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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 578, कुल 869 में से

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पृष्ठ 578

५६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कहते हैं। वेदोक्ति का यही मुख्य बीज है। वेद का रहस्य, ब्रह्मज्ञान का दूसरा छोर और परमानंद का शुद्ध
सारतत्त्व, वही गायत्री है। यह चैतन्य का जीवन तथा मेरे गुप्त का गुप्त धन है। जिसमें जीव-शिव का समाधान
होता है, वही यह गायत्री छंद है। इस छंद का एक-एक अक्षर परब्रह्म का सार है और गायत्री सचमुच ही
सच्चिदानन्द का भंडार है। गायत्री का अनुष्ठान कर विश्वामित्र क्षत्रिय से राजा बना। मैं कृष्ण भी उसका वंदन
करता हूँ। रामावतार में वह मेरा भी गुरु था। इसलिये सारे छंदों में मुख्यतः गायत्री छंद ही श्रेष्ठ है। इसके पीछे
लग कर ही अन्य छन्द पावन होते हैं। गायत्री छंद के अक्षरों में चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'उष्णिक'
छंद उत्पन्न होता है। उष्णिक छंद में और चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'अनुष्टुप' छंद उत्पन्न होता है।
उसमें और चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'बृहती' छंद होता है। इसी प्रकार 'पंक्ति-त्रिष्टुप-गजती-
अत्यष्टि-अतिजगती' आदि छंद, चार-चार अक्षर अधिक जोड़ने से वेदवाणी विभाग के छंद बन जाते हैं। ऐसे
चार-चार अक्षर अधिक लगाकर अनेक छंदों की पंक्ति तैयार होती है और वेदराज की राजधानी उस मंत्रध्वनि से
गरजती रहती है। उनके अक्षरों की गिनती नहीं हो पाती, शाखाओं का पता नहीं चल पाता, अर्थज्ञान और
शब्दज्ञान भी समझ में नहीं आता। इस प्रकार वेद का वैभव दुर्गम है।
किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।
इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद वेद कश्चन्॥ ४२ ॥
कर्मकाण्ड के विधिनिषेध बताते समय वेद किस अर्थ से त्याग की निंदा करता है और साधक के हित में
किस अर्थ का प्रतिपादन करता है; मंत्रकाण्ड ने सभी मंत्र मूर्ति का उल्लेख कर आयुधों के प्रकार, उपासना
तथा उपास्य आदि भाग बताकर भक्ति किस लिये करवायी है? ज्ञानकाण्ड में सचमुच किस पदार्थ का निषेध
किया है? और किस अर्थ का प्रतिपादन कर आत्मज्ञान का उपदेश किया है? इस प्रकार वेद का अटल मूल
क्या है? अथवा विधिविधान के साथ मुख्य फल कौन-सा है? यह जानने लायक ज्ञान मनुष्य की बात दूर,
लेकिन देवताओं को भी नहीं है। सचमुच, उस वेदार्थ को ठीक तरह से जानने वाला मैं ही एक सर्वज्ञ हूँ। मेरी
कृपा के बिना यह अर्थ ब्रह्मदेव आदि के हाथ भी नहीं लगेगा। यह सुनकर उद्धव ने सोचा, वेद का सच्चा
अर्थसार केवल भगवान को ही मालूम है और श्रीकृष्ण भक्त के प्रति कृपालु हैं अर्थात् वे शायद मुझ पर भी
दया कर मुझे वह अर्थ बता दें। उद्धव के मन का उद्देश्य जानकर भगवान आगे खिसके और वेदार्थ का सारांश
श्लोक रूप में सुनाने लगे।
मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्।
एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्।
मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति॥ ४३॥
मेरे स्वरूप की प्राप्ति होने के लिये, मलिनचित्त लोगों की चित्तशुद्धि के लिये वेद ने स्वधर्म का प्रतिपादन
किया है और निषेध बताकर विषयों का त्याग करवाया है। उसमें अग्निहोत्र आदि का विधान और यज्ञ का
कर्माचरण चित्तशुद्धि के लिये अन्यन्त कारणीभूत है। उसके योग से प्रखर वैराग्य उत्पन्न होता है। वैराग्य उत्पन्न
हो जाय और यहाँ की विषय निवृत्ति हो जाय तो साधक को सहजास्थिति से मेरी प्राप्ति होती है। अब जो विषयों
की बाधकता समझते हैं किन्तु उनमें उनका त्याग करने का सामर्थ्य नहीं होता, ऐसे साधकों के लिये वेद ने मेरी
भक्ति प्रकट की है। इसमें मंत्र-मूर्ति की उपासना, मेरे सगुण रूप का अनुष्ठान और एकनिष्ठा से भजन करने से