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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 869 में से

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पृष्ठ 573

इक्कीसवाँ अध्याय ५५७
रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजस्तक्तमोजुषः ।
उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न तथैव माम् ॥ ३२ ॥
रज और तम जब बहुत अधिक बढ़ जाते हैं तो उसमें जब सत्त्व भी मिल जाता है तो रज की संगति से
काम चित्त को क्षुब्ध कर देता है। चित्त में जब काम अत्यधिक उफनता है तो गुण के अनुसार विषय पर प्रेम
होता है। तब वह निश्चित रूप से सकामी की ही संगत पकड़ता है। सकाम की संगति के कारण काम्यकर्म में
ही आदर बढ़ने लगता है और वह स्वर्गभोग में तत्पर होकर देव, पितर, भूत, प्रथमगण आदि का यजन करता है।
इस प्रकार वासनालुब्ध लोग मुझ सर्वात्मा, सर्वेश्वर के पास होते हुए भी मेरा अनादर कर अन्य देवताओं की ही
उपासना करते हैं। अब शायद तुम यह कहोगे कि अन्य देवताओं के होने पर भी तुम तो हो ही, तो उनके साथ
इस प्रकार का ऐक्यभाव नहीं रहता। सारा विनियोग भेद बुद्धि में ही होता है। अरे! इन्द्रादि देवों के द्वारा मैं ही
प्रसन्न होता हूँ, लेकिन उनका सकाम मन स्वर्ग की ही इच्छा करने के कारण वे मेरा भजन नहीं करते। मन में
वासना दृढ़ रहती है इसलिये स्वर्ग की पुनरावृत्ति के और भी फेरे हैं यह सुनकर उन्हें वह हित का ही लगता है।
उसके बारे में भी सुनो।
इष्ट्वेह देवता यज्ञैर्गत्वा रस्यामहे दिवि।
तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुलाः ॥ ३३ ॥
कर्मभूमि में जो मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं, वे सहज ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं। ऐसा होते हुए भी वे
कामना में फँस जाते हैं और स्वर्ग में दूसरे देवताओं का ही भजन करते हैं। स्वर्गभोग पर दृष्टि रख कर अनेक
यज्ञायाग करते हैं और उतने से स्वर्ग के सुखोपभोग की आशा करते हैं। कालान्तर में पुण्य का क्षय होते ही उनका
पतन होता है। वह भी उन्हें हितकर ही लगता है। पुण्यवान स्वर्गस्थ जीव होने के कारण हमने सुशील ब्राह्मण के
कुल में जन्म लिया, ऐसा वे कहते हैं। वेदवेदांग का अध्ययन कर धनधान्य से समृद्ध होकर हम विख्यात गृहस्थ
बन कर रहेंगे ऐसा उनका विश्वास रहता है। वेदार्थ का सच्चा अर्थ न जानने के कारण ये लोग काम्यकर्म को ही
इति कर्तव्यता समझते हैं और गन्ना छोड़ कर उसका बाल (भुट्टा) माँगते फिरते हैं।
एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।
मानिनां चातिस्तब्धानां मद्मार्ताऽपि न रोचते ॥ ३४ ॥
फल छोड़कर फूल खाना यही याज्ञिकों की स्थिति रहती है। वे स्वर्ग की इच्छा से जो उपाय करते हैं
वही उनका अहित करते हैं। सारा संसार ही जहाँ काल्पनिक है वहाँ स्वर्ग का सुख ही सत्य कैसे होगा ? किन्तु
केवल सुनी हुई बातों को ही सच मानकर मूर्ख लोग स्वर्ग के सुख से मोहित हो जाते हैं। नपुंसक स्त्री सुख की
कितनी ही इच्छा क्यों न करे लेकिन वह उसके साथ संग कैसे कर सकता है ? जब बीजोत्पत्ति ही नहीं है तो
काम का प्रयास किसलिये ? व्यर्थ ही उठता है, फिर सोता है लेकिन उसे सच्चा स्त्रीसुख नहीं मिल पाता। उसी
प्रकार स्वर्ग के सम्बन्ध में उनकी स्थिति होती है। गेहूँ की कोमल बाली स्वाद में भली लगती है लेकिन जिसे
फसल की कल्पना रहती है वह बाली को नहीं उखाड़ता। पत्तों का स्वाद लेने से उसे गेहूँ की मिठास नहीं
मिलती, ऐसा होते हुए यदि पत्ते ही उखाड़ लिये तो गेहूँ के नाम पर रोने की नौबत आयेगी। इस प्रकार वेद ने
स्वर्ग का फल बताया है, वही स्वधर्म का कोमल मूल है। उसे तुरन्त तोड़कर खाने से मनुष्य मोक्षफल से
वंचित हो जाता है। जो ज्ञानी इस बात को जानते हैं वे स्वर्ग का स्पर्श भी नहीं करते, लेकिन मूर्ख की