श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 591, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ अध्याय ५७५
चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः।
जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु॥२१॥
अग्नि, जल और पृथ्वी आँखों को प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं वही सच्चे तत्त्व हैं; ऐसा वे मतवादी मानते हैं
और इन स्थूलों को चेतना देने वाले आत्मा को वे चौथा मानते हैं। उन तीनों के बिना सृष्टि को कभी साकारता
प्राप्त नहीं होगी। सृष्टि को मुख्य रूप से इनके ही कारण नाम, रूप, क्रिया और कारण प्राप्त होते हैं। इसलिये
तीन ही भूत प्रामाणिक हैं, ऐसा उनका मानना है। इस प्रकार तीन भूत और आत्मा चौथा इस प्रकार चार तत्त्वों की
व्यवस्था हो गयी। अब सत्रह तत्त्वों के प्रकार यथार्थ रीति से बताता हूँ, सुनो।
संख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च।
पञ्च पञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः॥२२॥
पाँच विषय, पाँच महाभूत, पाँच इन्द्रिय और मन और आत्मा मिलाकर सत्रह तत्त्व निश्चित हुए हैं। उसी
प्रकार आगे बताये जाने वाले सोलह तत्त्वों को भी ध्यान में रखो। वहीं तेरह तत्त्वों का लक्षण भी भगवान स्वयं
बतायेंगे।
तद्वत् षोडशसंख्याने आत्मैव मन उच्यते।
भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश॥२३॥
सत्रह तत्त्वों का पूरा निरूपण तुम्हें बताया। उनमें मन और आत्मा एक ही हैं। उनका लक्षण सुनो। कथा
सुनाते समय जिस प्रकार हाथ अपने आप हिलते हैं, उसी प्रकार मन की हलचल भी अपने आप होती रहती
है। राजा सिंहासन पर बैठता है, तो राजा कहलाता है और जब वसंत ऋतु में क्रीडा के लिये उद्यत होता है तो
क्या वह राजा नहीं रह जाता? समुद्र में जब ज्वार आता है तो उस समय भी वह समुद्र ही रहता है और उसका
पानी जब शान्त रहता है, उस समय भी वह समुद्र ही रहता है। उसी प्रकार मन के रूप में वह चंचल हो
अथवा आत्मस्वरूप से निश्चल हो तो भी दोनों में जो परमात्मा है उसका स्वरूप नहीं बदलता। इसलिये मन
का जो स्वरूप है वह आत्मसाक्षात्कार के बिना किसी की समझ में नहीं आता। यही मन का प्रमुख लक्षण है।
मन और आत्मा एक हो जाने के कारण, सत्रह में से एक कम हो जाने के कारण जो सोलह तत्त्व बचते हैं वही
सच्चे तत्त्व हैं। उसी प्रकार पाँच इन्द्रिय, पाँच महाभूत और मन को मिलाकर ग्यारह और उसमें जीव और शिव
को मिलाकर सारे तत्त्व तेरह निश्चित किये गये हैं। उद्धव! तत्त्वों के सम्बन्ध में और भी कई मत हैं। उनका
निर्णय भी तुम्हें बताता हूँ।
एकादशत्व आत्मासौ महाभूतेन्द्रियाणि च।
अष्टौ प्रकृतयश्चैव पुरुषश्च नवेत्यथ॥२४॥
जहाँ ग्यारह ही तत्त्व बताये गये हैं वहाँ पाँच इन्द्रिय, पाँच महाभूत और जीव, शिव तथा मन को एक ही
रूप मान कर ग्यारह तत्त्व माने गये हैं। सुगन्ध, मृदुता और पीतवर्ण ये तीनों गुण चम्पा के फूल में एकत्र मिलते
हैं या सुवास, मिठास और उत्तम रंग ये तीन गुण जिस प्रकार आम में एकत्र रहते हैं, अथवा जिस प्रकार सुवर्ण
के मणि सुवर्ण की ही तार में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार जीव, शिव और मन ये तीनों एक रूप ही हैं। पाँच
इन्द्रिय, पाँच महाभूत और जीव, शिव और मन मिलाकर एक, इस प्रकार ग्यारह तत्त्व इसी उद्देश्य से निश्चित