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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 869 में से

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पृष्ठ 608

५९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीन गुणों से भिन्न होकर देहसंग से भी अलिप्त रहता है। इस प्रकार मैंने जीव और शिव का साद्यंत दर्शन करा
दिया। लेकिन यह सब लोगों की समझ में न आने के कारण देहात्मवाद से वे भ्रांति में पड़े हैं। इससे अभिमान
उन्हें स्वर्ग-नरक के चक्र में डालकर नाना प्रकार की योनियों का भ्रमण कराता है। द्विज देह से प्रारम्भ कर
परमेष्ठी देह तक जाते हैं और सभी प्रकार के स्वर्गसुख को भोगते हैं। लेकिन जो पापी होता है वह अधोमुख
होकर ब्राह्मण से नीचे की जाति में जन्म लेकर अनेक प्रकार की दुःख योनियों को भोगता है। पाप और पुण्य का
कर्माचरण ही जन्म-मरण बढ़ाता है। उसमें भी जन्म-मरण के चक्र को काटने वाला कोई विरला भाग्यवान होता
है। जिन्होंने इच्छारहित रह कर पुण्य की राशियाँ बटोरी हैं, जिन्होंने स्वधर्म का जोड़ प्राप्त किया है, जिनके
अंतःकरण में प्राणिमात्र के प्रति दया रहती है और ब्राह्मण भजन में जिन्हें प्रेम रहता है, जो अहिंसा का मैका है,
'वसुधैव कुटुम्बकं' जिनका मन अद्वैतयुक्त है, जो सारासार राजहंस हैं और जो जीवन-मरण के चक्र से ऊब चुके
हैं जो उपनिषदों का अर्थ चातक की तरह ग्रहण करते हैं जो जीव के उत्पादक का संशोधन करते हैं, जो
आत्मतत्त्व के साधक हैं और जो सचमुच ही भावार्थी हैं, संतचरणों पर जिनकी पूर्ण भक्ति है और जो गुरुवचन
पर बिक चुके हैं, वे मेरी कृपा से इसी देह में विदेहता प्राप्त करते हैं। वे ही आत्मज्ञान के योग से देह का बन्धन
तोड़कर, जन्म-मरण के करोड़ों फेरे बचाकर सायुज्य की पताका लहराते हैं और उस पार पहुँचते हैं। जिस प्रकार
मृगजल में डूबने का भय नहीं है, उसी प्रकार संसाररूपी भँवर उन्हें बचाकर निकल गये। लेकिन मुक्त पुरुष
संसार में बहुत कम ही दिखायी देते हैं। सारा संसार ढूँढ़ने पर एकआध ही कोई दिखायी देता है। अस्तु ! लेकिन
यदि ऐसा कोई दिखायी दिया तो उसे पहचानेगा कौन ? क्योंकि उद्धव ! वहाँ भी आत्मा दिखायी नहीं देता।
ज्ञानसम्पन्न व्यक्ति यदि पास आकर मिला भी और उसका देह प्रपंच में व्यवहार करते दिखायी भी दिया तो भी
उसके भीतर का आत्मा किसी को दिखायी नहीं देता। आत्मा आया-गया ऐसा कहते अवश्य हैं किन्तु उसका
आना-जाना कोई देखता नहीं है। उसी की उत्पत्ति श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।
न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षणः ॥ ४८ ॥
पिता का आत्मा गया इसलिये पिता का देह नष्ट हो गया ऐसा कहते हैं लेकिन उसे जाते हुए कोई नहीं
देखता। कोई कहता है, पुत्र का जन्म होते ही आत्मा का जन्म होता है। लेकिन पुत्रोत्सव मनाते समय उसके देह
का ही गौरव किया दिखाई देता है। आत्मा दुर्गम ही रहता है, वह दिखायी नहीं देता। इसलिये इस संसार में
आत्मा का आना-जाना वास्तव में नहीं होता। इस दृष्टांत से सिद्ध होता है कि जन्म और मरण देह के ही लिये
है। आत्मा साक्षीरूप में अविनाशी ही है। इसी अर्थ का विवेचन श्रीकृष्ण विशद करके बता रहे हैं।
तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वाज्जन्मसंयमौ।
तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥
पर्वत पर बीज की उत्पत्ति और वृद्धि होने के कारण पर्वत उस वृक्ष का साक्षी होता है। लेकिन उस वृक्ष
को काटने से पर्वत को कोई दुःख नहीं होता। उसी प्रकार द्रष्टा देह का साक्षी है। प्रत्येक देह को द्रष्टा साक्षी है
किन्तु इस देह के धर्म द्रष्टा पर लागू नहीं होते। वह देह में रहते हुए भी विदेही ही रहता है। इसलिये उसे
संसारबंधन का स्पर्श नहीं होता। लेकिन यह रहस्य न जानकर लोग इस संसार से जुड़े हुए हैं। यही बात स्वयं
श्रीकृष्ण पाँच श्लोकों में वर्णन कर रहे हैं।