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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 605, कुल 869 में से

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पृष्ठ 605

बाईसवाँ अध्याय ५८९
सच मान लेता है, उसी प्रकार देह भी मिथ्या और काल्पनिक है। लेकिन अज्ञानी लोग उसी को सच मानते हैं।
जो देह और बुद्धि दोनों को ही मिथ्या मानता है, उसे भविष्य में जन्मसिद्धि की क्या चिन्ता है? क्योंकि
मिथ्यारूपी पदार्थों की वृद्धि होती ही नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।
म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्निर्दारुसंयुतः ॥ ४५ ॥
देहात्मवाद से देहाभिमान उत्पन्न होता है, जिससे लोगों में गूढ़ वासनाबीज उत्पन्न होता है और अपनी
वासनाओं के संकल्प से ही मनुष्य स्वयं मिथ्या जन्म-मरण को ही सत्य मानने लगता है। उस देहाभिमान के
कारण ही क्रिया चरण करने वाला कर्मकर्ता मैं हूँ यह मान कर निष्कर्म को कर्मबन्धन है और अमर को जन्म-
मरण है, यह मान लेता है। गड्ढे में एकत्र पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, इसलिये वहीं सूर्य का
जन्म हुआ और पानी जब सूख जाता है तो सूर्य का जीवन समाप्त हो गया, ऐसा बालक कहता है। उसी प्रकार
अजन्मा को जन्म-कर्म है ऐसा मानना केवल माया का भ्रम है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण सरल दृष्टांत देते हैं।
वास्तव में अग्नि अजन्मा होने के कारण अव्यक्त है, लेकिन वह लकड़ी में ही उत्पन्न हुआ ऐसा कहा जाता है।
वह उस लकड़ी के आकार का ही दिखायी देता है। इसलिये लकड़ी समाप्त होने पर अग्नि नष्ट हो गया ऐसा
कहते हैं। उस लकड़ी की ही तरह यहाँ जन्म और विनाश ये दोनों देह के ही लिये हैं। दृष्टांत के अग्नि की ही
तरह आत्मा नित्य और अविनाशी है। उस देह की नौ अवस्थाएँ होती हैं, जिनका वर्णन श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम्।
वयोमध्यं जरामृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव ॥ ४६ ॥
देह की नौ अवस्थाएँ हैं, उनकी भी स्थिति सुनो। उन भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का विस्तार भी सुनो। पिता के
देह में शुक्लरूप प्राप्त कर माता के उदर में प्रवेश करने को 'निषेक' कहते हैं। यही उस देह की पहली अवस्था
है। फिर माता के उदर में रक्तयुक्त संचित होकर, पिण्ड बनता है और धीरे-धीरे बड़ा होकर उसे 'गर्भ' का
स्वरूप आता है। यह देह की दूसरी अवस्था है। फिर प्रसूति वायु के आघात से पेट से बाहर आना, इसे 'जन्म'
कहते हैं। यह देह की तीसरी अवस्था है, यह अच्छी तरह जान लो। स्तनपान ही सबसे अच्छा लगता है, माता
ही सबसे श्रेष्ठ तथा रोने में ही सारा बल दिखायी देता है यह देह की चौथी 'बाल्यावस्था' है। केवल अज्ञान के
कारण मलमूत्र में लोटता है, सारे इन्द्रियों की शक्ति गुप्त रहती है, विचार करने की बिलकुल शक्ति नहीं रहती,
मधुर, कोमल, तुतला कर बोलता यह पंचवार्षिक 'बाल्यावस्था' है। फिर इन्द्रियों की शक्ति बढ़ती जाती है, किन्तु
शरीर में विषय का स्वार्थ नहीं होता, खेल पर ही मन आसक्त रहता है, यह उस देह की पाँचवीं 'कुमारावस्था'
है। इसके बाद 'युवावस्था' उसमें इन्द्रियों में परिपूर्ण शक्ति आती है और मन में बुद्धिमान होने का अभिमान
हिलोरें मारने लगता है। उस समय मन में स्त्री की वासना उत्पन्न होने लगती है, धन का लोभ बढ़ने लगता है,
घर-बार से प्रेम होने लगता है और समाज में नाम रूप की कीर्ति बढ़ने लगती है। सम्पत्ति के मद से मन में
अहंकार भरा रहता है, बाल-बच्चों में ही मन रमता है। बढ़ती आशा के कारण अधिक से अधिक भोग भोगने की
चाह होती है; और काम क्रोध का बड़ा-सा चक्र चारों ओर घूमता रहता है। कोई अपमान करता है तो वह सहन
नहीं होता। कोई 'तू' कहता है तो तैश में उठ कर खड़ा हो जाता है। ऐसी अनर्थकारी 'यौवनावस्था' देह की
छठवीं अवस्था है। पन्द्रह से पचीस वर्ष तक पूर्ण यौवन का जोर रहता है। उसमें नाना प्रकार के विकारों से