श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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किये गये हैं। इसके अतिरिक्त प्रकृति, पुरुष, महत्, अहंकार और अविकृति ये पंच महाभूत, इन नौ में सभी
विकार समुदायों का अंतर्भाव होता है। उसी प्रकार, उद्धव! ऋषिवर्यों के तत्त्वसम्बन्धी विचारों के अनुसार यह
संख्या नौ है। उसी प्रकार कुछ आत्मज्ञानी प्रकृति और पुरुष को दो ही तत्त्व मानते हैं क्योंकि इनके अतिरिक्त
कोई तीसरा तत्त्व जन में या वन में कहीं दिखायी नहीं देता। इससे भी अधिक जिनका निश्चय दृढ़ है वे कहते हैं
कि तत्त्व एक ही है। वही एक तत्त्व अनेक रूपों में भासित होता है। वास्तव में देखा जाय तो सब में एक ही
तत्त्व भरा हुआ है। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार में मूल सुवर्ण तो होता ही है, उसी प्रकार अनेक में ऐक्य रूप
से सचमुच एक ही तत्त्व होता है। जिस प्रकार गन्ने की मिठास गुड़ और चीनी में बढ़ती मात्रा में रहती है, उसी
प्रकार आत्म तत्त्व के सारे तत्त्व प्रकार हैं। उस आत्मतत्त्व को जानने के लिये श्रेष्ठ ऋषियों के अनेक मत हैं।
उनमें से बहुत ही कम मैंने यहाँ बतलाये हैं अन्यथा ग्रन्थों में उनकी संख्या असंख्य है।
इति नानाप्रसंख्यानं तत्त्वानाम्ऋषिभिः कृतम्।
सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम्॥ २५ ॥
लेकिन उनमें जो सर्वज्ञ और ज्ञानी होते हैं, वे मन में अनेक मतों का विचार कर तथा तत्त्वों का वास्तविक
स्वरूप ध्यान में रखकर उनके विभाग करना जानते हैं। आत्मतत्त्व जानने के लिये तत्त्वों का विचार करते समय
तत्त्वों की संख्या कम या अधिक है यह कहने में दोष नहीं लगता है। वास्तव में देखा जाय तो विकारों के
सम्बन्ध में ज्ञाता को बोलने लायक कुछ भी नहीं रहता क्योंकि विकार प्रकृति में रहते हैं। आत्मा शुद्ध अविकारी
ही है। प्रकृति से आत्मा भिन्न है। इसलिये वह अविकारी ही है, यह ध्यान में रखो। सारे विकार प्रकृति में ही हैं,
यही तत्त्वों का प्रमुख लक्षण है। इसलिये हे उद्धव! प्रकृति से पुरुष की भिन्नता जानने के लिये हमें तत्त्वों का
विचार करना चाहिये। कृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव को चमत्कार लगा और उसने विचार किया क्यों न
प्रकृति और पुरुष की भिन्नता के बारे में भगवान से ही पूछा जाय?
उद्धव उवाच
प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ।
अन्योन्यापाश्रयात्कृष्ण दृश्यते नभिदा तयोः॥ २६॥
प्रकृति और पुरुष भिन्न-भिन्न क्यों हैं? यह गहन प्रश्न उद्धव ने भगवान से साढ़े तीन श्लोकों में पूछा।
उद्धव मन में सोचने लगा कि यदि प्रकृति से पुरुष भिन्न है तो फिर इन दोनों से अलग श्रीकृष्ण दोनों का ही
साक्षी है। इसलिये उसने कहा, हे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण देवाधिदेव! लक्ष्मीपति! इसका अर्थ यह है कि प्रकृति और पुरुष
के व्यापार अलग ढंग से देखने वाले तुम एक निराले ही साक्षी हो क्योंकि प्रकृति और पुरुष ये दोनों भिन्न ही हैं।
एक जड़ है और एक चेतन है, यह मैं भी समझता हूँ। लेकिन वे अलग क्यों हैं, यह समझ में नहीं आता। जिस
प्रकार लौह का तप्त गोला बिलकुल अग्नि का सा दिखायी देता है, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष का समन्वय
ऐक्य रूप में बिलकुल दृढ़ हुआ रहता है। जिस प्रकार बीज को पेट में रखकर कणरहित अनाज का छिलका
बढ़ता रहता है, उसी प्रकार प्रकृति भी पुरुष के साथ समरस हो जाती है। अथवा पेट में उत्तम गरी रख कर नीरस
और कनेर करोंटी बड़ी होती है। उसी प्रकार पुरुष के बल पर प्रकृति भी बड़ी होकर विशाल सृष्टि उत्पन्न करती
है। दाने के बिना जिस प्रकार छिलका बड़ा नहीं होता, उसी प्रकार पुरुष के बिना प्रकृति भी दृष्टिगोचर नहीं
होती। अतः प्रकृति-पुरुष की यह पहेली तुम्हारे सिवा कोई हल नहीं कर सकता। सीप के शरीर पर जिस प्रकार