श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
५२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडं वनस्पतिम्।
खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पटः ॥ १५॥
किसी वृक्ष की चोटी पर कोई पक्षी घोंसला बना कर रहता है और कोई निर्दय व्यक्ति उस वृक्ष की जड़
काटने लगता है। यदि वह पक्षी यह देखकर अपने घोंसले से पलायन करता है तभी उसका कल्याण होता है।
यदि वह वहीं रह गया तो उसकी मृत्यु निश्चित है। उस वृक्ष की ही तरह देह का मरण भी अटल है, उसमें जीव
रहता है तो उसे भयंकर दुःख भोगना पड़ता है, वह कभी नहीं टलता।
अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः।
मुक्तसङ्गः परं बुद्ध्वा निरीह उपशाम्यति ॥ १६ ॥
रात-दिन आयु कम होती रहती है। कलिकाल का वेग तो भयंकर रहता है। यह एक नित्य नया रोग शरीर
में लगा हुआ है। काल कालमान के अनुसार आयु का क्षय करता रहता है। इसी में आयुष्य का विनाश होता है,
यह ध्यान में रखकर और नरदेह का कभी भी पतन होगा यह जानकर जो घरबार के प्रति उदासीन होता है वह
देह की क्षणभंगुरता जानकर देहाभिमान छोड़कर भक्तिज्ञान प्राप्त करने के प्रति अत्यन्त जागृत रहता है। यदि
देहाभिमान नहीं छोड़ा तो मृत्यु कभी भी शरीर पर आक्रमण करेगा इस भय से उसका शरीर काँप उठता है और
वह पूर्ण वैराग्य धारण करता है। वैराग्ययुक्त भक्ति करने से देहाभिमान की निवृत्ति होती है। तब ज्ञान सम्पत्ति घर
में प्रवेश करती है और चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़ती हैं। इस प्रकार निजात्मप्राप्ति होने पर प्रवृत्ति अपने
आप रुक जाती है और निवृत्ति की भी निवृत्ति हो जाती है और फिर संसार की अपने आप शान्ति हो जाती है।
इस प्रकार नरदेह प्राप्त कर अनेक लोगों ने आत्मानंदसुख प्राप्त किया। ऐसा होते हुए मूर्ख लोग अपना सुख नहीं
साधते, उसकी श्रीकृष्ण निंदा कर रहे हैं।
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ॥ १७॥
चौरासी लाख जीवयोनी हैं। इसमें मनुष्य देह के सिवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का कोई अधिकारी नहीं है।
नरदेह से मेरी प्राप्ति होती है इसलिये देह को 'आद्य' कहा गया है। इसकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। बड़े भाग्य
से नरदेह प्राप्त होता है। सुदृढ़ अर्थात् सभी अवयवों से युक्त, कहीं कोई व्यंग्य नहीं, न बहरा, न अन्धा, न पंगु,
न गूँगा, इस प्रकार सर्वांग से सम्पूर्ण और यह सब भरतखण्ड में प्राप्त होना, अत्यन्त भाग्य का लक्षण है और
तिस पर यदि अंतःकरण में परमार्थ के बारे में विवेक है तो मैं परमात्मा उसका आज्ञाधारक बन जाता हूँ। जब
स्वयं मैं ही उसका आज्ञाधारक हूँ तो बाकी देवताओं और मनुष्यों की क्या बिसात है ? लेकिन यह नरदेह पुनः
प्राप्त नहीं होगा। पुण्य और पाप का पलड़ा जब बराबर रहता है तभी नरदेह प्राप्त होता है, यह ध्यान में रखो।
ऐसा नरदेह ही पुनः मिलेगा यह नाप कर कोई कर्माचरण नहीं कर सकता। पुण्य अधिक हो जाय तो स्वर्ग
भोगना आवश्यक हो जाता है और पापों का पलड़ा भारी हो जाय तो नरक भोगना पड़ता है। इस प्रकार कर्म
की गति अत्यन्त गहन है। उसमें काकतालीय न्याय से ही संसाररूपी भवसागर पार करने के लिये नरदेहरूपी
जहाज अपने भाग्य से मिलता है। 'सुलभ' अर्थात् अविकल, और 'सुकल्प' अर्थात् विचारशील को उस पार ले
जाने वाला नाविक केवल गुरु ही है। गुरु मंत्र कान में देता है इसलिये उसे 'कर्णधार' कहते हैं। भक्तों का
उद्धार कान पकड़कर करने के कारण गुरु सभी दृष्टियों से 'कर्णधार' है। संसाररूपी सागर में नरदेह ही जहाज
बीसवाँ अध्याय ५२९
है। वहाँ सद्गुरु ही नाविक है। जहाज को उस पार पहुँचाने के लिये मैं श्रीहरि अनुकूल बहने वाली वायु हूँ।
'गुरु कर्णधार की कुशलता का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? भँवरे, प्रपात, पानी की तेज धारा, विकल्प के
कल्लोल आदि से बचाकर वह अपनी नौका को आगे बढ़ाता है। विवेक का पतवार लगाकर कर्माकर्म का जल
प्रवाह काटा जाता है और भजनरूप मस्तूल के बल पर नौका धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाती है। कामक्रोध की
बड़ी-बड़ी मछलियाँ चारे की खोज में छिपी बैठी रहती हैं, उस पर शान्ति का जाल डालकर वह अपना जहाज
बड़ी कुशलता से आगे बढ़ाता रहता है। सह में सारूप्य की गोदी आती है, तो वहाँ नाव में गजर होने लगता है।
अनाहत के ध्वज फहराते हैं, जय-जयकार की गर्जना होने लगती है। सलोकता के बाजार में जाने पर जहाज
कहीं उलट न जाय अथवा समीप के मार्ग पर ले जाने पर कहीं दोनों ओर से डगमगा न उठे इसलिये जहाज
को सरूपता की गोदी में ही स्थिर किया जाय ऐसा विचार मन में आता है लेकिन वहाँ बहुत भीड़ रहती है
इसलिये सारी बातों का विचार कर जहाज को सायुज्य गोदी में ले जाते हैं। वहाँ धार्मिक लोगों की निर्मल
धर्मपेठ (बाजार) ही लगी रहती है। न शोरगुल है न झगड़ा-टंटा है। सभी सामान निर्मल है। जो माल चाहे
एकसाथ ले सकते हैं। ऐसा यह नरदेह का दुर्लभ जहाज है तथा श्रीगुरुरूप से मैं ही उसका कर्णधार अर्थात्
नाविक हूँ। इस जहाज के सहारे जो भवसागर को पार नहीं करेगा, उस पुरुष को आत्मघाती समझना चाहिये।
यदि आगे जाकर नरक यातना भोगने के लिये ही यह देह विषयों में खर्च किया तो वह अपने ही हाथ से सीने
में शस्त्र घुसेड़ने जैसी बात होगी। उस पार जाना आवश्यक है इसलिये नौका तोड़कर उस पर चना भूज कर
खाये अथवा बुद्धिमान लोग जाड़े के भय से ओढ़ना जला कर उस आग से तापें, उसी प्रकार यहाँ होता है।
लोग व्यर्थ ही नरदेह को खो देते हैं। आगे दुःख के दुर्धर पर्वत आ जाते हैं। सचमुच, सभी योनियों में
विषयासक्ति सभी को लगी है। नरदेह में भी विषय सम्बन्ध से वैसी ही स्थिति रही तो उसके मुँह में मिट्टी ही
पड़ेगी। ऐसा श्रेष्ठ नरशरीर प्राप्त होने पर भी जो संसार के उस पार नहीं जायेगा, वह उद्धव! सचमुच
आत्मघाती पुरुष ही होगा। सहस्रों ब्रह्महत्या अथवा गोहत्या करने पर भी शास्त्रों में प्रायश्चित्त का विधान है,
लेकिन जो आत्महत्या कर लेता है उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं होता क्योंकि जो आत्महत्या करके मरता
है, वह तत्काल नरक में जाता है, फिर प्रायश्चित्त करने के लिये बचा कौन? और शास्त्रार्थ भी किसे बताया
जाय ? अमृत बेच कर यदि कोई माड पिये, उसी प्रकार नरदेह प्राप्त कर विषयभोग में लिप्त रहे तो जीव का
सच्चा स्वार्थ डूबकर वह अपनी हानि कर लेता है। उत्तम शरीर प्राप्त कर विषयासक्ति के कारण अनेक लोग
डूबते हैं, ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। लेकिन ये मूर्खों की बातें रहने दो। अब वेदार्थ के अनुसार चलकर, अपने हित
पर दृष्टि रखकर सावधान रहने वाले उत्तम लोगों की पद्धति सुनो। जो स्वभाव से ही अत्यन्त विरक्त रहते हैं
उन्हें कौन-सा कर्तव्य करना चाहिये ? किस वस्तु का त्याग करें ? यही बात भगवान बताते हैं।
यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः।
अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः॥ १८ ॥
जो कर्म के आरम्भ में ही विरक्त रहता है, फल की आशा जिसके चित्त को स्पर्श नहीं करती; मोक्ष
मिलने की इच्छा का जिसे स्मरण नहीं होता, वैराग्य की दृष्टि कठोर होने के कारण जो इन्द्रियों को विषय की
बात भी नहीं करने देता, इतना कठोर मनोनिग्रह होता है उसका। वह धारणा निग्रह दृढ़ रखता है। श्रवण और
मनन कर मेरे स्वरूप का अनुसन्धान करता है। अखण्ड मेरा ही ध्यान करता है। मन को तिलभर के लिये भी
ढलने नहीं देता। धारण के बल से आत्मस्वरूप में मन स्थिर रखता है, जरा भी नहीं ढलने देता। निजबोध से
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उसे निश्चल रखता है। लेकिन मन आत्मस्वरूप में किस प्रकार निश्चल होता है? उसका उपाय भी श्रीकृष्ण
बता रहे हैं।
धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्वनवस्थितम्।
अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥१९॥
आत्मस्वरूप में ही ध्यान केन्द्रित कर बैठने से यदि मन स्थिर न रह पाये, अपने चंचल स्वभाव के कारण
वह अपना गुण न छोड़े, अथवा साधक आलस्य के कारण विकल हो जाय या विषयों के सुख का स्मरण करने
लगे, तो उससे मन अपने चंचल स्वभाव के कारण स्वरूप में से पलायित हो जाता है। ऐसी अवस्था में अपना
आसन अटल कर, स्वयं सावधान होकर सद्गुरु के चरणों का स्मरण कर मन को स्वरूप में ही रखना चाहिये।
मन को यदि विषयदान न दिया जाय तो वह हठ से कुछ अधिक ही क्षुब्ध हो जाता है। ऐसे समय
स्वरूपानुसंधान न छोड़, उसे विधिपूर्वक दाना पानी देते रहना चाहिये। (आशंका) सर्प को अमृत पिलाने से वह
विष ही हो जाता है; उसी प्रकार मन को भी विषयसुख देने से वह पहले से भी अधिक क्षुब्ध हो उठेगा। इसलिये
मन को ऐसे विषयभोग देने चाहिये जिसके योग से वह स्वतंत्र रहे। इसी अर्थ का निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण अगले
श्लोक में बताते हैं।
मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रियः।
सत्त्वसम्पन्नया बुद्ध्या मन आत्मवशं नयेत्॥२०॥
मन को स्वतंत्र न छोड़, स्वरूपानुसंधान न छोड़ अन्न, पानी और निद्रा ये विषय मन को देना अपने हित
में रहता है। साधक भले ही साधन के द्वारा इन्द्रियों को और प्राणों को जीत ले लेकिन मन को उसे स्वतंत्र नहीं
छोड़ना चाहिये। उसे स्वरूप में ही स्थिर रखना चाहिये। जो मन पर विश्वास करता है उसे कामक्रोध कहीं का
नहीं छोड़ते; संकल्पविकल्प उसे लूट लेते हैं और महामोह ग्रस लेता है। मन का बल बहुत बड़ा है यह ध्यान
में रखकर उसके पैर में विवेक की सिकड़ी बाँध देनी चाहिये। मन और विवेक इन दोनों का ऐक्य होते ही
बुद्धि सत्त्वगुण से युक्त होकर विषय की जड़ ही उखाड़ देती है और विकारयुक्त उपाधि तोड़ देती है। मन
जिधर-जिधर भागने का प्रयास करता है, उधर-उधर विवेक उसका पीछा करता रहता है और फिर वह
सात्त्विक बुद्धि के सहारे मन के पैर ही तोड़ देता है। इस प्रकार मन का बल टूट जाने पर जिस प्रकार पानी का
प्रवाह नदी के जल में ही रहता है, उसी प्रकार मन भी स्थिर रहता है। इस प्रकार जब मन स्वयं ही स्वरूप में
शान्त हो जाता है, तभी योग श्रेष्ठ होने के कारण उसके योग से जीव और शिव दोनों का ही समाधान होता है।
जीव और परमात्मा में ऐक्य स्थापित करना यही वास्तव में 'श्रेष्ठ योग' है। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण
अश्व के दृष्टांत से करते हैं।
एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः।
हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवाव॑तो मुहुः॥२१॥
अश्व पर जीन चढ़ाये बिना घुड़सवार जिस प्रकार घोड़े को अपने हुक्म से वश में करता है, उसके पृष्ठ
भाग पर चाबुक मारता है, जहाँ पैर सँभाल कर चलता है तो वह उसे पुचकारता है। लेकिन जहाँ उसका पैर
गलत पड़ता है वहाँ उसके मर्म पर चाबुक मारता है। यदि अश्व हठ के कारण अपनी आदत नहीं छोड़ता तो वह
उसे थोड़ी छूट दे देता है लेकिन उसे पूरी तरह खुला नहीं छोड़ता और न उसे पीड़ा ही देता है। इस प्रकार वह
बीसवाँ अध्याय ५३१
अश्व को अपने वश में करता है। अपने वश में रखने की मालिक की इच्छा अश्व जानता है और घोड़े का मन
एक होने पर घोड़ा भी बिना लगाम के मालिक की आज्ञा से काम करने लगता है। अड़ना, उछलना-कूदना वह
छोड़ देता है और मालिक की मर्जी से उसकी इच्छा के अनुसार नाचने लगता है। इसी प्रकार मन का भी नियंत्रण
करना चाहिये। मुख्यतः हमें अपने मन पर विजय प्राप्त करनी चाहिये, यही परमयोग का साधन है। यही मैंने
तुम्हें पिछले श्लोक में बताया है। 'नृदेहमाद्यं' इस श्लोक के अन्त में कर्मवैराग्य के द्वारा मुक्ति मिलने की बात
कही थी। अब इस श्लोक में, उत्तम गति अभ्यास से ही प्राप्त होती है यह बताया है। लेकिन मुख्यरूप से
सांख्ययोग से ही मेरी प्राप्ति होती है, यही बात मैं तुम्हें बताने वाला हूँ। उसका सारांश यही है कि संसार की
स्फूर्ति मिथ्या है और ब्रह्मसाक्षात्कार ही सत्य है। यह निरूपण गहन ज्ञानात्मक है। फिर भी वह गुह्यज्ञान मैं तुम्हें
बताऊँगा। वह त्रिगुण में विद्यमान होते हुए भी गुणकार्य से अलिप्त रहता है। मैं तुम्हें गुह्यज्ञान बताऊँगा यह
सुनकर उद्धव स्वयं कान बन गया और श्रवण करने के लिये अत्यन्त सावधान होकर बैठ गया। उद्धव की यह
आतुरता देखकर व्याकुल चित्तरूपी चकोर को तृप्त करने वाला चन्द्रमा तथा आत्मज्ञानरूपी गुणों के समुद्र
यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने क्या कहा ?
सांख्येन सर्वभावानां पतिलोमानुलोमतः।
भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत् प्रसीदति ॥ २२ ॥
सृष्टि के प्रारम्भ में जो अलिप्त रहता है और सृष्टि की स्थिति में महत्तत्त्वादिकों से लेकर देह तक व्याप्त
रहने वाला जो तत्त्व होता है, वह ब्रह्म है। सृष्टि की विशेष स्थिति में गुणकार्य को वही प्रकाशित करता है,
अन्त में गुणकार्य को ग्रस लेता है और अवशेष भी वही रहता है। अलंकार बनवाने से पहले भी वह सुवर्ण
रहता है, अलंकार बनवाने पर भी उसका सुवर्ण वाला गुण कम नहीं होता और अलंकार तुड़वाने पर भी सुवर्ण
को कोई भय नहीं है। बादल आने के पहले आकाश शुद्ध रहता है और बादलों के भीतर, बाहर भी आकाश ही
रहता है। उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय इनके अन्त में परब्रह्म अलिप्त स्थिति में एकत्र रहता है।
उद्धव ! उससे सम्बन्धित विचार भी तुम्हें सुनाऊँगा। कुम्हार जो भी बर्तन तैयार करता है उसमें मृत्तिका व्याप्त
रहती है, उसी प्रकार जो-जो तत्त्व उत्पन्न होता है, वह सब परब्रह्म से व्याप्त रहता है। समुद्र में जो लहर उत्पन्न
होती है, उसमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, उसी प्रकार महत्तत्त्व से देह तक भीतर-बाहर केवल चित्तस्वरूप
ही रहता है अथवा जो भी पदार्थ उत्पन्न होता है, वह निश्चय ही आकाश से ही व्याप्त रहता है, उसी प्रकार जो
भी तत्त्व उत्पन्न होता है, वह चैतन्यरूप से ही व्याप्त रहता है। इस प्रकार परब्रह्म से अलग कुछ भी नहीं
दिखायी देता। उसी प्रकार पृथ्वी से प्रकृति तक लय देखें तो जिस प्रकार जल का प्रवाह जल में ही रहता है,
उसी प्रकार सारे तत्त्वों की लय भी उस चित्स्वरूप में ही रहती है। प्रकृति आदि तत्त्व प्रबल होते हैं जो विकार
के कारण विलीन हो जाते हैं। परन्तु परब्रह्म वस्तु अलिप्त अवस्था में उसी प्रकार विद्यमान रहती है। उद्धव !
सारांश यही है कि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होने पर भी परब्रह्म अविनाशी होते हुए अलिप्त ही रहता है। वह
नित्य शुद्ध-बद्ध-मुक्त स्वभाव का ही रहता है इसे ध्यान में रखो। जहाँ ऐसा परब्रह्म है वहाँ संसार की कल्पना
ही मिथ्या है। जिस प्रकार भ्रमित मनुष्य रस्सी को सर्प समझ कर व्यर्थ ही काँप उठता है, उस सर्प को बाहर
फेंक कर रस्सी को शुद्ध नहीं कर लेता, उसी प्रकार चारों ओर परमानन्द ही भरा हुआ है ऐसा श्रीकृष्ण ने
कहा। ऐसी वस्तु जहाँ है वहाँ मन भी अपना मन भूल जाता है और इसी साधन से साधक भी पूरी तरह
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ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। अब यह श्रेष्ठ किन्तु कठिन साधन जिससे नहीं होगा, उसका मन निश्चल होने के
लिये भगवन् एक अन्य साधन बताते हैं।
निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः।
मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया॥ २३॥
जन्म-मरण के भयंकर भँवर में गोते लगाते हुए साधक वैराग्य से अत्यन्त संतप्त होता है इसलिये विष
मिलाये हुए पकवान की तरह उसे विषय में विरक्ति प्राप्त होती है। खुशबूदार अमृतफल हो और उस पर सर्प
जहर उगल दे, उसी प्रकार सभी विषयों में उसे अत्यन्त बाधा दिखाई देती है। ऐसे विवेक से जो विवेकशील
हुआ है; साथ ही श्रद्धायुक्त गुरुभक्त, गुरु ने बताया हुआ अर्थ जो हृदय से नहीं भूलता, गुरु के उपदेश को सदा
हृदय में धारण करता है और मन में जिस अर्थ का विचार किया है उसी अर्थ का पुनः पुनः मनन करता है।
प्रत्यगात्मा का अखण्ड चिन्तन करने से मन संकल्प विकल्प छोड़ देता है। फिर वह स्वयं देहाभिमान छोड़ कर
स्वयं ब्रह्मसम्पन्न हो जाता है। ऐसे ब्रह्मसम्पन्न होने पर मन स्वरूप में लीन हो जाता है। इस एक उपाय को भी
ध्यान में रखो। लेकिन यदि यह भी न हो सके तो एक और उपाय बताता हूँ, सुनो।
यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया।
ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मनः॥ २४॥
सारे विषय भोग छोड़कर यमनियमों के साथ योगमार्ग का आश्रय करें। अच्छी तरह आसन पर बैठकर
(गुदस्थान की ओर के) 'मूलाधार' चक्र पर दृष्टि केन्द्रित कर मुद्रा साधें। उस समय अपानवायु ऊर्ध्वमुख से
(लिंगस्थान की ओर के) 'स्वाधिष्ठान' चक्र तक पहुँचने तक बढ़ता जाता है और प्राणवायु प्राणायाम से अटक
कर पुनः नाभिस्थान की ओर लौट जाता है। तब प्राण और अपान ये दोनों जब सम हो जाते हैं तो स्वयं वायु
शरीर का मलक्षालन कर पिण्ड ब्रह्माण्ड की शुद्धि करती है। कफ और पित्त दोनों को खाकर नाड़ी का शोधन
कराती है। पुराने मल संचित रहते हैं, उन्हें भी तत्काल नष्ट कर डालता है। वायु का सामर्थ्य बहुत अधिक और
विलक्षण है। वह पिण्डों के और ब्रह्माण्ड के सारे मल साफ कर निर्मल कर देता है। इतनी पवित्रता केवल इस
महायोग से होती है। लेकिन उस समय अनेक रोग प्रकट हो जाते हैं। बड़े-बड़े विघ्न आ जाते हैं। नाना विकल्प
मन में उभरते हैं और सिद्धियों को लूटना चाहते हैं। उद्धव! इतने विघ्न सिर पर आ जाए तो साधक यदि धैर्य
नहीं खोता, तभी प्राणापान सम होगा यह ध्यान में रखो। प्राणापान का मिलन होने पर 'कुण्डलिनी' शक्ति जागृत
होती है और वह उन प्राणापान को लेकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है। वह असाधारण आदि शक्ति पश्चिम
का बड़ा घाट (मेरुदण्ड) चढ़ने लगती है। वहाँ के षडचक्रों का कोलाहल समाप्त कर वायु पहले से ही उसका
मार्ग समतल कर देती है। उस मार्ग से जब कुण्डलिनी जाने लगती है तो आधिव्याधि की लहरें बंद हो जाती हैं।
विकल्प की राहें बन्द हो जाती हैं और बड़े-बड़े विघ्नों की झड़ी भी बाधा नहीं पहुँचाती। उल्हाट शक्ति की बाट
लाँघ कर आगे बढ़ने पर ब्रह्मरन्ध्र का द्वार खुलता है और सहस्रदल कमलों में से अत्यन्त शुद्ध और मधुर
चन्द्रामृत के झरने बहने लगते हैं। कुण्डलिनी बाला उसका प्राशन कर, सन्तोष से गरल निकाल देती है। इससे
शरीर पर तेज उभरने लगता है जिससे देहभाव बदलने लगता है। कला शरीराकार में उलीची जाने के कारण
उसका शरीर अत्यन्त सोज्ज्वल दिखायी देने लगता है इतना कि वह ब्रह्मरस का पुतला प्रतीत होने लगता है या
कि जैसे ब्रह्मसुख की कली खिली हो। उसके अवयवों का क्या वर्णन किया जाय? जीव का जीवन खिल जाए
या ब्रह्मविद्या पर फल लग जाए अथवा चैतन्य को अंकुर फूटे इस प्रकार अवयव शोभित होने लगते हैं। देह के
सूक्ष्मत्व के कारण वह संसार की आँखों में समा जाता है और जीव में संचार कर वह अपने स्वभाव के अनुसार
विचरण कर सकता है। वह वायु की सीढ़ी बनाकर सुख से गगन पर विचरण करता है। इसी को सिद्ध पुरुष
'परम खेचरी' मुद्रा कहते हैं। उसके शरीर की दीप्ति से सूर्य भी जुगनू की तरह दिखायी देने लगता है। अमरपति
इन्द्र चन्द्र भी उसके चरणामृत की इच्छा करते हैं। वह औट पीठ गोल्हार लाँघ कर, भ्रमरगुंफा के अन्त तक
जाकर, सोहंहंस का पीठ भेद कर परमात्मा के रूप में प्रकट होकर बैठ जाता है। इस अभ्यास के कारण यह योग
बहुत कठिन है। बहुत कम लोग ही इसे साध पाते हैं। यह मार्ग अत्यन्त कठिन है ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण भी कहते
हैं। अगर यह मार्ग उन्हें स्वीकार्य होता तो वे दूसरा साधन बताते ही नहीं। मूल श्लोक देखने से सज्जन लोग
समझ जायेंगे। सुनने में यह अच्छा लगता है लेकिन करते समय कलेजा फट जाता है। कोई साधु कितना ही हठ
क्यों न करे लेकिन उससे यह साधन नहीं सधता। बड़े-बड़े देवतागण और साधु भी इसमें फँस गये हैं। इस
कठिन साधन को छोड़िये। तुम्हें मैं एक दूसरा साधन बताता हूँ। वह है 'आन्वीक्षिकी' विद्या ! इसमें 'त्वंपद-
शोधन' का विवेक है। पंचभूतात्मक तत्त्वों का गोलक तत्पद से भिन्न है। वह सर्वव्यापक से बच कर कहीं एक
देशी बन कर रहा है। अनादि माया के प्रवाह के कारण तन्मात्रारूप विषय की संगत से, मन के संकल्प के बिना
उसने अपने को भिन्न माना है। भेद मन ने माना है, इसलिये उसे ही अभेद का उपदेश करें। इसी अर्थ का विवेक
स्वयं श्रीकृष्ण विशद करके बताते हैं। शरीर पंचभूतात्मक है यह सत्य है लेकिन उसमें की 'पृथ्वी' पानी में घुल
जाती है। पृथ्वी में 'गंध' जल में भर कर पृथ्वी ही निःशेष हो जाती है। जल के 'जलरस' का जब 'अग्नि'
शोषण कर लेता है, तब जल का ह्रास होता है। इससे तेजतत्त्व निःशेष हो जाता है। लेकिन 'वायु' का प्रताप उस
'तेज' और उसके कारण 'रूप' को ग्रस लेता है। वायु का झोंका लगते ही तेज का स्वरूप भी मलिन हो जाता
है। इस वायु का 'स्पर्श गुण' जब गगन ले जाता है तो वायु का भी भान नहीं रहता। 'वायु' आकाश में लीन हो
जाता है और केवल आकाश ही शेष रहता है। अकेले आकाश का कोई रूप ही नहीं रहता। वह गुणकार्यों के
साथ अहंकार में प्रवेश करता है, अहंकार माया में प्रवेश करता है और माया परमेश्वर में लीन होने पर मिथ्या हो
जाती है। रात अपनी प्रौढ़ता से अन्धकार फैलाती है तब सहस्रों नक्षत्र और जुगनूं अपने-अपने तेज से आकाश में
चमकने लगते हैं। लेकिन वह रात जब सूर्य के सामने आती है तो अपने कार्य के साथ अदृश्य हो जाती है। आगे
पीछे देखने पर कोई भी नहीं दिखाई देता। उसी प्रकार परमेश्वर के सामने माया अपने कार्यकारण के साथ लुप्त
हो जाती है। मिथ्या ही होने के कारण उसका कोई स्वरूप शेष नहीं रह जाता है। उसका अस्तित्व ही नहीं रह
जाता। माया प्रतिबिम्बित चैतन्य को 'जीव' यह नाम प्राप्त होता है। जब माया ही नष्ट हो जाती है तो जीवत्व भी
नष्ट हो जाता है। जीवशिव का भान नहीं रहता। मन का अपनापन उड़ जाता है, चारों ओर चैतन्य ही भर जाता
है और साधनों को अत्यन्त समाधान होता है। इस प्रकार त्वंपद का शोधन करने से तत्पद में समाधान होता है।
इसका नाम 'आन्वीक्षिकी विद्या' है। यह विवेकी लोगों को ही साध्य होती है। अब न योगसाधन की
आवश्यकता है और न त्वंपद के शोधन की। मैं तुम्हें इससे भी सुलभ अन्य साधन बताता हूँ। इसमें कष्ट तो
बहुत कम है लेकिन योग का सारा फल जुड़ता है। त्वंपद शोधन उसके आगे लाचार होकर बैठ जाता है। वह
क्या है ? वह है मेरी भक्ति । मेरी रामकृष्णदि जो मूर्तियाँ हैं उनकी अत्यन्त प्रेमपूर्वक पूजा करने से मैं श्रीपति
अत्यन्त सन्तुष्ट होता हूँ। मेरा गुणानुवाद सुनें, मेरा कीर्तन करें, मेरा नामस्मरण करें, मेरा ही ध्यान, मेरा ही भजन
इस प्रकार सदासर्वदा मेरा ही चिन्तन करते रहें। अंतःकरण में सदा मेरा ही ध्यान, मुख से मेरा ही नाम और मेरा
५३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही स्तवन, कान में मेरी ही कथा और मेरा ही कीर्तन और हाथों से सदासर्वदा मेरा ही पूजन। पैरों से प्रदक्षिणा
करें अथवा यात्रा पर जायें। अष्टांगों ने सर्वकाल मुझे ही नमन करें। इस प्रकार अनन्य भाव से मेरा भजन कर,
मेरी ही भक्ति में लीन रहना। इस प्रकार जो मेरी भक्ति में निमग्न रहते हैं, उनका मैं चक्रपाणी दास बन जाता हूँ।
त्रिभुवन में उसके सिवा मैं किसी को नहीं चाहता। इस प्रकार मेरा भजन करने पर योग आदि का स्मरण भी
आवश्यक नहीं है। उद्धव ! मैं श्रीकृष्ण भक्ति के सिवा और किसी भी वस्तु से प्राप्त नहीं हो सकता। अस्तु !
संयोग से यदि योगयों के हाथ से पाप हो जाय तो उसे कर्मप्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं है। यही बात
श्रीकृष्ण बताते हैं।
यदि कुर्यात् प्रमादेन, योगी कर्म विगर्हितम्।
योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन ॥ २५॥
भक्त से हाथ से निंद्य कर्म होता नहीं है क्योंकि उसके आगे-पीछे उसकी सुरक्षा के लिये मैं रहता हूँ। तब
वह निंद्यकर्म योग के जिम्मे आता है। योग में कभी गलती से ऐसा घट जाता है। इस प्रकार गलती से जो पातक
होता है उसके लिये उसे अत्यन्त पश्चात्ताप होता है। जिस प्रकार अग्नि से सर्प डरता है उसी प्रकार वह पातक से
डरता रहता है। सिंह पर मधुमक्खी बैठने पर वह जिस प्रकार अंग झाड़ता है, उसी प्रकार योगी भी पातक को
देखकर अनुताप करता रहता है। ऐसे समय उसे सावधान होकर योगबल से ही सारे पातकों का क्षालन करना
चाहिये। यही योगी का प्रायश्चित्त है। यदि इस योगस्थिति को छोड़ वह देह में गोबर माटी लगाने दौड़े तो वह
निश्चय ही लुट जायेगा। इससे पापों का क्षालन नहीं होगा। यदि हृदय में अनुताप नहीं हुआ है और शास्त्रों के
वचन के अनुसार यदि दिखावे के लिये गोबर माटी लगाता है तो उससे पापों की निवृत्ति नहीं होगी। आधा क्षण
भी मेरा ध्यान करने से करोड़ों पातक भस्म हो जाते हैं फिर औरों की क्या कथा की जाय ? ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण
कहते हैं। जिसका अधिकार मुझे ध्यान करने के लिये उपयुक्त है उसे दूसरा कोई प्रायश्चित्त करने के लिये कहने
से कहने वाले को ही दोष लगेगा। इसलिये यहाँ मुख्य रूप से अधिकार ही प्रमाण है। इसी विषय का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं।
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।
कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः ।
गुणदोषविधानेन सङ्गानां त्याजनेच्छया ॥ २६ ॥
मनुष्य की स्वभाव से ही विषय में प्रवृत्ति रहती है। उसकी निवृत्ति करने के लिये ही मेरी वेदोक्ति प्रकट
हुई है। विषयों का एकाएक त्याग करने में लोग असमर्थ रहते हैं, उन्हें विषय छोड़ने के लिये ही वेद उसके
गुणदोष दिखा देता है। यह माँ है, यह बहन है इनसे व्यभिचार नहीं करना चाहिये यह बात यदि वेद ने नहीं
बतायी होती तो विषयों के सम्बन्ध में चाहे जैसा व्यवहार हुआ होता। जब तक समाज में स्त्री-पुरुष हैं, तब
तक कामसंचार तो होगा ही इसलिये मैंने यदि वेदोक्ति से नियम न बना दिये होते तो भीषण व्यभिचार मच
गया होता। इसलिये और सारी स्त्रियों को छोड़कर अन्य वर्गों को छोड़कर आठ वर्ष की अपनी ही जाति की
स्त्री को विवाह योग्य समझना चाहिये। अग्नि और ब्राह्मण की साक्षि में वेदोक्त रीति से पाणिग्रहण करें तथा
अन्य स्त्रियों की आन लेकर यथाविधि स्वपत्नी से ही रममाण हों। इस प्रकार सभी लोगों को स्त्रीभोगों के प्रति
अत्यन्त आसक्त देखकर वेदोक्ति ने स्वदारागमन को ही सबसे योग्य निश्चित कर पुरुष को एकनिष्ठ बना दिया
बीसवाँ अध्याय ५३५
है। इस प्रकार अन्न सम्पर्क किससे करना चाहिये, कैसे करना चाहिये, इसका नियम भी वेद ने बना दिया है।
अन्यथा वेदों के बिना समाज में वर्णसंकरों की ही बाढ़ आ जाती है। उस वर्णसंकर को बचाने के लिये व
विषयप्रवृत्ति टालने के लिये ही वेदों ने वर्णाश्रम का प्रकार बतलाया। उद्धव! विषयों की प्रवृत्ति ही
'अविद्याबाधा' है और विषयों की निवृत्ति ही 'मुक्ति' है। वेद ने विषयों की प्रवृत्ति के लिये ही कर्मप्रवृत्ति का
मार्ग बतलाया। वर्णाश्रम के आचार की स्थिति भी विषयासक्ति नष्ट करने वाली है। नित्त नैमित्तिक कर्मतंत्र
तथा गुणदोषों के नाना प्रकारों का वेदों ने जो साधिकार वर्णन किया है वह इसीलिये कि मनुष्य में विरक्ति
उत्पन्न हो। स्वकर्म से चित्तशुद्धि होती है और उससे सच्चा वैराग्य प्राप्त होता है और वह विषयेच्छा का नाश
कर रज-तम पर भी नियंत्रण रखता है। तब केवल सत्त्वगुण ही शेष रहता है जिससे गुरुभजन की लगन उत्पन्न
होती है और ज्ञान विज्ञान घर में आता है। पूर्ण भगवद्भक्ति करें तभी गुरुभजन का अधिकार प्राप्त होता है।
सद्गुरु की महिमा का क्या वर्णन किया जाय? गुरु का आज्ञाकारी हूँ। गुरु जिस पर अनुग्रह करता है उसका
मैं भगवंत उद्धार करता हूँ। बड़े प्रेम से उसे मस्तक पर बिठाकर अपने ऐश्वर्य पर बैठाता हूँ। गुरु जिसका
परमेश्वर, परमात्मा है ऐसा जिसे विश्वास है, उसका मैं संसार का जगदीश अंकित होकर रहता हूँ। जब मैं
स्वयं ही अंकित हो जाता हूँ तो समाधि के साथ ज्ञान-विज्ञान भी गुरुभक्तों के घर में आ जाते हैं। उनके सामने
सिद्धियों की क्या बिसात है? उस गुरु की अवहेलना कर जो मेरा भजन करेगा, उसने समझ लो मेरे पकवान
में विष मिला दिया। मुँह में ग्रास और कपाल पर टोला ऐसी ही गति होती है, उस भजन की। स्वयं डूब कर
वह अपना ही बैरी हो जाता है। विषयों का त्याग कर अपने अधिकार बल से ही लोग तर जाएँ इसलिए वेद
ने गुरु का इतना महात्म्य बताया है। इसलिये जिसका जो अधिकार हो उसका उसे जरा भी उल्लंघन नहीं
करना चाहिये। लोग स्वकर्म करें इसलिये वेदों ने भी वही निश्चय दुहराया है। तो फिर कर्म ही पावन करने
वाला है ऐसा तुम कहोगे तो वैसा भी कभी नहीं होता। अपने अधिकार के सिवा कर्माचरण करना भी अत्यन्त
घातक है। संन्यासी यदि गृहस्थ धर्म का पालन करे तो वही उसके लिए पाप का कारण होता है। गृहस्थ
करतल भिक्षा माँगे तो वही उसके लिये अधर्म हो जाता है। हित के लिये औषधि लेने में यदि अनुपात गलत
हो जाय तो वही उलट कर दुःख देता है और शायद मृत्यु का भी कारण बनता है। उसी प्रकार अधिकार न
होते हुए यदि कर्म किया जाय तो वही बाधक होता है। यह मर्म जानकर ही वेद ने प्रत्येक के लिये सुगम धर्म
निश्चित कर दिये हैं। अपने अधिकार के अनुसार अपने धर्म पर निष्ठा रखना यही पुरुष का सबसे बड़ा गुण
है। इसी योग से गुणकर्म का मैल घुलकर वह विष्णु को प्रिय होता है। इसलिये वेद ने जो गुण बताया है उसी
को हमें स्वीकार करना चाहिये और वेदों ने जिसमें दोष दिखाया है उसे पूरी तरह छोड़ देना चाहिये। यही
गुणदोषों का लक्षण है। वेदानुरोध से इसका विचार करते समय बड़े-बड़े ज्ञानी भी उलझन में पड़ जाते हैं
क्योंकि वेद का अर्थ मेरी कृपा के बिना समझ में नहीं आता। निषिद्ध का त्याग कराकर वेद विषय का साथ
छुड़वाता है। यह मर्म जानकर जो बुद्धिमान है वह सर्वसंग परित्याग कर महायोगी बन जाता है। उद्धव!
जिसके लिये बड़े-बड़े देवता, मनुष्य, ऋषि और तपस्वी भी कष्ट करते हैं वह वेदतत्त्वसार मैंने तुम्हें बताया।
मेरी कृपा के बिना यह किसी के हाथ नहीं आता लेकिन तुम्हारे हित के लिये मैंने तुम्हें यह बताया है।
गुणदोष का विवेचन करना यह भी एक दोष है यह जो मैंने तुम्हें बताया था उसका भी स्पष्ट विवेचन मैंने
तुम्हें बताया। दूसरे के गुणदोष देखना मेरा वेद वचन बिलकुल नहीं है, लेकिन दोष त्याग कर केवल गुण
ग्रहण करना यही वेद का उद्देश्य है। लेकिन यह भी मेरी कृपा के बिना सम्भव नहीं होता। दूसरों के गुण दोष
५३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
न देख स्वयं ब्रह्मसम्पन्न हो यह परिपूर्ण कृपा हम कैसे प्राप्त करें ? तो उसी का निरूपण भगवान कृपा करके
कर रहे हैं। उद्धव ! मेरी कृपा का आश्रयस्थान मेरी भक्ति है।
जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्णः सर्वकर्मसु ।
वेद दुःखत्मकान्कामान् परित्यागेऽप्यनीश्वरः ॥ २७॥
मेरी कथा श्रवण करने से संसार का बन्धन टूट जाता है, ऐसा जिसका विश्वास होता है, पानी में डूब कर
प्राण जाते समय यदि मन में हरिकथा का स्मरण होगा तो जन्म-मरण का फेरा चुक जायेगा ऐसा जो कहता है,
इतनी जिसकी मेरी कथा पर भक्ति रहती है, इतना जिसका भाव दृढ़ रहता है उसमें अनिवार विरक्ति उत्पन्न होती
है। उसे कर्म की प्रवृत्ति नहीं रुचती और विषय की आसक्ति भी अच्छी नहीं लगती। उसे गृहस्थी की गल्प
कथाएँ अच्छी नहीं लगतीं, लौकिक संसार से भी प्रेम नहीं होता; लेकिन सब कुछ छोड़ देने का साहस भी नहीं
होता। यदि ऐसा है तो उसे एकनिष्ठा से और प्रेम से भजन ही करते रहना चाहिये। इसी से सम्बन्धित निरूपण
श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्दृढनिश्चयः ।
जुषमाणश्च तान् कामान् दुःखोदर्काश्च गर्हयन् ॥ २८ ॥
सब कुछ छोड़ देने का सामर्थ्य जिसमें नहीं होता, उसे जब विषयोपभोग लेने का प्रसंग आता है तो वह
इस प्रकार उपभोग लेता है, जैसे उसे सूली पर चढ़ाने के लिये सजाया गया है। सूली पर चढ़ाये जाने वाले मनुष्य
को यदि अच्छे केले दिये जाएँ या होठों को घी शक्कर चढ़ाई जाये तो उसे सूली का भय सताने लगता है। उसी
प्रकार विषय का उपभोग लेते समय उसे अत्यन्त भयंकर नरक दिखाई देता है और वह कहता है, मुझे नारायण,
मधुसूदन, माधव क्यों भूल गया ? हे कृपालु कृष्ण ! मैं विषयरूपी बन्दीगृह में पड़ा हूँ, आप गरुड़ पर बैठकर
शीघ्र आइये और मुझे छुड़ाइये। मैं विषयरूपी नरक के विशाल जबड़ों में फँस गया हूँ, इसलिये आप जिस प्रकार
गजेन्द्र के लिये कूद कर आये थे उसी प्रकार मेरे लिये भी कूद कर आइये। हे गोविन्द ! दौड़ कर आओ और मुझे
बचाओ। मेरी विषय बाधा दूर करो। हे मुकुन्द ! गदा लेकर शीघ्र दौड़ते हुए आओ। मेरी उपेक्षा मत करो। गोविन्द
तुम अटके हुए के सहायक हो तथा भक्त कार्य के पोषक हो। मैं विषयसागर में डूब रहा हूँ, अतः शीघ्र मेरा
उद्धार करो। मैं विषय सागर में डूब गया हूँ, कामलोभ की लहरों में हिचकोले खा रहा हूँ, क्रोध ने तो मेरी पूरी
तरह से दुर्दशा कर दी है और अभिमानरूपी सुरसा ने मुझे निगल लिया है। हे श्रीहरि ! तुम दीनदयाल हो। अपनी
बात तुम सच करके दिखाओ। निजबोध के हाथ से थाम कर मुझ दीन का उद्धार करो। विषय की यह बाधा
बहुत कठिन है। श्रीहरि मेरे पास क्यों नहीं आते ? इस प्रकार आक्रोश कर वह श्रीहरि का स्मरण करता है। विषय
की यह पकड़ नहीं छूटती। काम की दाढ़ में फँस गया हूँ। किसी भी तरह इस पकड़ से नहीं छूट पाता। इसलिये
हे श्रीकृष्ण ! शीघ्र आओ। उद्धव इस प्रकार मेरे भक्त की पुकार मैं एक क्षण के लिये भी सहन नहीं कर सकता।
इस प्रकार जब स्वाभाविक रूप से पूरी तरह अनुताप होता है, तभी मेरी कृपा होती है। उद्धव ! जहाँ सच्चा
अनुताप नहीं है वहाँ मेरी कृपा कभी नहीं होती। देह में अनिवार अनुताप होना यही मेरी कृपा का लक्षण है।
सचमुच, मेरी कृपा के बिना मेरी भक्ति उत्पन्न नहीं होती। जिसे मेरी कृपा प्राप्त होती है, वही मेरी अनन्य भक्ति
करता है। मेरी कृपा का यही लक्षण है कि प्राप्त विषयों का भोग करते समय मेरे भजन में खण्ड नहीं पड़ता।
इसी का नाम है मेरी 'पूर्ण कृपा'। मेरा ऐसा कृपापात्र भक्त बढ़ते प्रेम के साथ मेरी नित नयी भक्ति करता है। मेरी
बीसवाँ अध्याय ५३७
प्रीति के लिये वह अपना घरबार, स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति और धन धान्य खर्च कर देता है। अपने प्राण तक देने से वह
पीछे नहीं हटता। इस प्रकार सदासर्वदा उसका अनन्य भजन चलता रहता है। मेरे भजन पर उनका कुछ विशेष
ही प्रेम रहता है। वह दिन-रात मेरा स्मरण करना नहीं छोड़ता। उसे विस्मरण ही नहीं होता। उससे क्या फल
प्राप्त होता है, उसे श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मासकृन्मुनेः।
कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते ॥ २९ ॥
मेरी निज भक्ति के बारे में मैंने पहले तुम्हें जो बताया था, उसी पद्धति से वे भक्त अत्यन्त प्रेम से मेरा यजन
करते हैं। क्षण-क्षण, पल-पल बिना भूले, मेरा स्मरण करते एकनिष्ठा से मेरा भजन कर स्वयं को मदर्पण कर
'मैं' बन जाते हैं। दिन प्रतिदिन प्रतियोगिता की तरह उसका प्रेम बढ़ता ही जाता है। नित्य नया स्वाद मिलने के
कारण प्रेम से, बार-बार वही भजन करते रहते हैं। भजन की पुनरावृत्ति से वह कभी नहीं ऊबता, बल्कि हर्ष
होने के कारण भजन में उसे उल्हास ही होता है। मुझे अपने हृदय में बिठा कर भजन से मनःपूर्वक प्रेम हो तो
जिस प्रकार सूर्य के सामना जुगनू निस्तेज होता है उसी प्रकार सारी इच्छायें निस्तेज हो जाती हैं। सिंह को देखने
पर मदमस्त हाथी जिस प्रकार बेतहाशा भाग खड़ा होता है, उसी प्रकार मैं परमात्मा के प्रकट होते ही हृदय से
सारी विषयेच्छाएँ भाग जाती हैं। लेकिन 'मैं प्रकट हुआ' यह कहना शायद ठीक नहीं होगा क्योंकि मेरे बिना जब
कोई स्थान है ही नहीं तो 'मैं प्रकट हुआ' यह कौन कहेगा? क्योंकि उद्धव! मैं सचमुच ही सदा हृदय में ही
रहता हूँ। भक्तों की भ्रान्ति दूर होते ही मैं स्वाभाविक रूप से प्रकट ही हूँ, यह ध्यान में रखो। भक्त मेरी भक्ति कर
अपनी भ्रान्ति दूर कर देते हैं। तब मैं श्रीकृष्ण स्वयंभू वहाँ प्रकट ही हूँ। मेरे हृदय में प्रकट होते ही भक्तों को
अलभ्य लाभ प्राप्त होता है और संसाररूपी संकट दूर होता है। उसी बात को सविस्तार बता रहा हूँ।
भिद्यंते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ॥ ३० ॥
उद्धव! मैं जिससे हृदय से मिलता हूँ, तो कहीं एक स्थान पर एकत्र नहीं रहता बल्कि सर्वात्मा सर्वरूपों में
ही प्रकट होता हूँ। मेरा स्वरूप लघुकाय नहीं है। इस प्रकार जब मैं प्रकट होता हूँ तो संसार दिखायी ही नहीं
देता। गुणों के साथ भेद का त्रिकुट विलीन हो जाता है और भवभय तत्काल भाग जाता है। सूर्य के किरण
निकलते ही घृत का कड़ापन समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार मुझ नारायण के प्रकट होते ही लिंगदेह नष्ट हो
जाता है। हवा के झोंके से जिस प्रकार चारों ओर का धुँधलका उड़ जाता है, उसी प्रकार मेरे स्वप्रकाश के सामने
वासना का जाल समूल नष्ट हो जाता है। वासना का समूल उच्चाटन होते ही, जीवप्राण के साथ संशय नष्ट हो
जाता है। तब जिस प्रकार सूर्य के सामने अँधेरा नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार कर्म का भी क्षय हो जाता है। उसी
प्रकार अपने कार्य के साथ गुणों का भी नाश हो जाता है, अज्ञान के साथ अविद्या नष्ट होती है, शिवत्व के साथ
जीव का नाश होता है और चिदचिद् ग्रन्थि के साथ अहंकार का भी नाश होता है। तब 'सोहं हंस' का क्षालन
अपने आप हो जाता है यह ध्यान में रखो। जन्म-मरण भय से ही भाग जाता है और संसारबाधा समाप्त हो जाती
है। इस प्रकार भक्त गण भक्तियोग से मेरा भजन करते हैं और ऐसे निजभजन से ही समाधान पाते हैं। इस प्रकार
भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग इन तीनों योगों के भेद मैंने तुम्हें बताये। मेरी प्राप्ति का यही सबसे उत्तम मार्ग है। इसमें
विशेष रूप से मेरी भक्ति ही श्रेष्ठ है। वह किसी की सहायता की अथवा किसी साथी की अपेक्षा नहीं करती।
५३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह स्वयं अपने सामर्थ्य से मुझे प्राप्त करा देती है। यदि मेरा भजन न करें तो मेरा ज्ञान कभी भी उत्पन्न नहीं
होगा। कर्म यदि मुझे अर्पण न किया जाय, तब वही अकर्म हो जाता है। इसलिये जो मुख्य रूप से आत्मज्ञान है
वह मेरे भजन की ही अपेक्षा करता है। कर्म तो बेचारा रंक है, वह बेचारा मेरे भजन के बिना सामने आ ही नहीं
सकता। सारांश, ज्ञान और कर्म परमार्थ में भक्ति के कारण ही श्रेष्ठत्व तक पहुँचते हैं। उस भक्ति का सच्चा
महात्म्य अब तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः।
न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ ३१ ॥
कर्माचरण करना नहीं जानता, वैराग्यज्ञान प्राप्त नहीं किया, फिर भी मेरे स्वरूप पर ध्यान केन्द्रित कर
भक्तिभाव से मेरा भजन किया तो ज्ञानकर्मादिक ही नहीं अपितु वैराग्य भी, भक्ति के चरणों में शरण आकर
दण्डवत करता है। शरण आना कौन बड़ी बात है? वे तो उसकी कोख से जन्म लेते हैं और फिर प्यार से उसे
आलिंगन देकर उससे आत्मानन्द की सुन्दर माधुरी माँगते हैं। सारांश, भक्ति ज्ञान, वैराग्य और कर्म इन तीनों को
अपनी गोद में खिलाती है और परमानन्द पूर्णरूप से पिला कर उसका स्वयं पालन करती है। मेरी वह भक्ति
साध्य होते ही ज्ञान आदि सेवक बन जाते हैं। इसी से सम्बन्धित निरूपण श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
यत् कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत्।
योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि ॥ ३२ ॥
सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा।
स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथंचिद् यदि वाञ्छति ॥ ३३ ॥
स्वधर्म कर्म करने से जो प्राप्त होता है, प्रखर तप करने से जो साध्य होता है; अथवा सांख्यज्ञान से जो
वस्तु हाथ लगती है; उसी प्रकार विषयत्याग से जो प्राप्त होता है, अष्टांग योग से जो साध्य होता है, वायु, जल,
पान आदि के सेवन से जो फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार वेदाध्ययन से जो मिलता है; सत्य भाषण से जो साध्य
होता है, अनेक साधनों से जो प्राप्त होता है, वह सारा मेरे एक भजन से मिलता है। इतने साधनों के कष्ट सहे
बिना, गिरिकन्दराओं को खोजे बिना, यदि एक मेरी भक्ति साध्य हो जाय तो ये सारे फल स्वयं आपके द्वार पर
खड़े हो जाते हैं। अब उद्धव! तुम कहोगे कि तुम्हारी ऐसी भक्ति कौन सी है? तो ब्रह्मभावना से किया गया गुरु
का भजन, उसी भक्ति का यह पूर्ण प्रताप है। साधकों को गुरुभजन से श्रेष्ठ दूसरा कोई लाभ ही नहीं है। मैं
साक्षात भगवान गुरु की भक्ति करता हूँ। मैं भी सद्गुरु की कृपा से इतनी ऊँचाई तक पहुँचा हूँ। तो सद्गुरु की
इस महानता को कौन-सी उपमा दी जाय? जो कोई गुरु को ही परब्रह्म मानकर अभेद भावना से भक्ति करता है
उन्हें अकस्मात यदि किसी चीज की इच्छा होती है तो मैं उन्हें स्वर्ग, मोक्ष, वैकुण्ठ आदि सब कुछ देता हूँ। यह
कहना भी कम ही है। उनके भजन के प्रेम से मैं मोहित हो जाता हूँ और उनके आगे-पीछे सदा सर्वकाल खड़े
रहकर उनकी रक्षा करता हूँ। लेकिन मेरे भक्त अत्यन्त निःस्पृह होते हैं। वे कभी कुछ माँगे यह सम्भव ही नहीं
है। उनका निरूपण भी मैं तुम्हें अत्यन्त कुशलता से सुनाऊँगा, ध्यान देकर सुनना।
न किंचित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम।
वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ ३४ ॥
बीसवाँ अध्याय ५३९
कुछ भी ग्रहण नहीं करना, ऐसा शुद्ध बोध जिसके मन पर अंकित हो गया, ऐसा जो वास्तविक रूप से
निरपेक्ष रहता है वही मुझे मान्य सच्चा साधु है। जिसमें निरपेक्षता होती है उसी के चरणों का धैर्य वन्दन करता है
जो अधीर होता है उसमें निरपेक्षता रहती ही नहीं है। कोटि-कोटि जन्म लेने के बाद ही यह ज्ञान प्राप्त होता है
और इसके बाद ही निरपेक्षता प्राप्त होती है। निरपेक्षता के अतिरिक्त श्रेष्ठ अन्य कोई साधन है ही नहीं। ऐसी
निरपेक्षता प्राप्त होने पर ही मेरे भजन के प्रति प्रेम उमड़ता है। फिर उसे मेरी चौथी भक्ति, जिसे वेद में
एकान्तभक्ति कहते हैं, साध्य होती है। एकान्तभक्ति की बात सुनो। इसमें भगवान का और भक्त का एकांत होता
है। भक्त भगवान में प्रवेश करता है और भगवान भक्त में सबाह्य प्रवेश करता है। इस प्रकार अभेदभाव का जो
मेरा भजन है, वही 'एकान्तभक्ति' है, जिसमें भक्त को संसार में मुझसे अलग कुछ दिखायी ही नहीं देता। उसे मैं
श्रीकृष्ण चारों पुरुषार्थों के साथ मुक्ति प्रदान करता हूँ। लेकिन वे उन्हें दूर से भी नहीं देखते। फिर हाथ पकड़ने
की बात ही क्यों की जाय ? और ये भी अपने मुख से कुछ माँगे यह कल्पान्त में भी सम्भव नहीं है। मेरी एकान्त
भक्ति छोड़कर मेरे भक्त कभी भी मोक्ष नहीं लेते। मोक्ष न लेने का क्या कारण है ? श्रुतिशास्त्र की भी समझ में न
आने वाला यह दुरूह भाव देवाधिदेव श्रीकृष्ण सारांश स्वरूप में बता रहे हैं।
नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमनल्पकम्।
तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत् ॥ ३५ ॥
जो नितान्त निरपेक्ष रहता है, वह महापुरुष मुझे पूज्य लगता है। उसकी दृष्टि में 'मोक्ष' भूसे की तरह
लगता है। ऐसा नैराश्य त्रैलोक्य में भी धन्य है। निरपेक्षता का महत्त्व सुनो। ऐसे पुरुष को चारों पुरुषार्थ व्यर्थ
मालूम होते हैं। वैकुण्ठ, कैलाश आदि को जो श्रेष्ठ स्थान समझते हैं, वह तो उनका रोज का रास्ता है। निरपेक्ष
पुरुष के पास तो भगवान भी चल कर आते हैं। फिर रिद्धि-सिद्धि की क्या बात है ? साक्षात कलिकाल भी द्वार
के पास खड़ा रहता है। स्वयं महादेव भी उस पर न्योछावर रहता है और मैं भी लक्ष्मी के साथ उसका अंकित
होकर रहता हूँ, यह ध्यान में रखो। मेरा जो निरपेक्ष भक्त है वह मेरी ही तरह समर्थ रहता है। लेकिन यह बात भी
पूर्णरूप से औपचारिक है क्योंकि वह चिद्रूपत्व से सचमुच मैं ही रहता हूँ। मैं परमात्मा परमानन्दस्वरूप हूँ,
इसलिये भक्त भी मेरे भजन से शुद्ध स्वानंदस्वरूप ही बनता हे। दोनों अभेदरूप से स्वानंद कंद तथा सच्चिदानन्द
स्वरूप ही हैं। मेरी भक्ति से सम्पन्न मेरे भक्त गुणदोष नहीं देखते। उसी से सम्बन्धित निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण कर
रहे हैं।
न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः।
साधूनां समचित्तानां बुद्धः परमुपेयुषाम् ॥ ३६ ॥
जो विषमभेद नहीं देखते, जिन्हें समत्त्व का निजबोध हुआ है, उसे ही शुद्ध 'साधु' कहते हैं। उसे ही मेरे
भजन से परमानन्द का लाभ होता है। समस्त प्राणिमात्र में एक मैं 'परमात्मा' ही भरा हुआ हूँ ऐसा जिसे अनुभव
हुआ है उसे 'द्वैत' की प्रतीति नहीं होती। जिसकी ऐसी भजनस्थिति रहती है उसे ही 'एकान्तभक्ति' कहते हैं।
निरन्तर सर्वत्र समभाव रखकर जो एकाग्र मन से मेरे भजन में अत्यन्त तत्पर रहते हैं, वे प्रकृति के परे जाकर
सचमुच मत्स्वरूप होते हैं। इस प्रकार जो मद्भाव से परिपूर्ण रहते हैं वे गुणदोष नहीं देखते। मैंने अपना यह
लक्षण तुम्हें पहले ही बता दिया है, उद्धव ! यदि शर्करा की खाल उतारी जा सके, कर्पूर का छिलका उतर सके,
रत्नों के तेज का यदि काजल बन सके, तभी मेरे भक्त सृष्टि में गुणदोष देखेंगे। जिससे अवगुण लिया जाय वह
५४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अवगुण भी मुख्य रूप से मैं ही हूँ और जिसका गुण लिया जाय वह मद्रूप ही हूँ। इस प्रकार भक्त शिरोमणि
मत्स्वरूप से ही सारी सृष्टि को देखता है। गुणदोष उसे कहीं दिखायी ही नहीं देते। गुणदोष न देखे जाएँ यही
सभी साधनों में प्रमुख साधन है। इससे सम्बन्धित निरूपण आदरपूर्वक श्रीकृष्ण सुना रहे हैं।
एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः।
क्षेमं विदन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः ॥ ३७॥
उद्धव ! इस प्रकार मैंने वेदवाणी से स्वयं भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग के द्वारा लोगों को उपदेश दिया है। कर्म
से ही कर्म को नष्ट किया जाय, यही कर्मयोग का रहस्य है और स्वधर्म कर्म से मेरी प्राप्ति होती है यह भी मैं
तुम्हें बता चुका हूँ। उसी प्रकार नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका विचार कर जो अनित्य है उसे समाप्त
करना ज्ञानयोगी का लक्षण है यह सब भी मैंने तुम्हें बतलाया। उसी प्रकार मेरी भक्ति करने से सारे फल पैरों पर
आकर गिरते हैं और भक्तों ने अनायास मेरी प्राप्ति होती है यह भी मैंने तुम्हें बताया। अधिकार भेद के अनुसार
त्रिकाण्ड के तीन प्रकार के वेदमार्ग भी मुझे प्राप्त करने के उत्तम साधन हैं। इसलिये वह भाग भी मैंने तुम्हें स्पष्ट
करके बतलाया। मैंने बताये वेदमार्ग का जो अनुष्ठान करेगा, उसे उसकी रुचि के अनुसार सगुण अथवा निर्गुण
स्वरूप की प्राप्ति होती है। इसमें जो सगुण साक्षात्कार होता है वह पंचरात्रागम का मत है। वे लोग वैकुण्ठ को
ही प्रमुख मानते हैं। यह उनका निश्चित मत है। सात आवरणों के बाहर और मायावरण के भीतर श्रीहरि ने
वैकुण्ठ की रचना की है, ऐसा वेदान्त में कहा गया है। उसमें आगमशास्त्र के मतानुसार 'माया' भगवान की
लीला है ऐसा कहा जाता है। भगवान ने अपनी लीला से वैकुण्ठ की रचना की है इसलिये उसका नाश नहीं है
जहाँ लीला मात्र से इच्छित देह धारण कर मेघकांतियुक्त साक्षात पुरुषोत्तम रहते हैं, वहाँ गुण, काल कर्म अथवा
माया आदि का भ्रम नहीं रहता। इस प्रकार जन्म और मरणरहित वैकुण्ठ अक्षयी और नित्य ही रहता है। उद्धव !
जो वहाँ पहुँचते हैं वे नित्यमुक्त होते हैं, ऐसा आगम का मत है। उद्धव ! मंत्रों के योग से अपने आराध्य देवता को
प्रसन्न किया जा सकता है ऐसा वेद विद्वानों का कथन है। वह भी तुम्हें प्रसंगानुसार बता दिया। उसी प्रकार हे
उद्धव ! भावार्थ भक्ति ही प्रसन्नता की पहचान है, यह मैंने तुम्हें पहले अच्छी तरह बता ही दिया है। लेकिन
वेदान्त शास्त्रों का इस सम्बन्ध में यह मत है कि प्रचण्ड प्रलय का आघात वैकुण्ठ कैलासादि सारे लोकों को
अर्थात् जितने साकार है उन सबको नष्ट कर देता है। उस समय जितना कुछ गुणातीत रहता है, वही शेष रहता
है। उद्धव ! वही वास्तव में सदा, सर्वकाल नित्य रहने वाला 'पूर्णब्रह्म' है। जहाँ काल भी नहीं है और कर्म भी
नहीं है, जहाँ गुण भी नहीं है और धर्म भी नहीं है, माया भी जहाँ विश्राम करती है, उद्धव ! वही परब्रह्म है। मेरा
स्थान वैकुण्ठ है; वहाँ 'सगुण-सायुज्य' का लाभ होता है; किन्तु निरन्तर परिपूर्ण ब्रह्म यही 'पूर्ण सायुज्यता' है।
ऐसा पूर्ण परब्रह्मस्वरूप प्राप्त करने के लिये साधकों को सुरक्षित मार्ग कौन-सा है ? तो वेदों में बतायी गयी मेरी
भक्ति यही सबसे सुगम और उत्तम मार्ग है। दूसरे मार्ग से जाने पर कामलोभ आदि विघ्न आते हैं अथवा
ज्ञानाभिमान गड्ढे में गिर जाता है और वेदोक्त कर्मत्याग का दोष अवश्य ही अपने पल्ले पड़ता है। ऐसा
भक्तिमार्ग में नहीं है। उसमें नवविधाभक्तिरूप नौ साथी साथ में रहते हैं। मद्भावयुक्त भक्ति के कारण हर पग पर
विश्राम मिलता है। इसमें मुख्य साधन यही है कि प्राण जाने पर भी गुणदोष न देखें। उसी समय परिपूर्ण ब्रह्म की
प्राप्ति होती है। जहाँ भय, भ्रान्ति आदि कुछ भी नहीं है; जहाँ दिन और रात नहीं है, जहाँ जीव और शिव का भेद
नहीं है; उसी ब्रह्म को मेरे भक्त प्राप्त करते हैं। जहाँ रूप नहीं है, नाम नहीं है, जहाँ काल नहीं है, कर्म नहीं है;
बीसवाँ अध्याय ५४१
जहाँ जन्म नहीं है और मरण भी नहीं है, उस परब्रह्म तक वे पहुँचते हैं। जहाँ ध्येय नहीं, ध्यान नहीं, जहाँ ज्ञेय
नहीं है, ज्ञान नहीं है; जहाँ 'मैं' और 'तू' का वाद नहीं है उसी परिपूर्ण ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। जिसे माँ नहीं
और बाप भी नहीं; जो देव भी नहीं है और देवता भी नहीं है; जो एक भी नहीं है और अनेक भी नहीं है, उस
परब्रह्म तक ही वे सचमुच पहुँचते हैं। जिसमें वर्ण नहीं है और आश्रम भी नहीं है; जिसमें क्रिया नहीं है और
कर्म भी नहीं है और जिसमें माया का भ्रम भी नहीं है; उस ब्रह्म तक वे पहुँचते हैं। जो गुण-अवगुण से परे होता
है; जो लक्ष्यलक्षण रहित होता; जो सदा-स्वानंद से परिपूर्ण रहता है वह ब्रह्म मेरे भक्तों को प्राप्त होता है उद्धव !
पूर्ण कृपा को वह ज्वार मैं देवाधिदेव नहीं सँवार सका। तभी यह एकादश स्कन्ध का विश्राम मैंने तुम्हें दिया है।
उद्धव ! जहाँ अहंभाव का नाश होता है; माया शून्य हो जाती है, वहीं एकादश स्कन्ध का विश्राम मैंने तुम्हें दिया
है। जहाँ देवभक्तों का पूर्णरूप से मिश्रण हो जाता है वह एकादशस्कंध का यह विश्राम मैंने तुम्हें दिया है। स्वानंद
यदि प्राप्त करना है तो वह कष्ट सहकर प्राप्त करना होता है। उस स्वानंद की तैयार निधि मैंने एकादश स्कन्ध के
रूप में तुम्हें सौंपी है। इस प्रकार स्वानंद निर्भर होकर श्रीकृष्ण ने बीसवें अध्याय की कथा उद्धव को
आनन्दपूर्वक सुनायी। अब स्वानंद सुख की बाढ़ जो इक्कीसवाँ अध्याय है, वह तुम्हें सुनाता हूँ। वेदों में वर्णित
शुद्ध-अशुद्ध का लक्षण यही अगले अध्याय का निरूपण है। इसलिये एकाजनार्दन विनती करता है कि श्रोतागण
मेरी ओर ध्यान दें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे भगवदुद्धव संवादे
एकाकार टीकायां वेदत्रयी विभाग योगनाम विंशति तमोध्यायः ॥ २०॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
इक्कीसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु! हे वैकुण्ठनाथ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम सदासर्वदा स्वानंद वैकुण्ठ में ही वास
करते हो! हे अनंत! हे अव्यय! तुम्हारे सच्चे ऐश्वर्य का अंत ही नहीं लगता। तुम्हारा निजबोध का गरुड़ तुम्हारे
सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। उसके पंख हिलाने भर से प्रचण्ड भववृक्ष भरभराकर गिर पड़ता है। तुम्हारे
हाथ का स्वानुभाव का चक्र प्रखर तेज से लपलपाता रहता है, उसे अभेद भावना की धार लगी हुई है। इसलिये
उसकी मार अत्यन्त प्रचण्ड होती है। तुम्हारा पाञ्चजन्य तो कितना अगाध है। वह निःशब्द में भी भयंकर शब्द
उत्पन्न करता है। वेदवाणी से शुद्ध गर्जना करता रहता है। वही तुम्हारा प्रसिद्ध शंख है। सदासर्वदा आत्मतेज से
चमकने वाली गदा तुम्हारे हाथ में सर्वकाल शोभा देती रहती है। तुम्हारी वह गदा इतनी प्रबल है कि अभिमान
को कुचल देती है। देखने में अत्यन्त मनोहर, जिसे देखते ही आनन्द में उबाल आ जाता है और जिससे
परमानन्दरूपी सुगन्ध निकलती रहती है ऐसा लीला कमल तुम हाथ में उछालते रहते हो। समसमान रहने वाले
जीव और शिव इन दोनों को जय और विजय ये नाम देकर उन्हें द्वार की सुरक्षा के लिए रखा गया है। उसी
प्रकार तुम्हारी अवियोगिनी सुकुमार निजशक्ति अत्यन्त सुन्दर लक्ष्मी रूप में आदर के साथ तुम्हारी चरण सेवा
करती रहती है। तुम्हारे लोक में रहने वाले जितने भी जन हैं वे सब तुम्हारी ही तरह हैं। वहाँ न मानापमान है,
न देहाभिमान है। वहाँ काल का भी प्रवेश नहीं है; कर्म की कुछ नहीं चलती है; वहाँ क्षुधा-तृषा का अंत होता
है; वहाँ तुम्हारे भक्त निजानंद से सदा तृप्त रहते हैं। तुम्हारे कृपाकटाक्ष के कारण अलक्ष्य वस्तु भी बिना ध्यान
किये ध्यान में आ जाती है। तुम्हारे चरण सेवा की अपेक्षा से तुम भक्तों का निरपेक्षता से आचरण कराते हो।
समता के सिंहासन पर एकता की गद्दी बिछी रहती है। उस पर तुम्हारा पूर्णता का स्वाभाविक सहजासन रहता
है। तन्मयता का छत्र, सन्तोष का छत्र, तथा ज्ञान-विज्ञान ये दो चँवर सदा तुम पर झलते रहते हैं। वहाँ चार वेद
तुम्हारे चारण हैं। वे जोर-जोर से तुम्हारी कीर्ति का बखान करते हैं और अठारह पुराण ये बंदी भार के रूप में
तुम्हारी उत्तम वंशावली का वर्णन करते हैं। वहाँ तुम्हारी सभा में छः जन (षट्शास्त्र) वाद-विवाद करते तथा
उपमाओं की रचना करते रहते हैं। युक्तिपूर्वक अपने विचारों का खण्डन-मण्डन कर अपने ज्ञान का प्रदर्शन
करते रहते हैं। कोई भावार्थी बिना कुछ बोले ही तुम्हारी स्तुति करते हैं। ऐसी स्तुति से संतुष्ट होकर तुम उन्हें
अपने पद पर बिठाते हो। तुम ऐसे सद्गुरु महाविष्णु हो, जो चिद्रूप से सम और सहिष्णु है। जो तेज से
देदीप्यमान है, वही जन में एकरूप जनार्दन है। जन में एक जनार्दन ही भरा हुआ है। उसमें एकरूप से
एकनाथ एकरूप हो गया। इसलिये उसने एकपन को भी ग्रस लिया। ऐसा महाबोध उसे प्राप्त हुआ। उस
महाबोध का अंजन हाथ के बिना ही आँखों में डाल देते हैं। इससे पूरे शरीर में ही आँखें फूट निकलती हैं और
दृष्टि सर्वव्यापक हो जाती है। लेकिन सर्वत्र जन को देखने पर वहाँ एक जनार्दन ही दिखायी देता है। ऐसी
परिपूर्ण कृपा कर उसने एकपन भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार भगवान ने प्रसन्न होकर मेरे हाथों से
श्रीमद्भागवत का अर्थ यथार्थ रीति से करवाया और वह भी देशी भाषा में। श्रीमद्भागवत पर संस्कृत में अनेक
टीकायें हैं, फिर भी उन्हें इसमें न जाने क्या बात अच्छी लगी कि उन्होंने प्राकृत और सुगम अर्थ करवाया। मेरा
कर्तृत्त्व और अकर्तृत्त्व उस जनार्दन ने छीन लिया। अब ग्रंथार्थ के निरूपण की बातें भी वही कर रहा है। उसने
इक्कीसवाँ अध्याय ५४३
अपने गौरव के लिये प्रेमादर से वेद के विभाग जिसमें बताये वह एकादश स्कंध का बीसवाँ अध्याय उद्धव को
उत्तम रीति से बताया। इससे भक्त और ज्ञानी इन दोनों को वेदार्थ की पहचान हुई; लेकिन कर्मठ ये गुण दोष
देखने के कारण सन्देह में पड़ गये। उस सन्देह का निवारण करने के लिये इक्कीसवें अध्याय का निरूपण कर
गुणदोषों का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। गुणदोषों का प्रकार बताकर श्रीकृष्ण विषय का त्याग करने के
लिये विस्तृत उपायों का निरूपण कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
य एतान्मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान् ।
क्षुद्रान्कामांश्चलैः प्राणैर्जुषन्तःसंसरन्ति ते॥१॥
भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग ये तीन विभाग जो मैंने बताये, वे शुद्ध वेदमार्ग हैं। उन्हें छोड़कर जो भी लोग
विषयसुख की इच्छा करते हैं, देह का सम्बन्ध क्षणभंगुर है यह पूरी तरह भूल कर सांसारिक तथा स्वर्ग के
सुखोपभोग प्राप्त करने के लिये लोभी सकाम कर्म की जल्दीबाजी करते हैं। चंचल प्राण की संगत से काल देह
को ग्रसता ही रहता है। ऐसा होते हुए मूर्ख लोग इस लोक के अनेक प्रकार के विषयोपभोगों में तथा उसके
प्रयासों में ही सुख मानते हैं। कामभोगों का भोग करते समय काल जीवन को ग्रसता रहता है यह समझ ही नहीं
पाते; जन्म-मरण के फेरे में दुःख के आवेग सहते रहते हैं। काम्यकर्म और नित्यकर्म आचरण करते समय एक
जैसे लगते हैं, फिर उनके फल में उसका विषमत्त्व अर्थात् अच्छे और बुरे परिणाम क्यों होते हैं? तो यह
कर्मवैचित्र्य की बात संकल्प के कारण ही होती है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।
विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्चयः ॥२॥
वैसे विचार किया जाय तो सारे कर्म एक जैसे ही हैं। लेकिन उनके अधिकार भिन्न-भिन्न होते हैं। उनके
ही कारण सुख और दुःख भोगना पड़ता है। भोजन करना मुँह का काम है वह यदि नाक से करने लगे तो सुख
के स्थान पर भयंकर दुःख का सामना करना पड़ेगा। पैरों से चलने का काम यदि सिर से करें तो रास्ता तो
कटेगा नहीं लेकिन अनेक कष्ट भोगने पड़ेंगे। उसी प्रकार अधिकार के अनुसार जो कर्म निश्चय ही सुखमय है,
वही कर्म अनधिकार से करने पर दुःसह-दुःख भोगना पड़ेगा। हाथी के हौदे से गधे का गौरव नहीं बढ़ेगा, वह
तो उसके बोझ से मर ही जायेगा। उसी प्रकार अनधिकार किये हुए कर्म की गति है। मेघ निर्मल जल की ही
वृष्टि करता है, लेकिन जिस प्रकार बिजली कड़कती है उसी प्रकार फल मिलता है। किसी प्रदेश में केवल
भाँग तैयार होती है, तो दूसरे प्रदेश में केले उत्पन्न होते हैं। दूध कितना ही उत्तम क्यों न हो वह ज्वर के रोगी
को कड़वा लगेगा लेकिन स्वस्थ व्यक्ति को मधुर लगेगा और पीने से स्वास्थ्य बनता है। उसी प्रकार इच्छा
रखकर किया हुआ कर्म अत्यन्त बाधक सिद्ध होता है। वही कर्म निष्काम बुद्धि से करने पर मोक्षप्राप्ति का
साधन बनता है। अपने अधिकार के अनुसार कर्माचरण करना यही यहाँ पर प्रमुख गुण है और अनधिकार
किया हुआ कर्म यहाँ अवगुण अर्थात् महादोष है। इस प्रकार कर्माचरण गुण और दोष उत्पन्न करता है और
शास्त्र के ज्ञाता इसी गुणदोष का लक्षण बताते हैं। यही गुणदोष लक्षण शुद्ध-अशुद्ध का कारण है। इसी अर्थ का
निवेदन भगवान करते हैं।
५४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शुद्धयशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।
द्रव्यस्य विचिकित्सार्थंगुणदोषौ शुभाशुभौ ॥ ३ ॥
पंचमहाभूत एक समान हैं। उसी प्रकार परब्रह्म भी सर्वत्र समसमान ही है। वहाँ गुणदोष मिथ्या है। लेकिन
वे उपर्युक्त उद्देश्य से ही प्रमाणभूत हुए हैं। श्रुति या स्मृति के बताने से पहले सभी प्राणियों में आविद्यक विषय
प्रवृत्ति स्वाभाविक ही रहती है। ऐसी विषयवासना प्राकृतिक होने के कारण, उसकी निवृत्ति के लिये ही अनेक
प्रकार के गुणदोष बताये गये हैं। विषय की बाधा दूर करने के लिये एक शुद्ध और एक अशुद्ध, उधर का शुभ
और इधर का अशुभ, यह वेदवाणी के रूप में मैंने ही बता दिया है। विषयों की निवृत्ति की स्तुति वेदरूप में मैंने
ही की है। मन में घृणा उत्पन्न करने के लिये विषय वृत्ति की निन्दा भी मैंने ही की है। कर्म प्रवृत्ति चलते समय
विषयों की निवृत्ति होती रहे ऐसा उपाय मैंने वेद के द्वारा कर रखा है वही तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।
दर्शितोऽयं मयाऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम् ॥ ४ ॥
उद्धव ! तुम सचमुच ही निष्पाप हो इसलिये तुम्हारी बुद्धि भी शुद्ध है। इसलिये धर्मादि व्यवहार सिद्धि या
विधि भी तुम्हें बताता हूँ। धर्माचरण करते समय भी प्रवृत्ति धर्म अप्रमाण है। निवृत्ति धर्म ही अत्यन्त शुद्ध है।
यही स्वधर्म के गुणदोष हैं। विषय की आसक्ति से जो भी व्यवहार किया जाता है, वह अशुद्ध ही है और
उपकार की दृष्टि जो व्यवहार करे वह देवताओं को तथा मनुष्यों को भी वंद्य होता है। अदृष्टदाता ईश्वर है,
यह बात बड़े-बड़े पुरुष भी भूल जाते हैं और नीचों के द्वार-द्वार घूमते हैं। वह अमंगल यात्रा है किन्तु स्वयं
आलस त्याग कर कीर्तन आदि का श्रवण करना अथवा तीर्थयात्रा करना साधुओं का दर्शन करना, अथवा पूजा
के लिये मन्दिर जाना अथवा अनाथ का दाहसंस्कार करना आदि से अगणित पुण्य का लाभ होता है। इतना ही
नहीं बल्कि इससे पग-पग पर कोटि-कोटि यज्ञों का फल उत्पन्न होता है। जिसके योग से संसार पार किया जा
सके उसी का नाम है पवित्र यात्रा। यही वेद में बताये अनुसार यात्रा पर जाना और यही गुणदोषों का विचार
है। राजा अपने जूते ब्राह्मण के सिर पर रखे तो उसका दोष ब्राह्मण को नहीं लगता बल्कि राजा स्वयं ही दोषी
होता है। उसी प्रकार आपातकाल आने पर यदि उपवास करने पड़े तो नीच का अनाज लेकर प्राण बचाने में
कोई दोष नहीं है। लेकिन यदि वही नीच का दान आपातकाल न होने की स्थिति में लिया जाय तो महादोष
लगता है। यह भी वेद में हीं बताया गया है। प्रसिद्ध मनु-पराशर आदि शुद्ध कर्मधर्म प्रवर्तकों ने अनेक प्रकार
से गुणदोष और शुद्ध-अशुद्ध की चर्चा की है। वही गुणदोषों के विभाग और शुद्धाशुद्ध विषय सम्बन्धी निरूपण
स्वतः नारायण तीन श्लोकों में कर रहे हैं।
भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातवः।
आब्रह्मस्थावरादीनां शारीराआत्मसंयुताः ॥ ५ ॥
वेदेन नामरूपाणि विषमाणिसमेष्वपि।
धातूषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये ॥ ६ ॥
ब्रह्मदेव से लेकर स्थावरजंगम तक सभी प्राणियों में पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश ये पंचमहाभूत
समसमान ही हैं। जिसे नाम और रूप नहीं है, गुण नहीं है और कर्म भी नहीं है, ऐसे सम ब्रह्म के लिये मेरे वेद
इक्कीसवाँ अध्याय ५४५
ने लोकल्याण के लिये नामरूप के भेद बना रखे हैं। नीचे पृथ्वी और ऊपर आकाश ये दोनों एक से दिखाई देते हैं
किन्तु विभिन्न देशों में जाने में सुविधा हो इसलिये दस दिशाओं की कल्पना की गयी है। उसके अनुसार नाम,
रूप और वर्णाश्रम यह मेरे वेद ने सम और विषम जो उत्पन्न कर रखा है, वह स्वधर्म कर्म की सिद्धि के ही लिये
है। इसी द्वार से मैंने पुरुषों के हित के लिये उत्तम लक्षणों से युक्त धर्मार्थकाम मोक्ष साधनों के नियम अथवा
नियंत्रण वेदाज्ञा के रूप में किया है। रूप, नाम, आश्रम, वर्ण इनके सम्बन्ध में यदि नियम नहीं बनाये गये होते तो
व्यवहार चल ही न पाता। फिर मोक्षसाधन कैसे होता ? इस प्रकार वेद ने व्यवहार चला कर उसी में परमार्थ
विचारों का चमत्कार भी दिखा दिया है, लेकिन जो भाग्यवान होगा उसी को वह दिखायी देगा। कर्म पर यदि
अधिक जोर दिया जाय तो पुरुष कर्मठ होकर रह जायेगा, उससे परमार्थ सिद्ध नहीं होगा; उलटे उसे विधिनिषेध
का कष्ट भोगना पड़ेगा और यदि स्वधर्म कर्म को बिलकुल छोड़ दिया जाय तो पाखण्ड अपना प्रभाव दिखाएगा।
इससे मोक्ष हाथ न लगकर अपने हितों की ही हानि होगी। इसलिये स्वधर्म का आचरण करते समय, लगे हाथ
मोक्षलाभ भी प्राप्त हो ऐसी वेदार्थ की योग्यता जिसकी समझ में आयेगी, वही ज्ञाता बुद्धिमान है। लेकिन यह वेद
के अर्थ रहस्य सहसा किसी के हाथ नहीं लगता। इसीलिये परमार्थ मार्ग दिखलाने वाला गुरु चाहिये। उस
सद्गुरु की पूर्ण कृपा होगी तो वेद का रहस्य हाथ लगेगा। गुरुकृपा के बिना आप जो भी साधन करें वे सब
साधकों का अहित ही करते हैं। इसलिये मेरा वेद संसार का गुरु है। उसने वस्तुतः व्यवहार दिखाया है, जन-जन
का उद्धार करने के लिये स्वधर्म कर्म को नियमबद्ध किया है। इस प्रकार मेरा वेद जनहितकारी है। वह नाना
प्रकार के गुण-दोष दिखाकर लोगों को विषयों से बाहर निकालता है। इस प्रकार वेद सारे संसार का उपकारी है।
देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।
गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम् ॥ ७॥
उद्धव भक्तों में अत्युत्तम तथा साधु लक्षणों के अनुसार साधु की ही तरह होने के कारण श्रीकृष्ण उसे
अत्यन्त प्रेम से 'सत्तम' अर्थात् साधुश्रेष्ठ कहकर बुलाने लगे। उद्धव! इस संसार में चाहे जो मनुष्य, मनचाहा
कर्माचरण न करे इसलिये वेदों ने वर्णाश्रम का नियम बना दिया है। जहाँ कर्मतंत्र नहीं करना चाहिये ऐसे
अपवित्र देश, अपवित्र काल और वस्तु की पवित्रता-अपवित्रतता का विचार भी तुम्हें सुनाऊँगा।
अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत् ।
कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीटासंस्कृतेरिणम् ॥ ८ ॥
पृथ्वी पर किसी स्थान पर मेघवृष्टि नहीं होती लेकिन वहाँ के खेत हरे-भरे दिखायी देते हैं। उस जमीन
को 'तराई' कहते हैं। उसी पृथ्वी पर कहीं पथरीली जमीन रहती है वहाँ मूसलाधार पानी बरसने पर भी उस
जमीन में अंकुर नहीं फूटता। उसी प्रकार देश की शुद्धि-अशुद्धि के सम्बन्ध में भी तुम्हें सविस्तार बताता हूँ। जहाँ
कर्म से कार्यसिद्धि नहीं होती, वहाँ कर्म बिलकुल नहीं करना चाहिये। जहाँ कृष्णमृग नहीं होता उस भूमि को
अपवित्र समझना चाहिये। वहाँ कभी भी कर्म करने का प्रयास नहीं करना चाहिये। उसी प्रकार जहाँ ब्राह्मण न हो
वह देश अपवित्र है अथवा जहाँ निषिद्ध कर्म करने वाले ब्राह्मण हों वह भूमि भी अपवित्र है। उसी प्रकार जहाँ
ब्राह्मणों के प्रति भक्ति नहीं है, बल्कि उनकी निन्दा कर उनकी अवहेलना भी करते हैं वह देश भी कर्म करने के
लिये सचमुच अपवित्र है, यह ध्यान में रखो। किसी देश में कृष्णमृग रहते हैं, किन्तु भगवद्भक्ति नहीं होती, वह
देश भी कर्म के लिये निश्चित रूप से अपवित्र है यह जान लो। कीकट, कलिंग और मागध ये देश भक्तिहीन
५४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रसिद्ध हैं। वे देश अशुद्ध होने के कारण वहाँ भी शुद्ध स्वधर्म नहीं होता। जहाँ उपलेप समार्जन न होता तो हो
ऐसे घर की जमीन को भी अशुद्ध ही समझना चाहिये; अथवा जहाँ वेद बाह्य दुर्जन हों, वह भी स्थान अपवित्र
है। जो जमीन पथरीली होती है, वह भी सदा पथरीली हो होती है। अब काल के तंत्र की पवित्रता-अपवित्रता के
बारे में बताता हूँ।
कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा।
यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मकः स्मृतः ॥ ९॥
जिस काल में देश, काल, द्रव्य और पात्र ये सामग्री सुलभता से मिले वही काल अत्यन्त पवित्र है तथा
शास्त्र सम्मत है। ग्रहण, कपिलाष्टि आदि पर्वों के रूप में जो काल आता है वह परम पवित्र है। उसी प्रकार
जब संतजन घर आयें उस काल को अत्यन्त पवित्र समझना चाहिये अथवा अकस्मात संपत्ति प्राप्त हो जाय या
मन में धर्म करने का विचार आ जाय तो उस काल को वेद 'पुण्यकाल' के रूप में स्वीकार करते हैं। सच्चा पल
काल पुरुष को जन्म में एक ही बार प्राप्त होता है। वह है माता-पिता का अंतराल। धर्म का वह अत्यन्त पवित्र
काल समझना चाहिये। ऐसे समय श्रद्धापूर्वक धर्म करने से अक्षय पवित्रता प्राप्त होती है। अब तुम्हें काल की
स्वाभाविक पवित्रता के बारे में बताता हूँ। वह काल सभी दृष्टियों से उपकारी तथा साधक के निज स्वार्थ को
साधनेवाला है। सचमुच 'ब्राह्म मुहूर्त' अर्थात् सूर्योदयसे पूर्व पाँच घटिकाएँ, यह काल स्वाभाविक रूप से पवित्र
है; वह काल साधक के हित का होता है और दिन पर दिन उसके हित की वृद्धि ही करता है। अब कर्म के लिये
अयोग्य काल भी बताता हूँ। ऐसे समय स्वाभाविक तौर पर ही कर्म नहीं करना चाहिये क्योंकि वह काल निषिद्ध
होने के कारण कर्म करने में महादोष लगता है। जिस स्थान पर कल न हो, स्थल अथवा विहीत धन उपलब्ध न
हो, वह काल सचमुच कर्म करने के लिये योग्य नहीं है, यह ध्यान में रखो। जिस काल में सूतक लगा हो अथवा
राष्ट्र पर संकट आया हो अथवा जिस समय देह परतंत्र हो गया हो, वह काल भी कर्म करने योग्य नहीं है ऐसा
बताया गया है। जिस काल में सूखा पड़ा हो, ज्वर का जोर चल रहा हो वह काल दूषित हो जाता है, जिस काल
में चोरों का बोलबाला हो, वह काल भी कर्म करने के लिये योग्य नहीं है। जिस समय गुस्सा आया हो, अथवा
तमोगुण उफान पर हो, निद्रा और आलस्य ने कब्जा जमा रखा हो, वह काल भी कर्म करने के लिये योग्य नहीं
है। अकस्मात सुख सम्पदा प्राप्त हुई हो अथवा कभी न सुनी हुई बात सुनने में आयी हो अथवा सज्जनों की
मर्यादा भंग हुई हो, तो वह काल कर्म करने योग्य कभी नहीं है। राह चलते समय यदि कोई संकट आ जाये और
प्राणों पर आ जाय तो वह काल भी कर्म करने योग्य नहीं है। जिस समय धन की लालसा प्रबल हो उठती है,
जिस समय प्राणों की अत्यधिक चिन्ता लगी रहती है, मन जब विकल्प से भर जाता है उस समय भी कर्म करना
उचित नहीं है। इस प्रकार कर्म करने के लिये कौन-सा काल अनुचित है यह तुम्हें अच्छी तरह बता दिया। अब
धन की शुद्धता अशुद्धता का भी विस्तार से वर्णन करता हूँ।
द्रव्यस्य शुद्ध्यशुद्धी च द्रव्येध वचनेन च।
संस्कारेणाथ कालेन महत्त्वाल्पतयाथवा ॥ १०॥
पुरुष गोमूत्र प्राशन करे तो उसमें तत्काल पवित्रता आती है, लेकिन वही ताँबे के बर्तन में लेने से
अपवित्रता आती है। पुरुष जलप्रोक्षण करे तो फूलों को पवित्रता आती है। अग्नि की सेवा करने से ब्राह्मण को
पवित्रता आती है लेकिन वही ब्राह्मण यदि अग्नि से जलता है तो अग्नि अपवित्र हो जाती है। दर्भ पर पिण्ड
रखने से वह पवित्र होता है लेकिन पिण्ड का स्पर्श होने से दर्भ अपवित्र हो जाता है। श्रुति के अनुसार धर्मशास्त्र
वस्तु की शुद्धि-अशुद्धि इस प्रकार बताता है जो वस्तु संदेहास्पद रहती है उसकी शुद्धि के लिये ब्राह्मण वचन
पर्याप्त रहता है क्योंकि ब्राह्मण वचन हरिहर को भी मान्य है। घृत के संस्कार से अन्न शुद्ध होता है; होम के
संस्कार से नवधान्य शुद्ध होता है; और अग्नि के संस्कार से नमक शुद्ध होता है ऐसा शास्त्र कहते हैं। 'रा' अक्षर
के आगे 'म' जोड़कर उच्चार करने से पातकों का भार कम होकर वह पुरुष शुद्धात्म हो जाता है। उसी 'म'कार
के आगे 'ध्य' अक्षर लगाने से और उसका उच्चार करने से घोर पाप सिर पर लगता है और उससे वह पुरुष
बन्धन में पड़ जाता है। रजस्वला चौथे दिन शुद्ध होती है, मेघोदक चौथे दिन शुद्ध होता है। वृद्धि अथवा सूतक
दस दिन के बाद निवृत्त होता है। इसी रीति से काल की शुद्धता है। पिछले दिन का अन्न अगले दिन दूषित होता
है और जिसमें बासीपन आ गया, वह अन्न भी अशुद्ध रहता है। लेकिन घी में तली हुई चीज की बात वैसी नहीं
है। वह बहुत दिन तक शुद्ध रहता है। जिसमें खटास आ जाती है, वह तत्काल ही अपवित्र होता है। एकत्र किये
हुए पानी को यदि चांडाल स्पर्श करे तो वह बिलकुल अपवित्र हो जाता है। उसे बिलकुल स्पर्श नहीं करना
चाहिये। लेकिन वही पानी यदि सोते के जलाशय का हो, तो चांडाल के स्पर्श से वह अपवित्र नहीं होता। वह
नित्य निर्मल और पवित्र ही रहता है। थोड़ा खाना बना हो और उसे कुत्ता और कौआ छू ले तो पूरा खाना ही
फेंक देना चाहिये, क्योंकि वह अन्न अपवित्र होता है। यदि वही खाना सहस्र भोजन का हो तो जितने भाग में
कुत्ता या कौआ स्पर्श किया हो और जिस-जिस स्थानपर उसका मुँह लगा हो उतना भाग निकाल कर फेंक दिया
जाना चाहिये। शेष अन्न को ग्रहण करने में दोष नहीं है।
शक्त्याशक्त्याथवा बुद्ध्या समृद्ध्या च यदात्मने।
अघं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारतः ॥ ११॥
चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण लगने पर स्वस्थ आदमी स्नान न करे तो उसे दोष लगता है; किन्तु बालक,
वृद्ध और रोगी यदि स्नान न करे तो उसे कोई दोष नहीं है। पुत्र जन्म पर, जितने भाई उन सबको दस दिन का
अशौच अवश्य है। किन्तु दूसरे देश में रहने पर यदि अशौच बाधा समाप्त होने के बाद पुत्र जन्म का समाचार
मिले तो अशौच पालने की आवश्यकता नहीं है। बीते दिन यदि किसी के भाई की मृत्यु होती है तो उसके
गोत्रजों को सूतक लगता है। लेकिन अगले दिन अगर कोई और मरता है तो पहले सूतक में ही दूसरा सूतक मिट
जाता है। जिसने विष लिया हो वह यदि साँप से कटवा ले तो उसके विष से पहला विष समाप्त हो जाता है।
उसी प्रकार सूतक से ही सूतक नष्ट होता है। हम जानकर जो पाप या पुण्य करते हैं, उसका फल भोगना ही
पड़ता है। लेकिन बुद्धि को जिसका पता नहीं होता, वह अनजाने में होने के कारण वह बाधक नहीं होता। हमारे
अंतःकरण को आत्मज्ञान पवित्र करता है, यही विवेकयुक्त वैराग्य की 'बुद्धि की शुद्धि' है। जो धनी है उसके
लिये पुराना वस्त्र परिधान करना अपवित्र है। सीया हुआ कपड़ा भी उसके लिये अपवित्र है। किन्तु गरीब के
लिये वही अत्यन्त पवित्र है। वेद का रहस्य अत्यन्त गहन है। स्मृतिकारों ने उसे विशद कर दिया है। भोजन में
किसी को साथ न लेना धनी आदमी के लिये अशुद्ध अन्न है लेकिन गरीब के लिये अकेले बैठ कर भोजन करना
अत्यन्त पवित्र है ऐसा वेद ने ही कहा है। पंचमहायज्ञ किये बिना अन्न ग्रहण करना पाप भक्षण करने जैसा है।
अतिथि को विन्मुख भेज दिया जाय तो सारे पुण्य पर पानी फिर जाता है। अपने गाँव में रहने पर सारे आचार
करें, दूसरे देश में जाने पर केवल आधे का ही निर्वाह करें। किसी शहर में या नगर में जाने पर केवल एक