श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 603, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ अध्याय ५८७
कुम्हार जब मटकी बनाता है, उस समय आकाश भी उसी के आकार का दिखायी देने लगता है, सच पूछो तो
आकाश पूरी तरह निर्विकार है लेकिन मटकी के कारण वह भी विकृत हुआ दिखायी देता है। उसी प्रकार आत्मा
अविकृत, नित्य और शुद्ध ही है। उसे मन तीन प्रकार की कल्पनाओं और नाना प्रकार की त्रिपुटी से अनेक प्रकार
का भेद उत्पन्न करता है। वह भेद कैसे बढ़ता है, सुनो। कार्य, कर्म और कर्त्ता, ध्येय, ध्यान और ध्याता; ज्ञान और
ज्ञाता; ये तीन त्रिपुटी मन द्वारा ही कल्पित है। 'अहं' का अर्थ मैं 'कोहं' अर्थात् मैं कौन यह आशंका और 'सोहं'
अर्थात् मैं ही हूँ, यह भेद; अथवा 'त्वं' अर्थात् जीव, 'तत्' अर्थात् ब्रह्म और 'अस्ति' अर्थात् तू है, ये पद; अथवा
सत्, चित् और आनन्द ये सारे सम्बन्ध मायिक हैं। असत् अर्थात् मिथ्या जो माया है, उसे दूर करने के लिये
वेदवाणी भी सत् का प्रतिपादन करती है और जड़ का विलय होने के लिये आत्मवस्तु को ही चैतन्यतत्त्व कहते
हैं। दुःख का निर्मूलन करने के लिये परब्रह्म को ही परमानन्द कहते हैं। इसलिये सच्चिदानंद भी मायिक ही सिद्ध
होता है। असत् मिथ्या होने के कारण मायिक है। वैसा तत्त्व यथास्थान कौन रख पायेगा? जहाँ जड़ के लिये ही
स्थान नहीं है वहाँ चैतन्य का तत्त्व किस प्रकार हाथ लगेगा? जहाँ दुःख का बिलकुल सम्बन्ध नहीं है, वहाँ कोई
आनन्द किसे कहेगा? इसलिये परब्रह्म के स्थान पर सच्चिदानन्द का सम्बन्ध लगाना भी मायिक है। जहाँ संसार
का आभास होता है, वह त्रिगुणों की त्रिपुटी का ही खेल है। इसलिये वह सब भी मायिक और मन का किया
हुआ है। आत्मा नित्य, मुक्त, शुद्ध और ज्ञानस्वरूप है। उसमें जो तीन प्रकार का भेद दिखायी देता है वह मन द्वारा
किया हुआ गुण सम्बन्धी भेद है। इसलिये स्पष्ट ही वह मायामय है। कोई पुरुष अग्निहोत्री है तथा सदाचारी है।
लेकिन उसकी स्त्री यदि व्यभिचारी है तो उसका पति दोषी है, ऐसा लोग कहते हैं, उसी प्रकार यह आत्मा के
भेद की बात है अर्थात् आत्मा वास्तव में अलिप्त रहता है और गुणों के दोष उस पर आरोपित रहते हैं। जिस
प्रकार स्वप्न में अकेला व्यक्ति सारा संसार बन जाता है, लेकिन वह सारा चमत्कार वास्तव में निद्रा के कारण
होता है, उसी प्रकार का भेद का मायिक प्रकार ब्रह्मा में भी है। जड़ और अजड़ यह देह के भेद; अथवा अलग
से किया हुआ जीव का भेद; यह स्वप्न की तरह माया का आभास है। आत्मा, नित्य, शुद्ध और अद्वितीय है। इस
प्रकार माया द्वारा किये गये भेद पर जिसकी निष्ठा है, ऐसे लोगों को वैराग्य प्राप्त करने के लिये काल ने जन्म-
मरण का फेरा लगा दिया। उसी का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च।
कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥ ४२ ॥
उन्होंने कहा, हे उद्धव! सुनो। स्थावर जंगम आदि जो भी देहस्वरूप हैं, उन्हें काल के प्रभाव से नित्य नया
जन्म-मृत्यु का जंजाल लगा हुआ है। काल अपनी सूक्ष्म गति से सारे संसार को ग्रस लेता है। शरीर से चिपके
हुए वे जन्म-मृत्यु जीव को माया के मोह के कारण समझ में नहीं आते। माँ अपने बेटे के अवयव खुले होते हुए
भी उसे नग्न अवस्था में लाड़-प्यार करती है लेकिन वही माँ बेटा बड़ा होने पर उससे शरमाती है। वह
बाल्यावस्था काल ले गया और यह नयी प्रौढ़ावस्था प्राप्त होने पर माँ बेटे से शरमाने लगी। यह सारा परिवर्तन
काल ने ही किया है। यह सूक्ष्म काल इस प्रकार प्राणिमात्र को नित्य नया विनाश और नित्य नया जन्म देता रहता
है। लेकिन भ्रम से भ्रांत हुए प्राणी इस जन्म-मृत्यु का मार्ग नहीं जानते। जीवन की जिस अवस्था का भाग काल
ले जाता है, उसके साथ ही देह भी जाता है। आगे नयी उम्र आते ही काल उसे नया शरीर देता है ऐसा समझना
चाहिये। काल ने किया हुआ उद्भव और विनाश नित्य नया दिखाई देता है। इसलिये देह तीन प्रकारों से युक्त है