श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 577, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय ५६१
वाणी का अपार विस्तार हुआ है। स्वर और वर्ण आदि के उच्चार से वेदों की अधिष्ठान वैखरी वाणी कैसे उत्पन्न
हुई, वह भी बताता हूँ, सुनो।
ओङ्काराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम्॥ ३९ ॥
विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः।
अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४० ॥
अ-उ-म ये तीन मात्राएँ जब एकत्र होती हैं तो लोग उसे 'ओंकार' कहते हैं। यह ओंकार अलौकिक है
तथा अत्यन्त सूक्ष्म रूप से देह में ही रहता है। उसी ओंकार को प्राण की संगति से जब मूलाधारादि चक्र में
उर्ध्वगति प्रारम्भ होती है तब परा, पश्यंति, मध्यमा वाणी की अभिव्यक्ति होती है। परा वाणी के भीतर 'पश्यंति'
श्रेष्ठ रूप में जन्म लेती है। उसके गर्भ से 'मध्यमा' का जन्म होता है। इस प्रकार ये दोनों एक दूसरी से उत्पन्न
होती हैं। उसी प्रकार वे क्षणभर के लिये भी एक-दूसरे को छोड़कर नहीं रहतीं। एक-दूसरे को साथ लेकर वे
पहले एक चक्र, फिर दूसरा चक्र और तीसरा चक्र पार करते हुए ऊपर चढ़ती जाती हैं। 'मूलाधार' चक्र में 'परा'
वाचा उत्पन्न होती है। 'स्वाधिष्ठान' चक्र में, पश्यंती का जन्म होता है और 'मणिपुर' चक्र से 'विशुद्धि' चक्र तक
'मध्यमा' का आवागमन चलता रहता है। वहाँ से मुख के द्वारा 'वैखरी' वाणी प्रकट होती है। तब वह स्वर वर्ण
के उच्चार से अनेक मंत्ररूपों में गरजती रहती है। उन्हीं स्वरों में 'स्पर्श' वर्ण, 'असंख्य वर्ण' तथा 'ऊष्म' वर्ण के
विभाग सुनो। केवल अ से अः ये स्वर, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग इस प्रकार पाँच वर्णों के पाँच पंचक अर्थात्
पचीस अक्षरों को स्पर्शवर्ण कहते हैं। जिनकी सहायता से ही वर्णों का ठीक तरह उच्चार हो पाता है वे
अकारादिक सोलह 'स्वर' हैं। य, र, ल, व को 'अंतस्थ' वर्ण कहते हैं और श, ष, स, ह इन चार वर्णों को
शास्त्रकार 'ऊष्म' स्वर कहते हैं। अ-अः ये अनुस्वार तथा विसर्ग विभाग हैं। इसमें क्षकार वह केवल बावनवी
मातृका है। इनमें और अतिरिक्त निरनुनासिक तथा सानुनासिक ये भेद शास्त्रज्ञ जानते ही हैं। इस प्रकार स्वर और
वर्ण इनके यथाशास्त्र उच्चार से तथा वेदशास्त्रों के अर्थ प्रकार से लौकिक और वैदिक भाषा का विस्तार हुआ है।
शब्दों की अनेक प्रकार की उत्पत्ति का प्रयोग कर शब्दों से ही शब्द का खण्डन करते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार
के शब्द कौशल्य से यह वैखरी वाणी विस्तार पायी है। वही चार-चार अक्षरों से बढ़कर उसी के अनेक छंद हो
गये हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे चार अक्षरों के बढ़ने से नये-नये अनेक छंद साध कर वेद ने अपने ज्ञान का बोध
प्रकट किया है। इसीलिये वह वैखरी वाणी अनंत और अपार है। शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टि से वह अत्यन्त
कठिन है। मेरे शब्द ज्ञान की थाह सुरनरों को भी नहीं लग पाती। वैखरी की शक्ति अनंत है इसीलिये उसे 'बृहती'
कहते हैं। इसके विस्तार की मर्यादा शंकर और ब्रह्मदेव भी नहीं जानते। स्वयं हिरण्यगर्भ के रूप में जीव, शिव
और अंतर्यामी इन्हें मेरी वेदाज्ञा प्रकट करती है। उसी का नामकरण है 'वैखरी'। मैं वेदात्मा श्रीहरि इस प्रकार वेद
का विस्तार करता हूँ। स्वयं ही उसका विस्तार कर उसकी मर्यादा समाप्त होने के समय उसका संहार भी मैं ही
करता हूँ। पहले जो छंद बता दिये थे उनके निजलक्षण, वेद का कारण अर्थात् परमात्मा श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।
त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद्विराट् ॥ ४१ ॥
'गायत्री छंद' सभी छंदों का प्रमुख अधिष्ठान है। उस गायत्री छंद का लक्षण तुम्हें सविस्तार बताता हूँ।
आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण और गिनते समय जिसमें शुद्ध यति (विराम) आराम आता है, उसे गायत्री छंद