श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 565, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय ५४९
वैराग्य के लिये तप करें और आलस्य जाने के लिये कर्म करें। मेरे भजन के प्रति दृढ़ बुद्धि रखना इसी का नाम
है 'वीर्यशुद्धि' और मेरे अविरत स्मरण से 'चित्त शुद्धि' निश्चय रूप से प्राप्त होती है। जो बुद्धिमान ब्राह्मण हों,
उन्हें इस प्रकार अंतर्बाह्य शुद्ध होना चाहिये। इसके लिये वेद ने अपने-अपने कर्म बताये हैं।
मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धेर्मदर्पणम्।
धर्म सम्पद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्ययः॥ १५॥
मंत्रार्थ ज्ञान से मंत्र शुद्धि होती है, ब्रह्मार्पण से कर्म शुद्धि होती है; कर्ता की शुद्धि के लिये वेद ने छः
लक्षण बताये हैं। देश, काल, द्रव्यसंग्रह, मंत्र, कर्म और निरोगी कर्त्ता ये छह अवस्थाएँ शुद्ध हों तो स्वधर्म
फलदायी होता है। अनाथ, दीन लोगों के पास संकट के समय जो द्रव्य पहुँचता है, अथवा मेरे भक्त के पास
जाता है, वही वास्तव में 'द्रव्य की पवित्रता' है। स्वयं कष्ट से अर्जित किया हुआ धन धर्मशास्त्र के अनुसार शुद्ध
है, लेकिन धन के लालच में प्राण अटका हुआ हो तो वह सारा धन अशुद्ध है। इसी को धन की शुद्धता कहते हैं।
अब मंत्र की पवित्रता सुनो। जिस मंत्र से मंत्र की सिद्धता होती है, वही मंत्र सर्वथा शुद्ध है। जिस मंत्र के लेने से
देह में अभिमान बढ़ता है, अथवा जिसमें जारण-मारण उच्चाटन आदि रहता है वह मंत्र अपवित्र हैं। इस प्रकार
'मंत्रशुद्धि' बतायी। अब कर्म का लक्षण सुनो। तो जिस कर्म के योग से कर्म का बन्धन टूटता है वह कर्माचरण
अत्यन्त शुद्ध है। कर्माचरण करते समय जिसमें देहाभिमान खौलता है और कर्ता का बन्धन अधिक दृढ़ होता है,
वह कर्म अपवित्र है। जिस कर्म से कर्म का निवारण होता है, वही कर्म वास्तव में शुद्ध है और उद्धव! जहाँ
सर्वदा अविनाश समबुद्धि रहती है; वह देश पुण्यवान है। यदि सुक्षेत्र में वास करे किन्तु वहाँ दूसरों के गुणदोष
दिखायी देने लगे तो वह देश भी तामस है। उसके योग से कर्त्ता का अचूक नाश होता है। अन्य क्षेत्रों में दोष
देखने से उनका उत्तम क्षेत्र में विनाश होता है; किन्तु उत्तम क्षेत्र में ही दोष देखने पर वे कल्पांत में भी जीव को
नहीं छोड़ते। जहाँ ऐक्य भाव का निर्माण होता है उस देश को निर्मल समझना चाहिये और चित्त को सुप्रसन्न
करने की जो बेला है वही साधक का पुण्यकाल समझना चाहिये। 'ब्राह्ममुहूर्त' का अर्थ है, भोर की बेला। यह
समय स्वाभाविक रूप से पवित्र है। उसमें भी यदि चित्तक्षोभ हो तो वह काल भी अपवित्र समझना चाहिये। अब
जो कर्म कर्ता है उसकी कर्म की अहंता यदि नष्ट हो जाय, तभी वह कर्म स्वाभाविक रहता है। यही कर्ता की
पवित्रता है। उसमें यदि कोई 'मैं कर्ता' कहे तो वह बद्ध हो जाता है। देहाभिमान के कारण कर्ता अपवित्र होता
है। इस प्रकार धर्माधर्म के छह प्रकार हैं। यही वेदार्थ तत्त्व का सार है। इसी धर्म से पुरुष मुक्त होता है और
अधर्म से अपवित्र होकर बन्धन में फँसता है। इस प्रकार गुणदोषों का लक्षण बहुत गहन है। उसमें बड़े-बड़े
ज्ञानी, चतुर पण्डित भी भ्रम में पड़ जाते हैं।
कश्चिद्गुणोऽपिदोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः।
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