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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 869 में से

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पृष्ठ 564

५४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चौथाई आचारों का ही पालन करें और मार्ग में साथियों के अनुसार कर्म करें। देशकाल और परिस्थिति का
विचार करके ही यह मर्यादा धर्मशास्त्र ने लगा रखी है। इससे भिन्न आचरण करने पर कर्ता को सर्वथा दोष ही
लगेगा। शरीर में कर्म करने का सामर्थ्य होते हुए जो कर्म नहीं करता उसे बहुत बड़ा दोष लगता है, उसी प्रकार
शरीर रोग से ग्रस्त है तिस पर भी कर्म करने वाला दोषी होता है। अब तक वस्तुओं की शुद्धि और अशुद्धि की
विधियों के बारे में बतलाया। उसी का प्रतिपादन पुनः वेदोक्त धर्मशास्त्र के अनुसार करते हैं।
धान्यदार्वस्थिततन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।
कालवाय्वग्निमृत्तोयैः पार्थिवानां युतायुतैः॥१२॥
शूद्र ने दान किया हुआ अन्न एक रात्रि में शुद्ध होता है। स्त्रुक, स्त्रुवा आदि जो लकड़ी के पात्र हैं, वे
पानी से धोने पर शुद्ध हो जाते हैं। बाघ के नख और हस्तिदंत जब तक गीले हैं, तब तक अशुद्ध रहते हैं। वही
सूख जाने पर अत्यन्त पवित्र हो जाते हैं। रेशम का धागा मूलतया शुद्ध ही होता है। उनके तंतु वायु से शुद्ध होते
हैं और कपास के वस्त्र के तंतु धोने से शुद्ध होते हैं। गाय का दूध कांसे के बर्तन में अथवा मटकी में रखने से
पवित्र होता है, वही ताँबे के बर्तन में रखने से अपवित्र होता है। इमली आदि खट्टे पदार्थ से ताँबा शुद्ध होता है
और नमक से खट्टे पदार्थ शुद्ध होते हैं। घृत अग्नि संस्कार से शुद्ध होता है, अग्नि ब्राह्मण के मंत्रों से पवित्र
होता है; ब्राह्मण स्वधर्म के आचरण से पवित्र होता है, और धर्माचरण वेद विधि से पवित्र होता है। वह गुरुमुख
से पवित्र होता है, गुरु आत्मानंद से पवित्र होता है, आत्मा (जीव) गुरु चरणोदक से पवित्र होता है, और उदक
ब्राह्मणों के चरण से पवित्र होता है। लीपने से धरती पवित्र होती है, मिट्टी से जल पवित्र होता है, तेल से
चमड़ा पवित्र होता है और चमड़े के पात्र में रखने से तेल पवित्र होता है। व्याघ्रचर्म, कृष्णाजिन आदि चर्म
मूलतया पवित्र होते हैं। अग्निसंस्कार से सुवर्ण सहज ही पवित्र होता है। इस प्रकार परस्पर पदार्थों से परस्पर
पवित्रता के आने की बात स्मृति शास्त्रों में बतायी गयी है। अब मल से लिप्त होने पर, किस प्रकार उसमें
पवित्रता आती है, सुनो।
अमेध्यलिप्तं यद् येन गन्धं लेपं व्यपोहति।
भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते ॥१३॥
बर्तन, चौकी अथवा किसी भी प्रकार का आसन अमंगल पदार्थ से लिप्त होने पर, जब तक उसकी
दुर्गंध न जाय तब तक धोने से उसे पवित्रता आती है। शरीर में नाभि के नीचे अमंगल लेप लगा हो तो उसे
स्थान की दुर्गन्ध पूरी तरह समाप्त होने तक धोने से उस पुरुष में पवित्रता आती है। नाभि के ऊपर अकस्मात
अमंगल पदार्थ का लेप लग जाय, तो मृत्तिकास्नान करने से वह पुरुष पवित्र होता है। मल धोने से तत्काल
चला जाता है; लेकिन उसकी महक जाने तक शरीर पहले जैसा नहीं हो जाता। इसी का नाम है 'मलनिष्कृति'
बाह्य पदार्थों की मल निवृत्ति के लिये ही वेद ने इतना बताने का श्रम लिया। अब कर्त्ता की पवित्रता के संबंध
में उपाय बताता हूँ, सुनो।
स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभिः।
मत्स्मृत्या चात्मनः शौचं शुद्धः कर्माचरेद् द्विजः ॥ १४॥
गर्भाधान से अन्नप्राशन संस्कार होते हैं वह बाल्यावस्था है। चौल संस्कार कुमारावस्था है और उपनयन
संस्कार से ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है। कर्माधिकार प्राप्त करने के लिये स्नान करें; द्रव्यशुद्धि के लिये दान करें,