सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

५४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चौथाई आचारों का ही पालन करें और मार्ग में साथियों के अनुसार कर्म करें। देशकाल और परिस्थिति का
विचार करके ही यह मर्यादा धर्मशास्त्र ने लगा रखी है। इससे भिन्न आचरण करने पर कर्ता को सर्वथा दोष ही
लगेगा। शरीर में कर्म करने का सामर्थ्य होते हुए जो कर्म नहीं करता उसे बहुत बड़ा दोष लगता है, उसी प्रकार
शरीर रोग से ग्रस्त है तिस पर भी कर्म करने वाला दोषी होता है। अब तक वस्तुओं की शुद्धि और अशुद्धि की
विधियों के बारे में बतलाया। उसी का प्रतिपादन पुनः वेदोक्त धर्मशास्त्र के अनुसार करते हैं।
धान्यदार्वस्थिततन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।
कालवाय्वग्निमृत्तोयैः पार्थिवानां युतायुतैः॥१२॥
शूद्र ने दान किया हुआ अन्न एक रात्रि में शुद्ध होता है। स्त्रुक, स्त्रुवा आदि जो लकड़ी के पात्र हैं, वे
पानी से धोने पर शुद्ध हो जाते हैं। बाघ के नख और हस्तिदंत जब तक गीले हैं, तब तक अशुद्ध रहते हैं। वही
सूख जाने पर अत्यन्त पवित्र हो जाते हैं। रेशम का धागा मूलतया शुद्ध ही होता है। उनके तंतु वायु से शुद्ध होते
हैं और कपास के वस्त्र के तंतु धोने से शुद्ध होते हैं। गाय का दूध कांसे के बर्तन में अथवा मटकी में रखने से
पवित्र होता है, वही ताँबे के बर्तन में रखने से अपवित्र होता है। इमली आदि खट्टे पदार्थ से ताँबा शुद्ध होता है
और नमक से खट्टे पदार्थ शुद्ध होते हैं। घृत अग्नि संस्कार से शुद्ध होता है, अग्नि ब्राह्मण के मंत्रों से पवित्र
होता है; ब्राह्मण स्वधर्म के आचरण से पवित्र होता है, और धर्माचरण वेद विधि से पवित्र होता है। वह गुरुमुख
से पवित्र होता है, गुरु आत्मानंद से पवित्र होता है, आत्मा (जीव) गुरु चरणोदक से पवित्र होता है, और उदक
ब्राह्मणों के चरण से पवित्र होता है। लीपने से धरती पवित्र होती है, मिट्टी से जल पवित्र होता है, तेल से
चमड़ा पवित्र होता है और चमड़े के पात्र में रखने से तेल पवित्र होता है। व्याघ्रचर्म, कृष्णाजिन आदि चर्म
मूलतया पवित्र होते हैं। अग्निसंस्कार से सुवर्ण सहज ही पवित्र होता है। इस प्रकार परस्पर पदार्थों से परस्पर
पवित्रता के आने की बात स्मृति शास्त्रों में बतायी गयी है। अब मल से लिप्त होने पर, किस प्रकार उसमें
पवित्रता आती है, सुनो।
अमेध्यलिप्तं यद् येन गन्धं लेपं व्यपोहति।
भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते ॥१३॥
बर्तन, चौकी अथवा किसी भी प्रकार का आसन अमंगल पदार्थ से लिप्त होने पर, जब तक उसकी
दुर्गंध न जाय तब तक धोने से उसे पवित्रता आती है। शरीर में नाभि के नीचे अमंगल लेप लगा हो तो उसे
स्थान की दुर्गन्ध पूरी तरह समाप्त होने तक धोने से उस पुरुष में पवित्रता आती है। नाभि के ऊपर अकस्मात
अमंगल पदार्थ का लेप लग जाय, तो मृत्तिकास्नान करने से वह पुरुष पवित्र होता है। मल धोने से तत्काल
चला जाता है; लेकिन उसकी महक जाने तक शरीर पहले जैसा नहीं हो जाता। इसी का नाम है 'मलनिष्कृति'
बाह्य पदार्थों की मल निवृत्ति के लिये ही वेद ने इतना बताने का श्रम लिया। अब कर्त्ता की पवित्रता के संबंध
में उपाय बताता हूँ, सुनो।
स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभिः।
मत्स्मृत्या चात्मनः शौचं शुद्धः कर्माचरेद् द्विजः ॥ १४॥
गर्भाधान से अन्नप्राशन संस्कार होते हैं वह बाल्यावस्था है। चौल संस्कार कुमारावस्था है और उपनयन
संस्कार से ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है। कर्माधिकार प्राप्त करने के लिये स्नान करें; द्रव्यशुद्धि के लिये दान करें,

इक्कीसवाँ अध्याय ५४९
वैराग्य के लिये तप करें और आलस्य जाने के लिये कर्म करें। मेरे भजन के प्रति दृढ़ बुद्धि रखना इसी का नाम
है 'वीर्यशुद्धि' और मेरे अविरत स्मरण से 'चित्त शुद्धि' निश्चय रूप से प्राप्त होती है। जो बुद्धिमान ब्राह्मण हों,
उन्हें इस प्रकार अंतर्बाह्य शुद्ध होना चाहिये। इसके लिये वेद ने अपने-अपने कर्म बताये हैं।
मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धेर्मदर्पणम्।
धर्म सम्पद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्ययः॥ १५॥
मंत्रार्थ ज्ञान से मंत्र शुद्धि होती है, ब्रह्मार्पण से कर्म शुद्धि होती है; कर्ता की शुद्धि के लिये वेद ने छः
लक्षण बताये हैं। देश, काल, द्रव्यसंग्रह, मंत्र, कर्म और निरोगी कर्त्ता ये छह अवस्थाएँ शुद्ध हों तो स्वधर्म
फलदायी होता है। अनाथ, दीन लोगों के पास संकट के समय जो द्रव्य पहुँचता है, अथवा मेरे भक्त के पास
जाता है, वही वास्तव में 'द्रव्य की पवित्रता' है। स्वयं कष्ट से अर्जित किया हुआ धन धर्मशास्त्र के अनुसार शुद्ध
है, लेकिन धन के लालच में प्राण अटका हुआ हो तो वह सारा धन अशुद्ध है। इसी को धन की शुद्धता कहते हैं।
अब मंत्र की पवित्रता सुनो। जिस मंत्र से मंत्र की सिद्धता होती है, वही मंत्र सर्वथा शुद्ध है। जिस मंत्र के लेने से
देह में अभिमान बढ़ता है, अथवा जिसमें जारण-मारण उच्चाटन आदि रहता है वह मंत्र अपवित्र हैं। इस प्रकार
'मंत्रशुद्धि' बतायी। अब कर्म का लक्षण सुनो। तो जिस कर्म के योग से कर्म का बन्धन टूटता है वह कर्माचरण
अत्यन्त शुद्ध है। कर्माचरण करते समय जिसमें देहाभिमान खौलता है और कर्ता का बन्धन अधिक दृढ़ होता है,
वह कर्म अपवित्र है। जिस कर्म से कर्म का निवारण होता है, वही कर्म वास्तव में शुद्ध है और उद्धव! जहाँ
सर्वदा अविनाश समबुद्धि रहती है; वह देश पुण्यवान है। यदि सुक्षेत्र में वास करे किन्तु वहाँ दूसरों के गुणदोष
दिखायी देने लगे तो वह देश भी तामस है। उसके योग से कर्त्ता का अचूक नाश होता है। अन्य क्षेत्रों में दोष
देखने से उनका उत्तम क्षेत्र में विनाश होता है; किन्तु उत्तम क्षेत्र में ही दोष देखने पर वे कल्पांत में भी जीव को
नहीं छोड़ते। जहाँ ऐक्य भाव का निर्माण होता है उस देश को निर्मल समझना चाहिये और चित्त को सुप्रसन्न
करने की जो बेला है वही साधक का पुण्यकाल समझना चाहिये। 'ब्राह्ममुहूर्त' का अर्थ है, भोर की बेला। यह
समय स्वाभाविक रूप से पवित्र है। उसमें भी यदि चित्तक्षोभ हो तो वह काल भी अपवित्र समझना चाहिये। अब
जो कर्म कर्ता है उसकी कर्म की अहंता यदि नष्ट हो जाय, तभी वह कर्म स्वाभाविक रहता है। यही कर्ता की
पवित्रता है। उसमें यदि कोई 'मैं कर्ता' कहे तो वह बद्ध हो जाता है। देहाभिमान के कारण कर्ता अपवित्र होता
है। इस प्रकार धर्माधर्म के छह प्रकार हैं। यही वेदार्थ तत्त्व का सार है। इसी धर्म से पुरुष मुक्त होता है और
अधर्म से अपवित्र होकर बन्धन में फँसता है। इस प्रकार गुणदोषों का लक्षण बहुत गहन है। उसमें बड़े-बड़े
ज्ञानी, चतुर पण्डित भी भ्रम में पड़ जाते हैं।
कश्चिद्गुणोऽपिदोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः।
[L

५५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
में लेने से मद्यपान का दोष लगता है। कटहल खाने में मीठा लगता है, लेकिन अधिक खाने पर पेट में दर्द उठ
ब्रह्माण्ड फटने जैसा कष्ट होता है। सूर्य की पूजा करने से पुण्य लगता है लेकिन यदि कहीं बेल का पत्ता चढ़ा
दिया तो पुण्य की बात दूर उलटे पाप ही लगता है। ऐसे कर्म में ही कर्म का विधि निषेध प्रकार रहता है। कभी-
कभी गुण ही दोष बन जाता है, तो कभी-कभी दोनों ही से ढेरसारा पुण्य प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ, जिस रास्ते
पर चोर हों वहाँ प्रातःकाल स्नानकरने वाले ब्राह्मण को वह कर्म न करने दे और उसे कहीं दूर ले जाएँ तो वह
दोष ही है किन्तु गुण सिद्ध होता है। अग्निहोत्र करना गृहस्थ का गुण है, लेकिन यदि वह कोई संन्यासी करे तो
वह दोष होता है। वेदमंत्र का पठन ब्राह्मण का विहीत गुण है लेकिन वह शूद्र के लिये दोषकारक होता है।
विषय से निवृत्ति प्राप्त करने के लिये गुणदोषों के सुगम नियम बनाये गये हैं। वेद का मर्म न समझने के कारण
इसमें भ्रमिष्ट लोगों को विषय का भ्रम होता है। जब तक भ्रान्ति रहती है तब तक कर्मप्रवृत्ति रहती है। अँधेरी
रात में ही जुगनू चमकते हैं, उसी प्रकार अज्ञान स्थिति में ही गुणदोषों का महत्त्व होता है। गुणदोषों में पतन यह
अवश्य ही किसी दिन माथे पर गिरता है। इसी अर्थ का निरूपण भगवान कर रहे हैं।
समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।
औत्पत्तिकोगुणः सङ्गो न शयानः पतत्यधः ॥ १७ ॥
महार, भील, मछुआरे अपने कर्म से ही पतित हुए हैं। ऐसे पतितों को मद्यपान आदि दोषों से अधिक
पतन नहीं है। नील में डुबाये हुए काले कपड़े को काजल और अधिक क्या काला करेगा? अथवा अन्धकार
को स्याही लगाने से वह और क्या अधिक मैला होगा? उसी प्रकार जो स्वयं ही चांडाल कुल में पैदा हुआ है
उस पर किसकी छूत का असर पड़ सकता है? काजल को और अधिक काला करने की शक्ति कीट में नहीं
होती। निर्जीव को विष देने से उसे क्या दुःख होगा? उसी प्रकार पतित के लिये पातक कभी बाधक नहीं
होता। जो नीचे ही सोया है उसे गिरने का क्या भय ? उसी प्रकार जिस पर देहाभिमान का असर होता है, वह
नीच से भी अधिक नीच बन जाता है। रजंतमादि गुणों की संगत से जो विषयलंपट हो जाता है, उसे कामभोग
बुद्धि नयी नहीं लगती। जो धतूरे का बीज खाकर बकने-झकने लगता है और नाचने-गाने लगता है, उसकी
गाँठ से धन चोरी हो जाय तो उसकी उसे परवाह ही नहीं होती। उसी प्रकार जो देहाभिमान के कारण उन्मत्त
हो जाता है, अत्यन्त काम लोलुपता के कारण जो कामासक्त हो जाता है, उसे अपने स्वार्थ की होने वाली हानि
समझ में नहीं आती। जिस पर विष का असर होता है उसे सुअर की विष्टा खिलाते हैं, उसी प्रकार
विषयालोलुप पापी लोगों के लिये मैंने स्वपत्नीनिष्ठा की मर्यादा बना दी है। क्योंकि जिस पर विष का प्रभाव
रहता है, उसे उस समय सुअर की विष्ठा औषधि के रूप में देनी चाहिये ऐसा ज्ञानी लोगों का कहना है। उसी
प्रकार जब तक स्त्री और पुरुष हैं, तब तक विषयलंपट का स्वेच्छाचार वेद ने सपत्नी निष्ठा की सीमा बाँध दी
है। फिर भी वेद की आज्ञा के अनुसार, कहीं लोग अपनी स्त्री के साथ दिन-रात गमन न करें इसलिये उन्होंने
प्रतिबन्ध लगाया कि केवल ऋतुकाल में ही गमन करना चाहिये। उसमें भी यदि पुत्र का जन्म हो जाय तो
'आत्मा वै पुत्रनामासि' इस वाक्य से वेद ने स्त्रीकाम से परावृत्त किया है। विष का प्रभाव पूरी तरह समाप्त
होने पर वह सुअर की विष्ठा हाथ में भी नहीं लेता, उसी प्रकार अंतःकरण में विरक्ति उत्पन्न होने पर वे स्वस्त्री
का भी त्याग करते हैं। इस प्रकार विषय की निवृत्ति ही वेद में बतायी गयी है। वह वेदोक्ति गुणदोष दिखाकर
विषय पर से आसक्ति हटा देती है।

इक्कीसवाँ अध्याय ५५१
यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।
एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥१८॥
विषय से निवृत्ति हो, यही मेरे वेद का उद्देश्य है, इसलिये विषय छोड़ने के लिये ही गुणदोष दिखाने का
उपाय बताया है। प्राणी अकस्मात् ही सारे विषयों का त्याग नहीं कर पाते इसलिये निषेध रूप में उसकी निंदा कर
धीरे-धीरे विषय छूट सकें ऐसी योजना की गयी है। जैसे-जैसे विषय से निवृत्ति होती है वैसे-वैसे आत्मसुख की
प्राप्ति होती जाती है। पूर्ण विरक्ति होने पर साधक मत्स्वरूप हो जाता है। मत्स्वरूप की प्राप्ति में विषयासक्ति ही
बाधक होती है। उसकी निवृत्ति होने पर, साधक मत्स्वरूप हो जाता है और जब मेरे स्वरूप की प्राप्ति होती है
तब अहंकार पूरी तरह नष्ट हो जाता है। फिर शोक मोह शान्त होकर, अविद्या भी सचमुच नष्ट होती है। अविद्या
का नाश होते ही भयंकर जन्मभाव नष्ट हो जाता है। तब मृत्यु की ही मृत्यु हो जाती है और जीव का जीवत्व
समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होते ही अँधेरे के साथ रात्रि के लिये भी कोई स्थान नहीं रह जाता,
उसी प्रकार अविद्या जीव के साथ समाप्त होते ही, संसार भय को स्थान ही नहीं रह जाता। दृष्टि स्थिर होने पर
जिस प्रकार मृगजल की बाढ़ नहीं रह जाती, उसी प्रकार भवभय के साथ सारा संसार ही मिथ्या हो जाता है।
वेदोक्त स्वधर्माचरण प्राणियों के कल्याण के ही लिये है और विषय त्याग के लिये गुणदोषों का निरूपण किया
गया है। जिन्हें वेद का अर्थ समझ में नहीं आता वे उसे प्रवृत्तिपरक कहते हैं लेकिन वास्तव में वेद ने विषयों के
प्रति आसक्ति नष्ट करने वाली विरक्ति ही बताई है। वेदों के अनुसार स्वधर्म स्थिति से रहने पर विषयों के प्रति
विरक्ति उत्पन्न होती है और प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं, यही मेरी वेदोक्ति है। वेद की आज्ञा का पालन न कर
केवल विषयों के प्रति आसक्ति रखने से प्राणी अत्यन्त दुःख के भागी होते हैं। प्रवृत्ति जितनी भी है, वह
अनर्थकारी ही है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीभगवान चार श्लोकों में उद्धव को बताये हैं।
विषयेषु गुणाध्यासात् पुंसः सङ्गस्ततो भवेत्।
सङ्गात्तत्र भवेत् कामः, कामादेव कलिर्नृणाम् ॥ १९ ॥
कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।
तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी द्रुतम् ॥२०॥
जिसका मन सदा विषय के माधुर्य का ही स्मरण करता रहता है, उसमें अत्यन्त प्रबल विषयासक्ति उत्पन्न
होती है। विषयासक्ति बढ़ते ही निर्लज्ज काम खौल उठता है और उसके लिये वह अत्यन्त संकट के दुर्गम प्रसंग
सहन करता है। किन्तु विषयप्राप्ति के जो भी उपाय सोचते हैं वे पग-पग पर हानिकारक ही सिद्ध होते हैं। जब
तक विषयवासना की पूर्णता नहीं होती तब तक बहुत प्रबल कलह मचा रहता है। जहाँ वितंडा की अति हो
जाती है वहाँ उस कलह में सहायता करने वाला विरुद्ध और दुर्धर क्रोध तैश में आ जाता है। इससे बुद्धि का ज्ञान
तत्काल नष्ट हो जाता है। तब महामोह विवेक को ग्रस लेता है। विवेक का भान लुप्त होते ही चेतना भी
आश्चर्यचकित हो उठती है और फिर कार्य और अकार्य का भेद भी विस्मृत हो जाता है।
तया विरहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते।
ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशो मूर्च्छितस्य मृतस्य च॥ २१ ॥
विवेकशून्य हो कर मूढ़ हो जाने पर फिर न विषय ही रह जाता है और न परमार्थ ही। सन्मार्ग का मार्ग

५५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं दिखायी देता, इसलिये पग-पग पर आत्मघात होता रहता है। जड़-मूढ़ होकर वह बेसुध की तरह स्तब्ध हो
जाता है और अज्ञान के कारण मन मसोसता रहता है। इस प्रकार न ठीक तरह से सजीव और न ठीक तरह से
निर्जीव, इस प्रकार मूढ़ होकर रहता है, और प्राप्त लाभ से वंचित होकर व्यर्थ का अनर्थ भोगता है।
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।
वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्वसन्॥ २२॥
इस प्रकार विषय की आसक्ति के कारण जब तमोगुण वृत्ति को ग्रस लेता है तब किसी भी बात का
स्मरण नहीं रहता। मैं कौन हूँ, इसका भी स्मरण नहीं रहता। दारू पीने पर जिस प्रकार मनुष्य बदहवास हो
जाता है और उसके स्मरण का विस्मरण होकर मन में भ्रम उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मनुष्य भ्रम के जाल में
फँसा हुआ है। अथवा विषमज्वर में मनुष्य चाहे जैसी बातें करने लगता है, उसे अपना और पराया भी याद
नहीं रहता, व्यर्थ की बकवास करता रहता है। चित्त भ्रमित होने के कारण उसे किसी भी बात का ठीक से
स्मरण नहीं होता। इस प्रकार प्राणी संकट भोगता रहता है अथवा शरीर में भूतसंचार होने पर वह हुँः हुंः करता
रहता है और भ्रम के कारण स्वयं को श्वान समझ कर भूँकने लगता है। इसी प्रकार सोया हुआ व्यक्ति अपना
अस्तित्व भूलकर जैसे स्वप्न में घबरा रहा हो और कह रहा हो, मैं रण में फँस गया हूँ, वैसे ही ये सारे प्राणी
मोह में फँसे हुए हैं। ऐसी झूठी भूलभुलैया में फँस कर प्राणी काम के मोह में व्याप्त हो गये हैं। जड़मूढ़ होकर
अन्तःकरण में पागल हो गये हैं। बकरी के नाक में कीड़ा घुस जाये तो वह घबरा कर खें-खें करके अपनी
व्यथा प्रकट करती है। उसी प्रकार दुःख के आवेश में प्राणी विह्वल हो जाते हैं और सन्मार्ग न मालूम होने के
कारण मोहमद में भूलकर मूक होकर विह्वल होते रहते हैं। अहंकार के बल से शरीर में वायु भर जाती है और
वही बाधक होकर वे पिछले रास्ते से चलकर गहरे कुएँ में गिर पड़ते हैं। तेली का बैल जिस प्रकार आँख पर
बँधी पट्टी के साथ चलता जाता है, उसका रास्ता कभी खत्म नहीं होता। जल्दी-जल्दी अपने चारों ओर घूमता
जाता है लेकिन उस घूमने का कोई अंत नहीं होता। घान का चक्कर लगाते-लगाते उसे चक्कर आने लगता है।
उसी प्रकार विषय निरन्तर चलने वाला संसारचक्र है। किन्तु विधि की माया समझ में नहीं आती। सर्प पगलाता
है तो जिस प्रकार भागता फिरता है, उसी प्रकार सारे विषय भागते रहते हैं। अमावस्या के अन्धकार की तरह
वह जड़ मूढ़ और स्तब्ध हो जाता है। उसे अपने और पराये का भान नहीं रहता। सारे संसार में अन्धकार फैल
जाता है। लोहार के भाते की तरह साँसे अवश्य चलती रहती हैं। जिस प्रकार वृक्ष तटस्थ खड़े रहते हैं, उसी
प्रकार वे भी न ठीक से जीवित, न ठीक तरह से मरी हुई स्थिति में खड़े रहते हैं। अब तुम कहोगे कि सकाम
कर्म करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है ऐसा वेद में बताया गया है, लेकिन यह भी लालची लोगों का ही
कहना है। तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
फलश्रुतिरियं नृणां न श्रेयो रोचनं परम्।
श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम्॥ २३॥
मूर्ख लोग निष्काम कर्म कभी नहीं करते, इसलिये उन्हें फलश्रुति दिखला कर स्वकर्म के लिये प्रवृत्त किया
है। सकाम कर्म करने की और निष्काम कर्म करने की प्रक्रिया एक जैसी ही होती है लेकिन दोनों के फल का
उद्देश्य अलग-अलग होता है। स्वाती का जल सीप में गिरता है तो मोती बन जाता है लेकिन वही जल यदि सर्प
प्राशन करे तो वह विष बन जाता है। उसी प्रकार निष्काम कर्म मुक्ति दिलाता है तो सकाम कर्म दृढ़बन्धन में

इक्कीसवाँ अध्याय ५५३
फँसाता है। वेद ने स्वर्ग का जो फल बताया है वह मुख्य नहीं है। जिस प्रकार वैद्य बच्चे को दवा खाने के लिये
गुड़ का लालच दिखाता है, उसी प्रकार यह स्वर्ग भी एक लालच ही है। औषधि खाने से क्षयरोग दूर हो जाता
है, लेकिन बच्चा गुड़ चाटता रहता है। उसी प्रकार वेद का हृद्गत यह है कि स्वर्गफल की आशा दिला कर मूर्खों
को मुक्त करने के लिये स्वधर्माचरण कराना। तुम कहोगे, कर्मवादी लोग वेद को प्रवृत्तिपरक कहते हैं, उसी वेद
को निवृत्तिपरक कैसे माना जाय ? इसका उत्तर यह है कि श्रुति का अर्थ यदि प्रवृत्तिपरक होता तो वेद अनर्थकारी
सिद्ध होता है। इसलिये उस प्रवृत्ति को ही दोष देकर श्रीकृष्ण वेद का अर्थ निवृत्तिपरक है इसका स्पष्टीकरण
करते हैं।
उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।
आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु ॥ २४॥
न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।
कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः ॥ २५॥
जन्म लेते ही प्राणिमात्र को अपना देह अच्छा लगने लगता है। 'मैं ही देह हूँ' यह मानकर वह जीवभाव से
विषय पर लुब्ध रहता है। विषय की आसक्ति के कारण मन में स्त्री पुत्रों के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है। स्वजनों पर
और धन पर अत्यन्त प्रेम जागृत होता है। वह स्वाभाविक स्थिति अनिवार्य रहती है। जिसके कारण अधोगति को
जाना पड़ता है, वह कामासक्ति प्राणियों को नैसर्गिक ही रहती है। वही विषय की प्रवृत्ति यदि वेद विधिपूर्वक
बताये तो वह वेदवाणी सबको डुबोने वाली अर्थात् महाअनर्थकारी होगी। मरने वाले को चाबुक की मार दी
जाय, डूबने वाले के मस्तक पर पत्थर मारा जाय अथवा अन्धे को कुएँ में ढकेला जाय, उसी प्रकार वेद भी
अनर्थकारक होगा। वेद ही यदि विषयों में लिप्त करने लगे तो प्राणियों को और कौन छुड़ाएगा ? राजा ही अगर
सर्वस्व लूट ले तो गरीबों को कौन मुक्त करेगा ? वेद का अर्थ समझे बिना जो स्वयं ही विषयासक्त हो जाता है,
वह श्रुति के अर्थ को प्रवृत्तिपरक ही मानता है और इसीलिये वह मूर्खों के लिये अनर्थकारी होता है। ग्रहण के
समय पुत्र ने पिता से कहा, सुबह बनी हुई खीर खा लें। तिस पर बाप ने कहा, ग्रहण छूटने पर हम हमारे घर में
बना ताजा खाना ही खाएंगे। वैसा ही मेरा वेद कहता है। निषेध मुख से प्रवृत्ति दिखा दी है। सारांश, विषय की
निवृत्ति यही वेद का मनोगत है। विषयों में डूबने वालों के लिये ही मेरी वेदवाणी है, जो उनका उद्धार करती है।
वह सकाम नहीं है। किन्तु जो मंदबुद्धि के लोग हैं, वे पूर्णतयः विषयांध होते हैं। वही लोग वेद के सकाम होने
की रट लगाते हैं। उनकी दुर्बुद्धि के बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं।
एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः।
फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि ॥ २६॥
सकाम लोग फल की इच्छा छोड़कर स्वधर्माचरण कभी नहीं करते, इसलिये स्वधर्म की ओर प्रवृत्ति होने
के लिये वेद ने फलश्रुति बतायी है। नमक जब समुद्र से मिलने जाता है तो उसका खारापन समाप्त हो जाता है,
उसी प्रकार स्वधर्म की ओर प्रवृत्ति होने पर उसकी सकामता रहती ही नहीं। दो बातियों को मिलाकर यदि एक
बाती कर दी जाय तो जिस प्रकार उनमें कोई भेद नहीं दिखायी देता, कपूर अग्नि में मिल जाने पर वह भी अग्नि
ही हो जाता है, उसी प्रकार स्वधर्म कर्म का आचरण करने पर अपने आप ही निष्कर्मता प्रकट होती है। कर्माकर्म

५५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाँस का जंगल है, उसमें स्वधर्म का घर्षण होनेपर चित्तशुद्धि की चिनगारी निकलती है जो उस कर्माकर्म को
जलाकर भस्म कर देती है। कामना के साथ कर्म करने से भी, स्वधर्म जब फलेच्छा को नष्ट करता है, तब
सकाम और निष्काम दोनों ही कर्मों को स्वधर्म भस्म कर देता है। दो लकड़ियाँ जब एक-दूसरे पर रगड़ती हैं तो
उससे अग्नि उत्पन्न होता है और वह दोनों लकड़ियों को जलाकर अपनी ही दीप्ति से प्रकट होता है। उसी प्रकार
मेरी वेदवाणी है जो स्वकर्म से ही कर्म का बन्धन तोड़ देती है। यह मर्म न जानने से विषयांध पुरुष फल की
आशा से जकड़ा रहता है। वेद ने स्वकर्म प्रवृत्ति में रुचि उत्पन्न करने के लिये स्वर्गादिक अनेक फल बताये हैं
लेकिन जो उनके ही फेर में पड़ता है वह अपने लाभ से वंचित हो जाता है। खेत को बड़ी मेहनत से तैयार कर
उसमें चना बोया, लेकिन वह हरा था तभी उसे उखाड़ कर उसकी सब्जी बना ली। अब इसे लाभ समझें या
हानि ? उसी प्रकार सकाम के फल की स्थिति है। जोनरी के हरे बाल खाने में बहुत मीठे लगते हैं; लेकिन उसके
लिये यदि पूरा खेत ही उखाड़ दिया जाय तो लाभ होगा या हानि होगी ? उसी प्रकार जो लोग सकाम बुद्धि से
उन्मत्त होते हैं, जो फल की आशा से लुब्ध होते हैं, वे किस प्रकार स्वधर्म के लाभ से वंचित रह जाते हैं, यही
तुम्हें बताता हूँ। खेत में बोने के लिये लाये गये चने को यदि कोई भट्टी में भून कर खा जाय उसे बुद्धिमान कहा
जाय या मूर्ख ? उसी प्रकार वह सकाम का फल भोगता है। घोड़ा बेचकर कोई जीन खरीद ले, मक्खन देकर
छाछ माँगे, भात फेंक कर माँड़ पिये उसी प्रकार सकाम का फल भोगता है। जो ऐसे सकाम और मूर्ख होते हैं वे
स्वधर्म की सिद्धि से वंचित रह जाते हैं। इसीलिये भगवान उन्हें कुबुद्धि कहते हैं। उस कुबुद्धि के भी लक्षण
भगवान बताते हैं।
कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु फलबुद्धयः ।
अग्निमुग्धा धूमतान्ता स्वंलोकं न विदन्ति ते ॥ २७॥
सकाम की तृष्णा कभी पूरी नहीं होती। काम की इच्छा से उसकी स्थिति सदा दयनीय रहती है, इसलिये
उसे 'कृपण' कहते हैं। बगुला जिस प्रकार पानी में मछली के लिये ध्यान करके बैठता है, उसी प्रकार सकाम
मनुष्य फल की इच्छा से लुब्ध होकर अनुष्ठान करता रहता है। पर-पुरुष के पास जाना सुलभ हो, इसलिये
जिस प्रकार व्यभिचारिणी अपने पति के आगे-पीछे करती रहती है, उसी प्रकार वह भी मन में फल की इच्छा
कर स्वधर्म का आचरण करता रहता है। अज्ञान बालक जिस प्रकार फूल को ही फल समझता है, उसी प्रकार
वह भी मूर्खता के कारण स्वर्ग के सुख को अक्षय समझ बैठता है। उस स्वर्गसुख की प्राप्ति के लिये कर्म
यथाविधि होंगे या नहीं इसका भी उसे सन्देह होता है, जिससे उसकी स्थिति अत्यन्त दयनीय हो जाती है।
सकाम सदा दीन ही रहता है; उस दीनता के कारण वह अत्यन्त कृपण और लालची हो जाता है। लोभ के
कारण उसके ज्ञान को महामोह ग्रस लेता है। मोह जब क्षुब्ध होता है तो वह विवेक के साथ-साथ ज्ञान को भी
निगल लेता है। उस समय बुद्धि में अंतर्बाह्य तमोगुण ही उफनने लगता है। तमोगुण से जब बुद्धि भर जाती है
तो धुँधलके की सी स्थिति हो जाती है। अन्धे की संगत से कोई अँधेरी रात में जंगल में खो जाये उसी प्रकार
सकाम पुरुष की स्थिति हो जाती है। विवेक की संगति टूटने पर अन्धी वृत्ति अत्यन्त प्रसन्न हो उठती है।
अज्ञान बालक की तरह वह पूरी तरह मुग्ध हो उठता है, फिर कर्म क्या है और उसका फल क्या है यह उसकी
समझ में नहीं आता। संसार में मेरी क्या स्थिति है ? आगे मेरी गति क्या होगी ? देह में धूम्रवृत्ति होने के कारण
उसे कुछ स्मरण नहीं होता।

इक्कीसवाँ अध्याय ५५५
न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।
उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८॥
तुमने वेद के रहस्य का मर्म पूछा था, इसलिये उसकी गुह्य बातें मैंने तुम्हें बतायीं। वेद के ये विभाग सुनकर
उद्धव को अत्यन्त आनन्द हुआ। इससे सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने उद्धव को, 'हे अंग' कहकर सम्बोधित किया।
जो सकाम होते हैं उनकी काम पर आसक्ति होने के कारण, वे सबके हृदय में रहने वाले मुझ परमात्मा को नहीं
पहचानते। मैं हृदय में अवश्य रहता हूँ लेकिन इतने से मैं एकदेशी नहीं हो जाता। जिस प्रकार समुद्र लहरों के रूप
में प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार मैं जगदाकार के रूप में प्रतीत होता हूँ। अलंकार का रूप लेने पर भी जैसे वह
शुद्ध सुवर्ण ही होता है, उसी प्रकार मैं श्रीकृष्ण संसार के आकार की परिपूर्णता से पूर्ण ही हूँ। नाम, रूप अथवा
अनेक वर्ण अथवा यह संसार इस प्रकार का जो बोध है वह मेरे ही ज्ञानप्रकाश के कारण होता है। फिर भी
नामरूप अथवा जातिभेद आदि का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है। आकाश भले ही जल में डूबा हुआ दिखायी दे
लेकिन वह जल से गीला नहीं होता। उसी प्रकार मैं भी संसार के आकार का होते हुए भी उसके दोषों से अलिप्त
रहता हूँ। मेरे जैसा विश्वात्मा और विश्वंभर, विश्वमूर्ति और विश्वेश्वर होते हुए भी शिश्नोदर परायण अज्ञानी
लोग मुझे नहीं पहचानते। जिसकी आँखों के आगे अँधेरा छाया रहता है अथवा जो भयानक गुफा में फँस जाता
उसे अगला या पिछला कुछ नहीं दिखायी देता और वह अकस्मात गड्ढे में गिर पड़ता है। उसी प्रकार मोह ममता
की भ्रान्ति से, अज्ञानरूपी निद्रा में अंतर्बाह्य व्याप्त होकर मैं निकट होते हुए भी वे मुझे नहीं देखते और अज्ञान की
विशाल गर्त में जा गिरते हैं। मेरे वेद का अर्थ न समझने के कारण जो पूरी तरह कामासक्त हो जाते हैं वे मैं निकट
में रहते हुए भी मुझे नहीं पहचानते और अपना अधःपतन करा लेते हैं। तो मैं निकट किस प्रकार हूँ यह पूछोगे तो
ज्ञान का प्रकाश देने वाला मैं सबके हृदय में रात दिन वास करता हूँ। मेरे वेद का वास्तविक अर्थ कामासक्तों की
समझ में नहीं आता। उसी सम्बन्ध में स्वयं श्रीकृष्ण स्पष्टीकरण दे रहे हैं।
ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मकाः।
हिंसायां यदि रागः स्याद् यज्ञ एव न चोदना॥ २९॥
मेरे वेद का भाव अगम्य है। उसका गूढ़ार्थ न समझने के कारण सकाम पुरुष बड़े उत्साह से स्वर्ग को ही
सत्य मान लेते हैं। वेद ने स्वर्ग का उल्लेख केवल रुचि उत्पन्न करने के लिये किया है; लेकिन वही उसका
वास्तविक अर्थ समझ कर कामालुब्ध लोग अनेक प्रकार के स्वर्गादिक साधनों का प्रयोग बड़े उत्साह से करने
लगते हैं। उसमें स्वयं मांस भक्षण करने के लिये यज्ञ का बहाना करते हैं। उनकी दृढ़ प्रवृत्ति अपनी इच्छा पूरी
होने के प्रति ही होने के कारण अविधि से ही पशु की हत्या करते हैं। ऐसे लोगों की हत्या तो उन्होंने मारे हुए
पशु ही करते हैं। हाथ में लपलपाती तलवारें लेकर, बदला लेने के लिये वे यम के द्वार पर खड़े रहते हैं। उन्हें
स्वर्गसुख कैसा ? पेटभर मांस खाने के लिये स्वेच्छा से पशु मारने पर नियंत्रण लगाने के लिये वेद ने केवल यज्ञ
के लिये पशु का हनन करने की अनुमति दी है। उसमें भी देश, काल, वर्तमान, मंत्र, विधि, विधान और सारे
द्रव्य शुद्ध हों ऐसा भी प्रतिबन्ध लगा दिया है और कर्ता भी सशक्त हो, ज्ञानसम्पन्न और श्रीमान हो क्योंकि मुट्ठी
के प्रहार से पशु को मारते समय यदि 'में' 'में' ऐसा शब्द पशु ने निकाला तो उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता है।
वेद में अनेक कठिन प्रायश्चित्त बताये गये हैं। फिर भी महामूर्ख सकाम लोग पशु मारने के लिये तत्पर रहते हैं।
इस प्रकार पशु को मारने के बाद अपने हिस्से में जितना आये उतना ही मांस भक्षण करना चाहिये। वह भी इस

५५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तरह खाना चाहिये कि दाँत न लगे। इस प्रकार अपना हिस्सा खाते समय यदि कोई स्वाद लेता है तो उसे भी
प्रायश्चित्त लेना पड़ेगा ऐसा निर्देश भी वेद ने दिया है। सारांश, मांसभक्षण करने की वेद की आज्ञा नहीं है,
बल्कि मांसभक्षण की निवृत्ति करने के लिये ही यज्ञ का विधान लगा दिया है। अपनी इच्छा से पशु न मारें
इसलिये यज्ञ में पशु मारने का नियम बना दिया गया है और मांसभक्षण न करें इसलिये यज्ञ के भाग को निश्चित
कर दिया है। लेकिन वेद का यह नियम भी मूर्खों की लालच पर नियंत्रण करने के लिये है। वास्तव में, पशु
हिंसा करना और मांस भक्षण भी न करना यही वेद का सच्चा गुह्य है।
हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया।
यजन्ते देवता यज्ञैः पितृभूतपतीन् खलाः ॥ ३०॥
वेदोक्त विधि की परवाह न कर जो लोग पशु हत्या का खेल खेलते हैं, वे अविधि से पशु वध कर याज्ञिक
होने की शेखी बघारते हैं। अविधि से प्राण लेकर उस पशु से यज्ञ करते हैं; और फिर निश्चिंत होकर पितृ-देव-
भूतगण इन सबको हविर्भाग देते हैं। खोखला बीज यदि खेत में डालें तो फसल से हाथ धोना पड़ेगा। बीज तो
नष्ट होगा ही सरकार का लगान अलग से देना पड़ेगा। अविधि से यज्ञ करने वालों की यही गति होती है। स्वर्ग
तो स्वप्न में भी नहीं दिखायी देता, लेकिन यह नरदेह छूट जाता है और अन्त में यमयातना के दुःख भोगने पड़ते
हैं। पशुओं को व्यर्थ ही दुःख देते हैं और स्वयं भी दुःखी होते हैं। इस प्रकार याज्ञिकों की गति विलक्षण हो जाती
है। उसी के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।
आशिषो हृदि संकल्प्य त्यजन्त्यर्थान् यथा वणिक् ॥ ३१॥
स्वप्न दिखायी देता है और तत्काल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार संसार कल्पना में ही दिखायी देता है।
कामना से पगलाये सकाम पुरुष स्वर्ग को सत्य समझ बैठते हैं। मृगजल बिलकुल मिथ्या है, उसके शीतल जल
के लिये बालक हठ करे उसी प्रकार सकाम पुरुष स्वर्ग का हठ कर बैठते हैं। 'पीपल पर से मार्ग है' यह सुनकर
जो उस वृक्ष पर चढ़ने लगता है और भ्रमजल में फँस जाता है, उसी प्रकार स्वर्ग का वैभव सुनकर सकाम की
गति होती है। मनुष्य स्वधर्म के मार्ग पर चले इसलिये वेद स्वर्ग का एक गौण फल दिखलाता है; लेकिन सकाम
पुरुष भ्रम में उसी स्वर्ग के पीछे दौड़ते हैं। 'पीपल पर से रास्ता है' सुनकर बुद्धिमान पुरुष उस मार्ग की ओर
ध्यान देकर चलता है और पीपल की परिक्रमा कर आनन्दपूर्वक अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचता है। इस प्रकार
जो स्वधर्म के अनुष्ठान में स्वर्ग के फलों की उपेक्षा करता है, उसका चित्त शुद्ध होकर वह स्वयं ब्रह्मसमाधान
प्राप्त करता है। उस स्वधर्म मार्ग को छोड़कर सकाम पुरुष सुनने में मधुर लगने वाले स्वर्गसुख के पीछे दौड़
पड़ते हैं। मृग घंटानाद के भुलावे में आ जाते हैं। उसी प्रकार कर्मभूमि में जन्म लेकर धन, धान्य आदि खर्च कर
स्वर्ग सुख के मोह में अनायास प्राप्त हुए नरदेह को व्यर्थ ही खो देते हैं। जिस प्रकार कोई वणिक, दूसरे द्वीप में
जाने से अधिक लाभ होगा यह सुनकर पुराना जहाज लेकर समुद्र में प्रवेश करता है और उन्मत्त खलासी के
कहने पर टूटी-फूटी नौका के साथ समुद्र में डूब जाता है, वैसी ही गति सकामों की होती है। बेचारे स्वर्ग की
इच्छा मन में दबाकर संसार सागर में डूब जाते हैं। स्वर्गसुख की इच्छा करने से स्वधर्मरूपी सारा धन डूब जाता
है, चित्तशुद्धि का मूल ही नष्ट होकर नरदेहरूपी मूलधन भी नष्ट हो जाता है। इतनी हानि का कारण भगवान यह
बताते हैं कि सकाम्यता के मूल त्रिगुण हैं जिनके विशेष लक्षण वे बताते हैं।

इक्कीसवाँ अध्याय ५५७
रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजस्तक्तमोजुषः ।
उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न तथैव माम् ॥ ३२ ॥
रज और तम जब बहुत अधिक बढ़ जाते हैं तो उसमें जब सत्त्व भी मिल जाता है तो रज की संगति से
काम चित्त को क्षुब्ध कर देता है। चित्त में जब काम अत्यधिक उफनता है तो गुण के अनुसार विषय पर प्रेम
होता है। तब वह निश्चित रूप से सकामी की ही संगत पकड़ता है। सकाम की संगति के कारण काम्यकर्म में
ही आदर बढ़ने लगता है और वह स्वर्गभोग में तत्पर होकर देव, पितर, भूत, प्रथमगण आदि का यजन करता है।
इस प्रकार वासनालुब्ध लोग मुझ सर्वात्मा, सर्वेश्वर के पास होते हुए भी मेरा अनादर कर अन्य देवताओं की ही
उपासना करते हैं। अब शायद तुम यह कहोगे कि अन्य देवताओं के होने पर भी तुम तो हो ही, तो उनके साथ
इस प्रकार का ऐक्यभाव नहीं रहता। सारा विनियोग भेद बुद्धि में ही होता है। अरे! इन्द्रादि देवों के द्वारा मैं ही
प्रसन्न होता हूँ, लेकिन उनका सकाम मन स्वर्ग की ही इच्छा करने के कारण वे मेरा भजन नहीं करते। मन में
वासना दृढ़ रहती है इसलिये स्वर्ग की पुनरावृत्ति के और भी फेरे हैं यह सुनकर उन्हें वह हित का ही लगता है।
उसके बारे में भी सुनो।
इष्ट्वेह देवता यज्ञैर्गत्वा रस्यामहे दिवि।
तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुलाः ॥ ३३ ॥
कर्मभूमि में जो मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं, वे सहज ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं। ऐसा होते हुए भी वे
कामना में फँस जाते हैं और स्वर्ग में दूसरे देवताओं का ही भजन करते हैं। स्वर्गभोग पर दृष्टि रख कर अनेक
यज्ञायाग करते हैं और उतने से स्वर्ग के सुखोपभोग की आशा करते हैं। कालान्तर में पुण्य का क्षय होते ही उनका
पतन होता है। वह भी उन्हें हितकर ही लगता है। पुण्यवान स्वर्गस्थ जीव होने के कारण हमने सुशील ब्राह्मण के
कुल में जन्म लिया, ऐसा वे कहते हैं। वेदवेदांग का अध्ययन कर धनधान्य से समृद्ध होकर हम विख्यात गृहस्थ
बन कर रहेंगे ऐसा उनका विश्वास रहता है। वेदार्थ का सच्चा अर्थ न जानने के कारण ये लोग काम्यकर्म को ही
इति कर्तव्यता समझते हैं और गन्ना छोड़ कर उसका बाल (भुट्टा) माँगते फिरते हैं।
एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।
मानिनां चातिस्तब्धानां मद्मार्ताऽपि न रोचते ॥ ३४ ॥
फल छोड़कर फूल खाना यही याज्ञिकों की स्थिति रहती है। वे स्वर्ग की इच्छा से जो उपाय करते हैं
वही उनका अहित करते हैं। सारा संसार ही जहाँ काल्पनिक है वहाँ स्वर्ग का सुख ही सत्य कैसे होगा ? किन्तु
केवल सुनी हुई बातों को ही सच मानकर मूर्ख लोग स्वर्ग के सुख से मोहित हो जाते हैं। नपुंसक स्त्री सुख की
कितनी ही इच्छा क्यों न करे लेकिन वह उसके साथ संग कैसे कर सकता है ? जब बीजोत्पत्ति ही नहीं है तो
काम का प्रयास किसलिये ? व्यर्थ ही उठता है, फिर सोता है लेकिन उसे सच्चा स्त्रीसुख नहीं मिल पाता। उसी
प्रकार स्वर्ग के सम्बन्ध में उनकी स्थिति होती है। गेहूँ की कोमल बाली स्वाद में भली लगती है लेकिन जिसे
फसल की कल्पना रहती है वह बाली को नहीं उखाड़ता। पत्तों का स्वाद लेने से उसे गेहूँ की मिठास नहीं
मिलती, ऐसा होते हुए यदि पत्ते ही उखाड़ लिये तो गेहूँ के नाम पर रोने की नौबत आयेगी। इस प्रकार वेद ने
स्वर्ग का फल बताया है, वही स्वधर्म का कोमल मूल है। उसे तुरन्त तोड़कर खाने से मनुष्य मोक्षफल से
वंचित हो जाता है। जो ज्ञानी इस बात को जानते हैं वे स्वर्ग का स्पर्श भी नहीं करते, लेकिन मूर्ख की

५५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विषयतृष्णा रुकती नहीं है। वे लोग काम की आसक्ति से सकाम कर्म ही करते रहते हैं इसलिये वे जन्म-मरण
के चक्र में फँसकर कल्पांत तक बाहर नहीं निकल पाते। साधु लोग उन्हें हित की बात बताते हैं लेकिन उसे वे
स्वीकार नहीं करते। हम ज्ञाता हैं, वेद का अर्थ हम ही जानते हैं, ऐसा ज्ञानाभिमान होने के कारण वे अभिमान
में फूले रहते हैं। मैं भगवान सृष्टि का नियंता हूँ ऐसा वेद ने स्पष्ट कहा है फिर भी यह बात वे नहीं मानते।
निष्काम कर्म की बात करने से उनका मस्तिष्क खराब हो जाता है क्योंकि उनकी सकाम बुद्धि अत्यन्त दृढ़ हो
जाती है। इस प्रकार वेद को प्रवृत्तिपरक मान कर सभी सकाम लोग भ्रम में फँस जाते हैं। इसलिये उस वेद का
ब्रह्मपरक अर्थ स्वयं श्रीकृष्ण समझा रहे हैं।
वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।
परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम चा प्रियम्॥ ३५॥
वेद स्वयं ही कर्मकाण्ड, उपासनाकांड और ज्ञानकांड के द्वारा चित्तशुद्धि के द्वार से जीव को ब्रह्मस्वरूप
करता है। मछुआरा जिस प्रकार बंसी में मांस का टुकड़ा लगाकर मछली को जल के बाहर निकालता है उसी
प्रकार वेद भी स्वर्गसुख का लालच देकर जीव को परमार्थ की ओर खींचता है। वेद ने परोक्ष में अर्थात् अस्पष्ट
कहकर त्यागमुख से अन्योक्ति गाकर विषय के प्रति आसक्ति छुड़ायी है। वेदार्थ का यह गुह्य ज्ञान समझ कर जब
जीव ब्रह्मस्वरूप होता है, तब कर्म और कर्त्ता मिथ्या हो जाते हैं। फिर आश्रम और वर्ण किसके? ध्येय, ध्याता
और ध्यान किसका? वह परिपूर्णता से परब्रह्मस्वरूप ही हो जाने के कारण भज्य, भजक और भजन ये तीनों भी
शेष नहीं रह जाते। फिर कर्मकर्माचरण किसका किया जाय? वेद किसका, वेदाध्ययन किसलिये और साधन
किसका? क्योंकि जब वह पूर्णता से परिपूर्ण ब्रह्म हो जाता है तो दोष और गुण, पाप और पुण्य, जन्म और मृत्यु
कैसे होगा? परिपूर्णत्त्व से सारा पूर्ण ब्रह्म ही भरा रहता है। वहाँ भेद किसका और ऐक्यभाव भी किसका? बंध
किसका और मोक्ष किसका? उद्धव! सदा सर्वकाल परमानन्द ही भरा रहता है। यही वेद का सच्चा अर्थ है।
किन्तु इस वेदार्थ का निरूपण मैं स्वयं ही प्रकट करूँ तो लोगों के हित पर पानी फिर जायेगा इसलिये मैंने उसे
गुप्त रखा है। यह वेदार्थ का सार है और मेरे गुप्त ज्ञान का भण्डार है। तुम अधिकारी हो यह ध्यान में आने से ही
मैंने तुम्हें यह बताया है। अगर यह गुह्यार्थ प्रकट कर दिया तो नष्ट और अनधिकारी लोग कर्ममार्ग का मार्ग
छोड़कर कर्म और ब्रह्म दोनों से ही वंचित हो जायेंगे। ज्ञानसम्पन्न ऋषियों ने इसी बात को ध्यान में रखकर वेदार्थ
बताने की शैली में मुख्य अर्थ को गुप्त रखकर परोक्षवाद अर्थात् प्रवृत्तिमार्ग का ही प्रतिपादन किया है। उद्धव!
सब लोगों के हित के लिये और उन्हें रास्ता दिखलाने के लिये यही उचित है ऐसा मुझे भी लगता है क्योंकि
सबको प्रवृत्ति मार्ग ही अच्छा लगता है। लोगों को सही मार्ग दिखलाने के लिये, मैं अकर्त्ता होते हुए भी कर्म
करता हूँ और लोक कल्याण के लिये वेद का जो प्रवृत्तिपरक विचार है उसका भी स्वयं पालन करता हूँ। उस
वेद का स्वरूप अत्यन्त गहन, अतर्क्य, अलक्ष्य और अगम्य है, यह तुम जान लो। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण
अगले श्लोक में कर रहे हैं।
शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।
अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६॥
मेरा वेदरूपी भाषण शब्दशः और अर्थशः अत्यन्त गहन है। इस सम्बन्ध में ब्रह्मदेवादिक देवता भी भ्रम में
पड़ जाते हैं। समुद्र जिस प्रकार स्वयं तैर कर पार नहीं किया जा सकता उसी प्रकार अपनी ही बुद्धि से वेद का

इक्कीसवाँ अध्याय [५५९]

अर्थ समझ में नहीं आता। इसीलिये अनेक ऋषियों ने अनेक युक्तियाँ लड़ायी हैं। लेकिन उससे वेद का
वास्तविक अर्थ किसी के हाथ नहीं लगता क्योंकि वह शब्दशः और अर्थशः भी दुर्बोध है। उसके शब्दों का
उच्चारण ही स्वरवर्ण की दृष्टि से किसी की समझ में ठीक से नहीं आ पाता, उसके अर्थ की बात क्या करें ? वह
मनुष्यों को ही नहीं, देवताओं के लिये भी अगम्य है। पहले जब इस वेद को किसी ने नहीं देखा था तब इसे
पहले ब्रह्मदेव से कंठस्थ करवाया। लेकिन उनकी समझ में भी ठीक से न आने के कारण वह कर्म से कर्मठ ही
बन गया। वह अत्यन्त सुन्दर कर्मक्रिया शंखासुर ने तत्काल चुरा ली, जिससे ब्रह्मदेव वेद की बात ही भूल गया
और सृष्टि की उत्पत्ति का कार्य रुक गया। उस वेद का उद्धार करने के लिये मैंने शंखासुर का वध किया और
वेद का पूरा भण्डार ब्रह्मदेव को सौंप दिया। लेकिन ब्रह्मदेव को उनका स्मरण नहीं हो पा रहा था। वह बेचारा
पागल-सा हो गया। उस वेद विभाग के लिये ऋषियों ने अपने ज्ञान का उपयोग किया, उसकी शाखा उपशाखाओं
का पदच्छेद करने के लिये रावण आगे आया। फिर भी उद्धव ! मेरे वेद की सम्पूर्ण वार्ता तत्त्वतः किसी के भी
हाथ नहीं लगी। वही वेदसंस्थापक श्रीहरि, मैंने लोगों को मर्यादा में रखने के लिये स्वयं श्रीव्यास का अवतार
लेकर सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। वेद विभाग करने में वह राजहंस था इसीलिये उसे वेदव्यास कहते हैं।
उसने वेदार्थ प्रकट कर उसके चार भाग किये। वेद अर्थ की दृष्टि से गूढ़ है किन्तु शब्द की दृष्टि से सरल है। वे
शब्द अर्थात् वाणी के चार प्रकार हैं। उन्हें मैं स्पष्ट करके बताता हूँ। नाद का प्रथम स्फुरण जिसका सूक्ष्म प्राण
घोष करवाता है, उसका नाम है 'परावाणी', वही ओंकार का प्रथम लक्षण है। वही नादयुक्त प्राण जब
अंतःकारण में स्फुरण पाता है तो उसे 'पश्यंती वाणी' कहते हैं। उसमें विवेक लक्षण होता है और नाभि से
नाभिस्वर से कंठ तक घूमने वाली वाणी को 'मध्यमा' कहते हैं। इसके उपरान्त अकार, उकार और मकार का
स्वर वर्णयुक्त उच्चार जिससे 'ओंकार' प्रकट होता है, उसे 'वैखरी वाणी' कहते हैं। उस वैखरी वाणी में
शाखोपशाखाओं में जो अनंत रूप से वेद भरा हुआ है, उसकी भी मर्यादा नहीं है। इस प्रकार वेद असीम है।
उसके चार विभाग करने पर भी वह लोगों के लिये दुरूह ही रहा इसलिये 'उपवेद' के रूप में उसके और
विभाग किये। फिर भी उनकी समझ में वेद नहीं आया। इसलिये श्री व्यास ने वेद के पदों को विशद किया और
उनका अर्थ स्पष्ट किया। फिर भी वेद का वास्तविक अर्थ समझ में नहीं ही आता। उसका अर्थ लगाने के लिये
सुमंत, जैमिनी, भाष्य भारत, वैलसूत्र आदि महान ऋषि भी थक गये, फिर भी वेद का अर्थ उनकी समझ में नहीं
आया। सारांश, वेद का स्थूल और सूक्ष्म वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ जानने वाला मेरे सिवा और कोई नहीं है।
मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।
भूतेषु घोषरूपेण विसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७॥
मैं जो स्वयं सबके अंतःकरण में 'भूमा' अर्थात् अपरिच्छिन्न रूप से अंतर्बाह्य व्याप्त, परिपूर्ण परब्रह्म मुझसे
ही वेद अधिष्ठित है, इसी को 'उपबृंहित' कहते हैं। किन्तु अधिष्ठाता बादल में छिपे चन्द्रमा की तरह विकृत
हुआ सा दिखाई देता है अथवा अग्नि जब काष्ठ में अधिष्ठित होता है तो उसे तत्काल आकार प्राप्त होता है,
तब उस अग्नि को भी प्रबलता और शांतता ये दो विकारावस्थाएँ प्राप्त होती हैं। उसी प्रकार मैं अंतर्यामी नारायण
विकारी नहीं होता। मैं ब्रह्मस्वरूप से परिपूर्ण तथा स्वयं विकारों का निर्दलन करने वाला हूँ। विकारों का कर्त्ता
भी मैं और कर के अकर्त्ता भी मैं, मैं स्वयंभू ब्रह्मस्वरूप होने के कारण मुझे विकार होता ही नहीं है। ब्रह्म तो
निर्धर्म है। वह विकार का कर्म कैसे करेगा ? यदि तुम्हारे मन में इस प्रकार की कोई शंका है तो उसका उत्तर भी

५६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्पष्ट कर देता हूँ। मेरी अनंत शक्ति रूप जो योगमाया है, वह शंकर और ब्रह्मदेव को भी समझ में नहीं आती।
उसी योग से मैं चिन्मूर्ति होते हुए भी उत्पत्ति, स्थिति और संहारकर्ता बनता हूँ। ऐसा योगमाया का स्वभाव है।
सब कुछ करने पर भी मैं अकर्ता हूँ। इसलिये मुझे देश और काल का विकार स्पर्श नहीं करता। भेदभाव की
बात सच होती तो मुझे विकारबाधा हुई होती; परन्तु मेरा निजस्वरूप देखने पर उसमें भेद की बात ही नहीं
दिखायी देती। भ्रम से जिस प्रकार रस्सी के सर्प का भास होता है, उसी प्रकार मैं परमात्मा श्रीहरि सब कुछ
करके भी निजरूप से अधिकारी ही रहता हूँ। घोषरूप में रहने वाला वह अत्यंत सूक्ष्म नाद, मैं स्वयं प्रणवरूप
वेद प्राणिमात्र में स्वतः सिद्ध हूँ, लेकिन लोग सकामबुद्धि से वह नहीं जानते। सुअर जिस प्रकार कस्तूरी या
कपूर छोड़कर विष्ठा ही खाता है, उसी प्रकार सूक्ष्मवेद के अंतरंग की सकाम पुरुष उपेक्षा करते हैं। मैं निजानंद
स्वरूप प्रत्येक प्राणी के हृदय में उपस्थित होते हुए भी, भ्रांतिमान लोग कामासक्ति के कारण नीचों की ड्योढ़ी
के चक्कर लगाते हैं। लेकिन योगी लोग उस हृदयस्थ देवता का ध्यान लगाकर बैठते हैं उसका उन्हें ध्यास लगा
रहता है, प्राणापान को सम कर वे निरन्तर नाद का अनुसंधान रखते हैं। मेरा वेदरहस्य जो गुप्त है वह प्रणवरूप
से हृदय के अन्दर ही है, योगी सर्वकाल उसका अनुभव लेते हैं। उसका निश्चित स्वरूप बताता हूँ, सुनो। कमल
के डंठल के नाजुक तंतु की तरह यह अत्यन्त सूक्ष्म नाद नाभि से ब्रह्मरन्ध्र तक जाता है और ओंकारस्वरूप में
लक्षित होता है। इस प्रकार का, नाभि से ब्रह्मरंध्र तक ओंकार रूप से चलने वाले सूक्ष्म नादरूपी स्वर को
महायोगी योगधारणा से अनुसंधान में रखते हैं। यही नाद दोनों हाथ कान पर रखने पर घूमता हुआ सा मालूम
होता है। योगी लोग उसे 'अनाहतशब्द' कहते हैं। वेदांती लोग इसी को 'सूक्ष्मनाद' कहते हैं और हम इसे
'शुद्धवेद' कहते हैं। लेकिन यह नाम के अनुवाद की बात रहने दीजिये। ऐसे स्वयंसिद्ध वेद पर मनुष्य की श्रद्धा
नहीं जमती इसलिये उस सूक्ष्मवेद को ही मैं लोककल्याण के लिये स्थूलरूप में लाया। स्थूलरूप में प्रकट हुआ
यह वेद ही वेद का प्रसिद्ध मार्ग बन गया। इसे दृष्टांत से स्पष्ट करके बताता हूँ। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा जिससे
उद्धव की आत्मा को अत्यन्त संतोष हुआ। वह कहने लगा, श्रीकृष्ण मेरे लिये अत्यन्त सरस निरूपण कर रहे
हैं। मुझसे प्रेम होने के कारण ही, केवल मेरा उद्धार करने के लिये श्रीकृष्ण निरूपण की बरसात कर उसमें
अमृत से भी मधुर रस भर रहे हैं। उद्धव का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण क्या बोले ? उन्होंने कहा, उद्धव ! उसी
वेद को मैं अब निरूपण में सुना देता हूँ।
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्।
आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा ॥ ३८ ॥
छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः।
ऊर्णनाभि अर्थात् मकड़ी जिस तरह अपने मुँह से अत्यंत महीन तंतु निकालती है, उसी प्रकार निर्गुण में से
ओंकार का धागा निकलता है। वह ओंकार अपने स्वभाव के अनुसार 'सप्राण' अर्थात् सचेतन होते ही
'हिरण्यगर्भ' संज्ञक होता है ऐसा वेद में बताया गया है। उद्धव! वही 'प्रभु' ऐश्वर्ययुक्त स्वामी है। उसकी शक्ति
अचिंत्य, अनंत है और वही छंदोमय वेदमूर्ति है, यह जान लो। वास्तव में वह अविनाशी है तथा नित्य सुखमय
एवं सुखमूर्ति है। उससे सप्राण नादाभिव्यक्ति है जो मनःशक्ति को जागृत करती है। यही जागृत मनःशक्ति स्पर्श-
स्वर-वर्ण का निर्माण करती है। इसी को वेदवेत्ता पुरुष 'बृहती' कहते हैं क्योंकि इसका विस्तार असीम है। स्वर
और वर्णों से युक्त वे मंत्र, हृदयाकाश में विचित्र ढंग से, हजारों शाखाओं में विस्तार पाते हैं। इस प्रकार वैखरी

इक्कीसवाँ अध्याय ५६१
वाणी का अपार विस्तार हुआ है। स्वर और वर्ण आदि के उच्चार से वेदों की अधिष्ठान वैखरी वाणी कैसे उत्पन्न
हुई, वह भी बताता हूँ, सुनो।
ओङ्काराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम्॥ ३९ ॥
विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः।
अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४० ॥
अ-उ-म ये तीन मात्राएँ जब एकत्र होती हैं तो लोग उसे 'ओंकार' कहते हैं। यह ओंकार अलौकिक है
तथा अत्यन्त सूक्ष्म रूप से देह में ही रहता है। उसी ओंकार को प्राण की संगति से जब मूलाधारादि चक्र में
उर्ध्वगति प्रारम्भ होती है तब परा, पश्यंति, मध्यमा वाणी की अभिव्यक्ति होती है। परा वाणी के भीतर 'पश्यंति'
श्रेष्ठ रूप में जन्म लेती है। उसके गर्भ से 'मध्यमा' का जन्म होता है। इस प्रकार ये दोनों एक दूसरी से उत्पन्न
होती हैं। उसी प्रकार वे क्षणभर के लिये भी एक-दूसरे को छोड़कर नहीं रहतीं। एक-दूसरे को साथ लेकर वे
पहले एक चक्र, फिर दूसरा चक्र और तीसरा चक्र पार करते हुए ऊपर चढ़ती जाती हैं। 'मूलाधार' चक्र में 'परा'
वाचा उत्पन्न होती है। 'स्वाधिष्ठान' चक्र में, पश्यंती का जन्म होता है और 'मणिपुर' चक्र से 'विशुद्धि' चक्र तक
'मध्यमा' का आवागमन चलता रहता है। वहाँ से मुख के द्वारा 'वैखरी' वाणी प्रकट होती है। तब वह स्वर वर्ण
के उच्चार से अनेक मंत्ररूपों में गरजती रहती है। उन्हीं स्वरों में 'स्पर्श' वर्ण, 'असंख्य वर्ण' तथा 'ऊष्म' वर्ण के
विभाग सुनो। केवल अ से अः ये स्वर, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग इस प्रकार पाँच वर्णों के पाँच पंचक अर्थात्
पचीस अक्षरों को स्पर्शवर्ण कहते हैं। जिनकी सहायता से ही वर्णों का ठीक तरह उच्चार हो पाता है वे
अकारादिक सोलह 'स्वर' हैं। य, र, ल, व को 'अंतस्थ' वर्ण कहते हैं और श, ष, स, ह इन चार वर्णों को
शास्त्रकार 'ऊष्म' स्वर कहते हैं। अ-अः ये अनुस्वार तथा विसर्ग विभाग हैं। इसमें क्षकार वह केवल बावनवी
मातृका है। इनमें और अतिरिक्त निरनुनासिक तथा सानुनासिक ये भेद शास्त्रज्ञ जानते ही हैं। इस प्रकार स्वर और
वर्ण इनके यथाशास्त्र उच्चार से तथा वेदशास्त्रों के अर्थ प्रकार से लौकिक और वैदिक भाषा का विस्तार हुआ है।
शब्दों की अनेक प्रकार की उत्पत्ति का प्रयोग कर शब्दों से ही शब्द का खण्डन करते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार
के शब्द कौशल्य से यह वैखरी वाणी विस्तार पायी है। वही चार-चार अक्षरों से बढ़कर उसी के अनेक छंद हो
गये हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे चार अक्षरों के बढ़ने से नये-नये अनेक छंद साध कर वेद ने अपने ज्ञान का बोध
प्रकट किया है। इसीलिये वह वैखरी वाणी अनंत और अपार है। शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टि से वह अत्यन्त
कठिन है। मेरे शब्द ज्ञान की थाह सुरनरों को भी नहीं लग पाती। वैखरी की शक्ति अनंत है इसीलिये उसे 'बृहती'
कहते हैं। इसके विस्तार की मर्यादा शंकर और ब्रह्मदेव भी नहीं जानते। स्वयं हिरण्यगर्भ के रूप में जीव, शिव
और अंतर्यामी इन्हें मेरी वेदाज्ञा प्रकट करती है। उसी का नामकरण है 'वैखरी'। मैं वेदात्मा श्रीहरि इस प्रकार वेद
का विस्तार करता हूँ। स्वयं ही उसका विस्तार कर उसकी मर्यादा समाप्त होने के समय उसका संहार भी मैं ही
करता हूँ। पहले जो छंद बता दिये थे उनके निजलक्षण, वेद का कारण अर्थात् परमात्मा श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।
त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद्विराट् ॥ ४१ ॥
'गायत्री छंद' सभी छंदों का प्रमुख अधिष्ठान है। उस गायत्री छंद का लक्षण तुम्हें सविस्तार बताता हूँ।
आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण और गिनते समय जिसमें शुद्ध यति (विराम) आराम आता है, उसे गायत्री छंद

५६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कहते हैं। वेदोक्ति का यही मुख्य बीज है। वेद का रहस्य, ब्रह्मज्ञान का दूसरा छोर और परमानंद का शुद्ध
सारतत्त्व, वही गायत्री है। यह चैतन्य का जीवन तथा मेरे गुप्त का गुप्त धन है। जिसमें जीव-शिव का समाधान
होता है, वही यह गायत्री छंद है। इस छंद का एक-एक अक्षर परब्रह्म का सार है और गायत्री सचमुच ही
सच्चिदानन्द का भंडार है। गायत्री का अनुष्ठान कर विश्वामित्र क्षत्रिय से राजा बना। मैं कृष्ण भी उसका वंदन
करता हूँ। रामावतार में वह मेरा भी गुरु था। इसलिये सारे छंदों में मुख्यतः गायत्री छंद ही श्रेष्ठ है। इसके पीछे
लग कर ही अन्य छन्द पावन होते हैं। गायत्री छंद के अक्षरों में चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'उष्णिक'
छंद उत्पन्न होता है। उष्णिक छंद में और चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'अनुष्टुप' छंद उत्पन्न होता है।
उसमें और चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'बृहती' छंद होता है। इसी प्रकार 'पंक्ति-त्रिष्टुप-गजती-
अत्यष्टि-अतिजगती' आदि छंद, चार-चार अक्षर अधिक जोड़ने से वेदवाणी विभाग के छंद बन जाते हैं। ऐसे
चार-चार अक्षर अधिक लगाकर अनेक छंदों की पंक्ति तैयार होती है और वेदराज की राजधानी उस मंत्रध्वनि से
गरजती रहती है। उनके अक्षरों की गिनती नहीं हो पाती, शाखाओं का पता नहीं चल पाता, अर्थज्ञान और
शब्दज्ञान भी समझ में नहीं आता। इस प्रकार वेद का वैभव दुर्गम है।
किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।
इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद वेद कश्चन्॥ ४२ ॥
कर्मकाण्ड के विधिनिषेध बताते समय वेद किस अर्थ से त्याग की निंदा करता है और साधक के हित में
किस अर्थ का प्रतिपादन करता है; मंत्रकाण्ड ने सभी मंत्र मूर्ति का उल्लेख कर आयुधों के प्रकार, उपासना
तथा उपास्य आदि भाग बताकर भक्ति किस लिये करवायी है? ज्ञानकाण्ड में सचमुच किस पदार्थ का निषेध
किया है? और किस अर्थ का प्रतिपादन कर आत्मज्ञान का उपदेश किया है? इस प्रकार वेद का अटल मूल
क्या है? अथवा विधिविधान के साथ मुख्य फल कौन-सा है? यह जानने लायक ज्ञान मनुष्य की बात दूर,
लेकिन देवताओं को भी नहीं है। सचमुच, उस वेदार्थ को ठीक तरह से जानने वाला मैं ही एक सर्वज्ञ हूँ। मेरी
कृपा के बिना यह अर्थ ब्रह्मदेव आदि के हाथ भी नहीं लगेगा। यह सुनकर उद्धव ने सोचा, वेद का सच्चा
अर्थसार केवल भगवान को ही मालूम है और श्रीकृष्ण भक्त के प्रति कृपालु हैं अर्थात् वे शायद मुझ पर भी
दया कर मुझे वह अर्थ बता दें। उद्धव के मन का उद्देश्य जानकर भगवान आगे खिसके और वेदार्थ का सारांश
श्लोक रूप में सुनाने लगे।
मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्।
एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्।
मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति॥ ४३॥
मेरे स्वरूप की प्राप्ति होने के लिये, मलिनचित्त लोगों की चित्तशुद्धि के लिये वेद ने स्वधर्म का प्रतिपादन
किया है और निषेध बताकर विषयों का त्याग करवाया है। उसमें अग्निहोत्र आदि का विधान और यज्ञ का
कर्माचरण चित्तशुद्धि के लिये अन्यन्त कारणीभूत है। उसके योग से प्रखर वैराग्य उत्पन्न होता है। वैराग्य उत्पन्न
हो जाय और यहाँ की विषय निवृत्ति हो जाय तो साधक को सहजास्थिति से मेरी प्राप्ति होती है। अब जो विषयों
की बाधकता समझते हैं किन्तु उनमें उनका त्याग करने का सामर्थ्य नहीं होता, ऐसे साधकों के लिये वेद ने मेरी
भक्ति प्रकट की है। इसमें मंत्र-मूर्ति की उपासना, मेरे सगुण रूप का अनुष्ठान और एकनिष्ठा से भजन करने से

इक्कीसवाँ अध्याय ५६३

रजोगुण और तमोगुण का नाश होता है। फिर शुद्ध सत्त्ववृत्ति ही शेष रहती है। इससे श्रवण कीर्तन में प्रेम उपजता
है और समस्त प्राणियों के प्रति मेरी ही भावना उत्पन्न होकर उससे मेरी चौथी भक्ति का लाभ होता है। मेरी चौथी
भक्ति प्राप्त होने पर मेरे भक्तों को मुक्ति भी अच्छी नहीं लगती। अद्वैत भजन के आगे वे मोक्ष का भी धिःकार
करते हैं। अद्वैत बोध से मेरा भजन करने पर अनंत, अपार और चिद्घन स्वरूप भक्तों के मैं वश में हो जाता हूँ और
मेरे भक्तों को मद्रूप प्राप्त होता है। उस समय भज्य, भजक और भजन; पूज्य, पूजक और पूजन; साध्य, साधक
और साधन यह सब वह स्वयं ही हो जाता है। मेरा ऐश्वर्य, सामर्थ्य और शक्ति मेरे भक्तों के हाथ में आती है।
अद्वैतभजन के प्रेम से ही मेरे भक्तों को मेरे पद की प्राप्ति होती है। मैं देवता और वह भक्त यह बाह्य अंतर केवल
नाम का ही रह जाता है। आंतरिक दृष्टि से देखा जाय तो दोनों निजात्मज्ञान के कारण सच्चिदानंद स्वरूप ही रहते
हैं। उद्धव ! उपासनाकांड यही है। इस प्रकार साधक मेरी भक्ति करके निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करते हैं।
माया प्रतिबिम्बित चैतन्य जिसका उल्लेख 'त्वं' इस पदार्थ से करते हैं, उसे अविद्या के कारण 'जीव' की संज्ञा
प्राप्त होती है। स्वप्न में हम जिस प्रकार अपने अनेक रूप देखते हैं उसी प्रकार अविद्या के कारण आया हुआ
यह जीवत्व एकदेशी है। जो मायाजन्य चैतन्य, जो योगजन्य होकर जगत की उत्पत्ति का कारण, जो सर्वद्रष्टा,
सर्वज्ञ, सदा सर्वकाल ऐश्वर्य सम्पन्न, जो सभी कर्मों का कर्त्ता, किन्तु कर्ता होते हुए भी अकर्ता; और जिसमें
स्वाभाविक रूप से स्वयंभू नित्यमुक्तता होती है; जिसकी नैसर्गिक अकुंठित सत्ता, तो सदा परमानंद से पूर्ण रहती
है, जो ईश्वर होने के कारण सर्वसमर्थ है; वह (शिव) 'तत्' पदार्थ का वाच्यार्थ है। उस जीव का अज्ञान छोड़
तथा शिव की सर्वज्ञता भी छोड़कर दोनों के बीच का सार (लक्ष्यार्थ तत्त्व) उसी से ऐक्य पाकर अपना हेतु सिद्ध
करते हैं। विवाह के समय उम्र में कम पति अगर परदेश चला जाय और वही कुछ समय बाद अकस्मात परदेश
में यौवन सम्पन्न दिखायी दिया तो उस समय की बाल्यदशा छोड़कर और आज की यौवनावस्था छोड़कर उसकी
पत्नी उसके मूल स्वरूप को लक्ष्य कर जैसा व्यवहार करती है, उसी प्रकार हे उद्धव 'त्वंपद' और 'तत्पद' इन
दोनों का वाक्-अर्थ छोड़ देना चाहिये और ऐक्यभाव से जो दिखायी दे, उसका लक्ष्यार्थ स्वीकार करें यह
ज्ञानकाण्ड का इत्यर्थ है। जीव और शिव का ऐक्य साध कर मेरे चिद्स्वरूप में समाधान प्राप्त करें। यह बात वेद
ने सम्पूर्ण ज्ञानकाण्ड में कही है। वेद के तीनों काण्ड आदि-मध्य-अंत मुझे ही लक्षित हैं। यही अर्थ ग्रन्थ के अंत
में उपसंहार करते हुए श्रीकृष्ण बता रहे हैं। उद्धव ! वेद का भाषण अर्थ की गम्भीरता के कारण अत्यन्त गहन है।
उसके सम्बन्ध में अनेक ऋषियों ने काफी परिश्रम किया फिर सच्चा अर्थ उनकी समझ में नहीं आया। वही
वेदार्थ का सार मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बताया। भगवान का भाषण सुनकर उद्धव को आश्चर्य लगा और उसने
मन ही मन कहा कि वेद का यह सार भगवान और क्यों नहीं बताते ? बछड़े के मुँह लगाने से गाय के थन से
दूध आते ही, दूध निकालने वाला बछड़े को दूध पीने से रोक देता है, उसी प्रकार यह अत्यन्त प्रिय विषय
भगवान ने बीच ही में क्यों बन्द कर दिया ? उद्धव मन ही मन छटपटाने लगा। चिड़िया के बच्चे चारा लेने के
लिये जिस प्रकार चोंच फैलाकर माँ के सामने बैठ जाते हैं, उसी प्रकार उद्धव श्रीकृष्ण के सामने मुँह खोलकर
बैठ गया। उद्धव का उद्देश्य ध्यान में आकर भगवान श्रीकृष्ण वेद का अर्थ संक्षेप में ग्रन्थ के अन्त में सारांश रूप
में बता रहे हैं। अनेक शाखाओं में प्रसिद्ध त्रिकांडात्मक बढ़ा हुआ वेद, उसका बोध यही है कि मुझ अभेद
परमात्मा का हाथ पकड़ कर श्रुति तीन कांडों में चल रही है। कर्म का आदि, मध्य और अन्त मैं ही हूँ; कर्मकर्त्ता
और क्रियाशक्ति मैं ही हूँ; कर्म का फल देने वाला श्रीपति मैं ही हूँ, यही कर्मकाण्ड का इत्यर्थ है। मंत्रमूर्ति और मंत्रार्थ
भी सचमुच मैं हूँ, पूज्य, पूज्यक और पूज्य यह सब मैं ही हूँ मेरे सिवा अन्य कुछ भी नहीं। देवता ही देवता की पूजा

५६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करें; देवता बनकर ही देवता को भजें, यही वेद का मेरा रहस्य और यही आगमों ने भी बताया है। मैं ही देवता हूँ
और भक्त भी मैं हूँ, पूजा का सारा साहित्य भी मैं ही हूँ, मेरी पूजा मैं ही करता हूँ। यही सम्पूर्ण उपासना है। वेद
के उपासना काण्ड का मुख्य सार यही है। आगमशास्त्र का गुप्त भण्डार यही है, मेरे भक्तों का निवासस्थान यही
वह उपासना है। 'ज्ञानकांड' तो अत्यन्त विचित्र है। उसमें वेद स्वयं ही अपना द्योतक बन जाता है। सारा संसार
ही यदि काल्पनिक है तो वेद को 'नियामक' किस अर्थ में मानें? उजाड़ घर में यदि कोई, निर्जीव मेहमान आ
जाय तो उसका आदरातिथ्य कौन करेगा? यही बात वेदाज्ञा की है। कठपुतली वाली गुड़िया के केश यदि मूँड़
दिये जायें तो उसके सिर पर पुन: केश नहीं आयेंगे। उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में भी वेद को कोई स्थान नहीं है।
मूल संसार ही जब मायिक है तो उसका वेद भी मद्रूप होगा। मृगजल में उदक तो रहता ही नहीं है, लेकिन उसमें
गीलापन भी नहीं होता। जहाँ सारा कुछ अद्वैत ही है, वहाँ श्रोता और वक्ता कैसा? वहाँ वेदवार्त्ता कैसी? जहाँ
दृश्य, द्रष्टा और दर्शन नहीं है, जहाँ ध्येय, ध्याता और ध्यान नहीं है; ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान नहीं है वहाँ वेदवचन
भी किसका होगा? जहाँ भ्रम का साम्राज्य और भेदभाव की बात रहती है, वहीं वेद की बुद्धि और उपनिषदों का
सुमधुर संगीत चलता है। भेद जब तक प्रबल है, तभी तक वेद का महात्म्य है; भेद जब अद्वैत में प्रवेश करता है
तो वेद भी 'नेति नेति' कहता हुआ विलीन हो जाता है। पानी की धारा जिस प्रकार पानी में ही विलीन हो जाती
है, उसी प्रकार वेद भी अद्वैत में विलीन हो जाता है। यही वास्तविक 'ज्ञानकांड' है। वह मैंने तुम्हें प्रेम से
बताया। जिस अरणीकाष्ठ से अग्नि उत्पन्न होता है उसी अरणी को जलाकर वह शांत होता है। उसी प्रकार
ज्ञानकांड निरूपण में वेद ने स्वयं को ही समाप्त कर दिया है। 'अद्वैतरूप ब्रह्म एक है' इस श्रुतिवाक्य से ही द्वैत
मिथ्या हो जाता है। इतना कहकर वेद अदृश्य हो जाता है और ब्रह्म अपनी सम्पूर्णता में सदा जैसा है वैसा ही
रहता है। निर्विकार शुद्ध ब्रह्म में 'मैं ब्रह्म' यह जो स्फूर्ति उत्पन्न होती है, वही ओंकार की उत्पत्ति होती है। उसे
'एकाक्षर ब्रह्म' कहते हैं। उसी ओंकार से स्वरवर्ण की उत्पत्ति हुई और श्रुति की बड़ी-बड़ी शाखाएँ उत्पन्न हो
गयीं। वह सारा ब्रह्मरूप ही है। इस प्रकार सारे वेद परब्रह्मरूप हैं। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार वास्तविक रूप
में सुवर्ण ही रहते हैं, उसी प्रकार श्रुति शाखाओं से होने वाला वेद का विस्तार भी ओंकार स्वरूप में मद्रूप ही है।
वेदों द्वारा प्रतिपादित पुरुषोत्तम, जो भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाला कल्पतरु ही है ऐसा मेघश्याम,
आत्माराम, श्रीकृष्ण ने कहा। तीनों कांडों का संबंध कहीं भी विरोध न होने वाला ही है। यही अत्यन्त शुद्ध वेद
का अर्थ है। उसे मैंने विस्तारपूर्वक बताया। हे उद्धव ! इससे अलग, वेद का कोई अर्थ नहीं है। वेद के इस अर्थ
की पहचान हृदय में अंकित करने से जीव-शिव का समाधान होता है। श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर उद्धव वेद
के अर्थ में निमग्न हो गया। उसकी दोनों आँखें भर आयीं और मन आत्मानंद में डूब गया। चित्त चैतन्य में
विलीन हो गया, हृदय द्रवित होने के कारण गला भर आया, स्वानंद का स्वाद मिलते ही देह रोमांचित हो उठा।
शरीर से पसीना छूटने लगा और देह काँपने लगा। आँखों में आनंदाश्रु भर आये और वाचा मौन हो गयी। मूर्छा
आने लगी लेकिन उसने अपने को सँभाल लिया। उसे स्मरण हो गया कि मन की यह लापरवाही ठीक नहीं है।
कहीं ऐसा न हो कि भगवान निजधाम चले जाएँ। इस भय से उसने आँखें खोलीं। उसने देखा, सामने मेघ की
तरह श्यामसुन्दर, मुकुट, कुण्डल और मेखला धारण किये हुए, पीताम्बर परिधान किये तथा गले में वनमाला
धारण किये श्रीकृष्ण खड़े हैं। वह हृदय में चैतन्यघन का अनुभव कर रहा था। आँखें खोलते ही आनंदघन की
मूर्ति उसी प्रकार सामने दिखायी देने लगी। वह कहने लगा कि श्रीकृष्ण चैतन्यघन है तथा चैतन्य की साकार मूर्ति
है। सगुण और निर्गुण रूप में श्रीकृष्ण परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। उद्धव कितना भाग्यशाली है। क्योंकि सगुण और

इक्कीसवाँ अध्याय ५६५
निर्गुण इन दोनों स्वरूपों के वास्तविक सुख का वह अकेला अनुभव कर रहा था। यह केवल श्रीकृष्ण कृपा का
माहात्म्य है। जब सद्गुरु की पूर्ण कृपा होती है, तब शिष्य की पसन्द ही उसका माप रहता है। वह यदि सगुण
मूर्ति चाहता है तो गुरु वैसी ही मूर्ति देते हैं। मन में निर्गुण मूर्ति की इच्छा हो तो गुरु की कृपा उसे निर्गुण स्वरूप
की स्थिति में साक्षात्कार कराती है अथवा जिसे सगुण और निर्गुण इन दोनों स्वरूपों का उपभोग करने की इच्छा
हो तो उसकी दोनों इच्छायें पूरी करने का सामर्थ्य कृपालु गुरु में रहता है। सद्गुरु की महिमा अगाध है। वेद भी
उसका बखान नहीं कर सकते। उनकी परिपूर्ण कृपा होने के बाद कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है ? श्रीकृष्ण
की कृपा से उद्धव की वह दुर्लभता समाप्त हो गयी और सगुण और निर्गुण दोनों श्रीकृष्ण ही हैं, यह बात हृदय
में अंकित हो गयी। श्रीकृष्ण की इस परिपूर्णता को जानकर, उसके चरण कमलों को लक्ष्य कर उद्धव ने उन्हें
साष्टांग दण्डवत किया। तब साँवले कृष्ण ने अपनी चारों बाहें फैला कर उसे आलिंगन में आबद्ध कर लिया।
उस आलिंगन का सुख अनुभवी ही जान सकता है। उस समय उद्धव को जो आनन्द हुआ उसका द्रष्टा एक
श्रीकृष्ण ही था। कृष्ण ने कहा, उद्धव ! मैंने वेदरहस्य का गुप्त खजाना, यह इक्कीसवाँ अध्याय तुम्हें बताया।
इससे लिंगदेह का भाव टूटता है, जीव को जीवत्व का स्मरण नहीं होता वही इक्कीसवाँ अध्याय तुम्हें बताया
जिससे देहभावना मिथ्या होकर नामरूप का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। वेदार्थ सार का यह निरूपण मेरे
विश्वात्मा का गुप्त निधान है। उद्धव ! मैंने अपना समझ कर ही तुम्हें मेरे जीव की पहचान करायी। उद्धव !
सहस्रों साधन करने पर भी, गुरुकृपा के बिना यह किसी के हाथ नहीं लगेगा। उस गुरुकृपा को साध्य करने के
लिये ही हमें पूर्ण स्वधर्म के अनुसार आचरण करना चाहिये, शास्त्र श्रवण तथा वेदपठन भी उसी के लिये करना
चाहिये और संतों का चरण स्पर्श करना चाहिये ताकि स्वामी जनार्दन प्रसन्न हो जाएँ। श्रीगुरु प्रसन्न होकर स्वयं
ही भागवत का निरूपण करा रहे हैं इसलिये एकनाथ जनार्दन से विनती कर रहा है कि उनकी नित्य नूतन कृपा
बनी रहे। अगले अध्याय में उद्धव प्रकृति-पुरुष का लक्षण तथा तत्त्वों की संख्या के सम्बन्ध में मधुर प्रश्न
पूछेगा। उसका उत्तर देते समय जन्म-मरण के प्रकार के सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण बतायेंगे। उस कथा में गहन
परमार्थ दिखायी देगा। उस कथा का श्रवण करते समय वैराग्य प्रखर हो उठेगा, ऐसे विस्तार से श्रीकृष्ण स्वयं
निरूपण करेंगे। घटाकाश महाकाश में मिल जाता है, उसी प्रकार एकनाथ जनार्दन की शरण में आया है। उसके
चरणों का वंदन करते समय अपने आप ही रसाल निरूपण की स्फूर्ति होती है। ॐ तत्सत्।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे भगवदुद्धव संवादे एकादश स्कंधे एकाकार टीकायां
वेदत्रय विभाग निरूपण नाम का एकविंशतितमोध्यायः ॥२१॥

बाईसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप, कठपुतली का खेल करने वाले सद्गुरु ! तुम्हें नमस्कार है। चौरासी लाख पुतलियों को
तुम पूर्वसंचित के अनुसार अपनी इच्छानुसार नचाते हो। हाथ की डोर तो नहीं देखने देते हो लेकिन पुतलियों को
तो स्वयं ही नचाते हो। फिर भी तुम सर्वदा उनसे अलिप्त रहते हो। तुम्हारा यह कौशल कितना अपूर्व है।
जिसका जैसा पूर्वकर्म रहता है उसके अनुसार वह नाचता रहता है। उसे नचाने की चेतनाशक्ति तुम्हारा हाथ न
रहते हुए भी तुम्हारे हाथ में रहती है। भारी लौहखण्ड को जिस प्रकार चुम्बक अपनी शक्ति से वश में करता है,
उसी प्रकार अपने सामर्थ्य से तुम भी समस्त प्राणिमात्र को नचाते हो। इस प्रकार ये जीव परतंत्र के अनुसार
नाचते रहते हैं, लेकिन उनका अहंकार कितना प्रबल होता है। देह का आकार सत्य है यह मानकर वे स्वयं को
स्वतंत्र ही कहते हैं। हम अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न तथा कर्म करने में अत्यन्त कुशल हैं और बाकी सब मूर्ख हैं इस
अभिमान को बढ़ाते हैं। इस प्रकार देहाभिमान के कारण अपना अकर्त्तापन भूलकर स्वप्नावस्था में हुई विषबाधां
की तरह कर्मबन्धन में पड़ जाते हैं। स्वप्न में विष का प्रभाव हुआ था, वह अब बिलकुल उतर गया है, इस
प्रकार बंध और मोक्ष को ये मूर्ख लोग सच मान लेते हैं। तुम्हारा यह कठपुतली का खेल मिथ्या होते हुए भी
तुम उसे सत्य का आभास देते हो। तुम्हारी यह महिमा अपूर्व है। तुम्हारी अतर्क्य लीला का कोई तर्क सम्भव
नहीं है। अचेतन में तुम चैतन्य का धर्म स्वयं दिखला देते हो, यह मर्म किसी को समझ में नहीं आता। तुम कर्म
करके भी अकर्ता हो। तुम अकर्ता होते हुए कर्ता बनते हो और कर्ता होते हुए अकर्ता बनते हो। यह तुम्हारी
कठपुतली की कला किसी की समझ में नहीं आती। तुम्हारी माया देखने जाओ तो वही माया देखने वाले को
ग्रस लेती है। उसे भी छोड़ दें तो; तुम्हें ही देखने जाओ तो वह सत्तावस्था भी मायिक थी। तुम्हारा चरित्र अगम्य
है इसलिये समझ में आना सम्भव नहीं है। अपने सूत्र को दृष्टि से ओझल रखकर तुम प्राणिमात्र को विचित्र ढंग
से नचाते हो। तुम्हारे ही कारण संसार चल रहा है लेकिन मैंने कुछ किया है ऐसा तुम्हें नहीं लगता है। ऐसा
तुम्हारा खेल है, वह कोई कैसे देखे ? इस प्रकार खेल बढ़ाते हो और झट विकल्प से तोड़ भी देते हो। महतत्व
में विकार भर देते हो। लेकिन इसके लिये भी तुम्हारे कर्तत्व की आवश्यकता नहीं होती। इसका मुख्य लक्षण
तुम्हारी कृपा के बिना मालूम नहीं होता। तुम्हारी पूर्ण कृपा हो जाय तभी जन में जनार्दन प्रकट होता है और जब
जन में जनार्दन प्रकट होता है तभी हम भी तद्रूप होते हैं। यही उसका मूलबीज है। वहाँ 'मं' का 'तू' का भाव
नहीं रहता। 'मैं' 'तू' के बिना जन में नित्यानंद रूपी जनार्दन प्रसिद्ध है; उसकी कृपा से ही श्रीमद्भागवत का
ठीक तरह वर्णन हो रहा है। उसके इक्कीसवें अध्याय के अन्त में त्रिकांडात्मक वेद का लक्ष्यार्थ अर्थात् सर्वत्र
एक ही ब्रह्म है और वह अद्वय एवं अविनाशी है यह बतलाया गया है। वेदवाणी के अनुसार भी ब्रह्म एक ही है
और स्वानुभव से देखने पर भी वह वैसा ही दिखाई देता है। फिर भी बड़े-बड़े ऋषि और ज्ञाता तत्त्व अनेक हैं
ऐसा क्यों कहते हैं ? यही शंका मन में लाकर उद्धव ने प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया। लेकिन मन में एक ही भाव
था कि श्रीकृष्ण शान्त न बैठें। यदि मैं कहूँ कि 'मैं ब्रह्मस्वरूप हो गया' तो श्रीकृष्ण यह सुनकर निजधाम को
चले जायेंगे। इस उलझन में, उसने सन्देह न होते हुए भी प्रश्न किया। वह सुनकर श्रीकृष्ण को सुख और
समाधान का अनुभव हुआ। इतने में श्रीकृष्ण के मन में एक निराली ही बात आयी कि उद्धव और मैं तो एक ही

हैं, वियोग का दुःख तो मिथ्या है, यह बात उद्धव की समझ में आने तक क्यों न उसके प्रश्नों का उत्तर दें ? इस
बाईसवें अध्याय में वे कुल तत्त्वों की संख्या बतायेंगे, उसी के साथ-साथ प्रकृति पुरुष का विचार और
जन्ममरण का प्रकार भी बतायेंगे। आत्मा एक ही है या अनेक है यह मालूम हो, साथ ही तत्व संख्या भी ठीक
से ज्ञात हो इसलिये उद्धव प्रश्न पूछ रहा है।

उद्धव उवाच
कति तत्त्वानि विश्वेश संख्यातान्यूषिभिः प्रभो ।
नवैकादश पञ्च त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम ॥ १ ॥

हे विश्वात्मका, विश्वेश्वरा, हे विश्वधारका, हे विश्वसाक्षी, हे विश्वाकारा, हे विश्वैकसुंदरा श्रीकृष्ण ! तुम्हें
'विश्वात्मक' कहें तो जड़, मलिन एकदेशीयता और अज्ञानता का बोध होता है ऐसा तुम कहोगे, इसलिये तुम्हारा
प्रभुत्व बताता हूँ। जड़-मलिन-अज्ञानता यह सब माया के ही कारण होता है, जिसके नियंता तुम ही हो। यही
तुम्हारा अगाध प्रभुत्व है। इस प्रकार स्वामी श्रीकृष्ण का उत्तम ढंग से गौरव कर उद्धव ने अत्यन्त विनयपूर्वक
तत्वसंख्या के विचार पूछे। उसने कहा, तपसामर्थ्य में महासमर्थ, भूत-भविष्य जानने वाले जो बड़े-बड़े ऋषिवर्य
हैं उन्होंने निकाली हुई तत्त्वों की संख्या विचित्र-सी लगती है। वे उसके विविध प्रकार बताते हैं। उन्नीसवें
अध्याय में आपने ही तत्वों के सम्बन्ध में विचार विस्तार से बताये हैं। उसमें आपने तत्वों की जो संख्या बतायी
है वही मैं बताता हूँ। चौदहवें श्लोक के निरूपण में, हे श्रीकृष्ण ! तत्वों की गणना कर आपने निश्चयपूर्वक वह
संख्या अट्ठाईस बतायी। इस तत्त्वसंख्या के विचार में प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व और अहंकार और श्रेष्ठ पंच
महाभूत मिलाकर यह संख्या नौ हो गयी। इसके बाद दस इन्द्रिय, ग्यारहवाँ मन, पाँच विषय और तीनों गुण
मिलाकर यह संख्या अट्ठाईस होती है ऐसा आप ही ने निरूपण किया था। हे लक्ष्मीपते ! यही तुम्हारा मुख्य
निरूपण था। अब बड़े-बड़े ऋषियों का युक्तिवाद भी तुम्हें बताता हूँ। उसका अर्थ भी आपको बताता हूँ। उसे
आप ठीक तरह से सुन लें। ऐसा कह कर उद्धव स्वयं उनकी बातें बताने लगा। उसने कहा, आप ठीक तरह से
श्रवण करें। मैं एक चमत्कार बताता हूँ। प्रकृतिपुरुष में ही एक विचित्र प्रकार है।

केचित् षड्विंशति प्राहुरपरे पञ्चविंशतिम् ।
सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे ॥ २ ॥
केचित् सप्तदश प्राहुः षोडशैके त्रयोदश ।
एतावत्त्वं हि संख्यानामृषययो यद्विवक्षया ॥ ३ ॥

इन तत्वों की संख्या में बहुत बड़ा मतभेद है तथा बड़े-बड़े ऋषियों के इस संबंध में विवाद चल रहे हैं।
उन विवादों का सारांश भी मैं आपको स्पष्ट रूप से बताता हूँ। एक मत है कि ये तत्व छब्बीस हैं, दूसरा कहता
है, चुप रहो। कुल मिलाकर सारे तत्त्व पच्चीस ही हैं। तीसरा कहता है, आप लोग यहाँ अपना हठ लेकर क्यों बैठे
हैं ? सारे तत्त्व सात ही निश्चित हुए हैं। एक कहता है, कैसा आश्चर्य ! लोगों को बोलते हुए लाज नहीं लगती।
यह बकवास व्यर्थ है। वास्तव में नौ तत्त्व ही निश्चित हुए हैं। उनमें से एक जन हँस कर कहता है, आजकल
लोग बहुत बुद्धिमान हो गये हैं। व्यर्थ की बकवास करते हैं। तत्त्व कुल मिलाकर छः ही हैं। कुछ लोग कहते हैं,
दूर हटिये, तत्त्वसंख्या का विचार आपकी समझ में नहीं आता। बड़े लोगों से पूछने पर वे तत्त्वों की संख्या सत्रह