-दुःख की अथवा पाप
पुण्य की बात जीव के अथवा आत्मा के माथे पर नहीं आती। अहंकार के कारण देह ही वह सब कुछ भोगता
रहता है। इस घड़े का पानी उस घड़े में भर दें तो उसमें भी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखायी ही देता है। उसी
प्रकार इस देह का जीव उस देह में चला जाता है, इसीलिये उसे जीवात्मा कहते हैं। चन्द्रमा आकाश में अलिप्त
ही रहता है। वह मिथ्या ही प्रतिबिम्ब रूप में घट में भासमान होता है। उसी प्रकार आत्मतत्व परब्रह्मस्वरूप में
स्थिर रहता है तथा देहात्मसंयोग से ही उसे जीव की चाह लगी रहती है। इस प्रकार देह धारण करने वाला जीव