श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अंतकाल में वह सब प्रेम से प्रिय विषय बन जाता है। लेकिन इसमें भी जहाँ विशेष रूप से ध्यान बसता है उसी
स्वरूप का जन्म पुरुष प्राप्त करता है। फिर उस चिंतन के सामर्थ्य के अनुसार जैसे आकार का देह प्राप्त होता है,
वैसे ही देह का अभिमान उत्पन्न होता है और 'यह सारा देह मैं ही हूँ' ऐसा वह समझता है। इसमें मन और
अभिमान इनका स्वरूप देखें तो वह एक ही रहता है लेकिन उनके कार्य भिन्न-भिन्न रहते हैं। चित्त चतुष्टय का
यह स्वरूप ज्ञानी लोग एकात्मता से जानते रहते हैं। उस देह का बुरा या भला ईश्वर की कृपानुसार होता रहता
है। लेकिन वह देह का ही अभिमान लेकर नाचता रहता है। इसी का नाम है, पुरुष का जन्म। लेकिन यह देह
पहले का नहीं है, यह दूसरा देह है इसका भी उसे स्मरण नहीं रहता। इसलिये वह यहाँ भी पहले का ही
देहाभिमान लेकर बैठ जाता है। इसी अर्थ का दृष्टांत श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। जिस प्रकार स्वप्न में अथवा
मनोराज्य में अपने देह का भान नहीं रहता, कोई भिखारी अपने ही घर में सोया रहता है और वह स्वप्न में इन्द्र
बन जाता है, ऐरावत पर बैठ कर उर्वशी जैसी अप्सराओं के साथ रहता है। मेरा पहले का भिखारी का देह गया
और यह देवता का देह प्राप्त हो गया इसका उसे स्वप्न में भी स्मरण नहीं रहता। उसी प्रकार लोगों के जन्म की
स्थिति है। कोई मजदूर मन्दिर में घी की गगरी ले जाते समय मन में मनोराज्य करता रहता है कि मैं घोड़े पर
सवार हूँ, और उसी स्वकल्पित कल्पना तरंगों में ही मन ही मन उल्हसित होता रहता है। इतने में मनोराज्य में
घोड़े ने ऊँची छलांग लगायी यह सोच कर वह स्वयं ही कूद जाता है। उसके पास की घी की गगरी गिर कर
चूर-चूर हो जाती है और लोग जब पूछने लगते हैं, यह क्या हुआ ? वह उस मनोराज्य में ही कहता है, "मेरे
घोड़े ने जोर की छलांग लगायी।" लेकिन घी की गगरी गिर जाने के कारण, उस अपराध के लिये उसे बंदीगृह
में जाना पड़ता है लेकिन मन के ध्यान के कारण उसे उसका भान ही नहीं रहता। यहाँ तक का उसका विस्मरण
ही देह की मृत्यु है और मन का तीव्र ध्यान ही प्राणी का जन्म है। सारांश आत्मा का जन्म या मरण केवल भ्रम
का लक्षण है। उसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
स्वप्नं मनोरथ चेत्थं प्राक्तनं न स्मरत्यसौ।
तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्व चानुपश्यति ॥ ४० ॥
स्वप्न में पुरुष देहभान भूलकर स्वप्न की गृहस्थी का विस्तार अपने अभिमान के साथ बढ़ाता है। जागृत
अवस्था का देह उधर रह गया और यहाँ मुझे स्वप्नदेह प्राप्त हुआ है, इस प्रकार पहले के और अभी के देहों का
उस पुरुष को स्मरण नहीं होता। जागृति और स्वप्न इन दोनों स्थितियों में देहों को देखने वाला उनमें से कोई
भिन्न ही होता है, उसी प्रकार जीव जन्म और मृत्यु इन अवस्थाओं से भिन्न है। अर्थात् जीव को जन्म और मृत्यु
इनमें से कुछ भी नहीं है। सारांश जन्म और मृत्यु केवल देह के लिये ही हैं। आत्मा नित्य मुक्त और शाश्वत है
तथा स्वप्न के मनोरथों के तरंगों की तरह संसार अनेक प्रकार से विस्तृत है। देह को उत्पत्ति, स्थिति और लय
होने का कारण मन ही है। इसलिये संसार मन की कल्पना है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
इन्द्रियायनसृष्ट्येदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि।
बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृत् यथा ॥ ४१ ॥
सारा संसार मन की ही कल्पना है। इन्द्रियों के समस्त व्यवहार मन के कारण ही होते हैं और कर्म की
कसौटी के अनुसार मन ने ही इस त्रिपुटी को बढ़ाया है। अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत ये तीन प्रकार भी मन
ने ही किये हैं। सचमुच, आत्मवस्तु अखण्ड होते हुए भी उसमें तीन प्रकार की कल्पना का आभास होता है।