सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 570

५५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाँस का जंगल है, उसमें स्वधर्म का घर्षण होनेपर चित्तशुद्धि की चिनगारी निकलती है जो उस कर्माकर्म को
जलाकर भस्म कर देती है। कामना के साथ कर्म करने से भी, स्वधर्म जब फलेच्छा को नष्ट करता है, तब
सकाम और निष्काम दोनों ही कर्मों को स्वधर्म भस्म कर देता है। दो लकड़ियाँ जब एक-दूसरे पर रगड़ती हैं तो
उससे अग्नि उत्पन्न होता है और वह दोनों लकड़ियों को जलाकर अपनी ही दीप्ति से प्रकट होता है। उसी प्रकार
मेरी वेदवाणी है जो स्वकर्म से ही कर्म का बन्धन तोड़ देती है। यह मर्म न जानने से विषयांध पुरुष फल की
आशा से जकड़ा रहता है। वेद ने स्वकर्म प्रवृत्ति में रुचि उत्पन्न करने के लिये स्वर्गादिक अनेक फल बताये हैं
लेकिन जो उनके ही फेर में पड़ता है वह अपने लाभ से वंचित हो जाता है। खेत को बड़ी मेहनत से तैयार कर
उसमें चना बोया, लेकिन वह हरा था तभी उसे उखाड़ कर उसकी सब्जी बना ली। अब इसे लाभ समझें या
हानि ? उसी प्रकार सकाम के फल की स्थिति है। जोनरी के हरे बाल खाने में बहुत मीठे लगते हैं; लेकिन उसके
लिये यदि पूरा खेत ही उखाड़ दिया जाय तो लाभ होगा या हानि होगी ? उसी प्रकार जो लोग सकाम बुद्धि से
उन्मत्त होते हैं, जो फल की आशा से लुब्ध होते हैं, वे किस प्रकार स्वधर्म के लाभ से वंचित रह जाते हैं, यही
तुम्हें बताता हूँ। खेत में बोने के लिये लाये गये चने को यदि कोई भट्टी में भून कर खा जाय उसे बुद्धिमान कहा
जाय या मूर्ख ? उसी प्रकार वह सकाम का फल भोगता है। घोड़ा बेचकर कोई जीन खरीद ले, मक्खन देकर
छाछ माँगे, भात फेंक कर माँड़ पिये उसी प्रकार सकाम का फल भोगता है। जो ऐसे सकाम और मूर्ख होते हैं वे
स्वधर्म की सिद्धि से वंचित रह जाते हैं। इसीलिये भगवान उन्हें कुबुद्धि कहते हैं। उस कुबुद्धि के भी लक्षण
भगवान बताते हैं।
कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु फलबुद्धयः ।
अग्निमुग्धा धूमतान्ता स्वंलोकं न विदन्ति ते ॥ २७॥
सकाम की तृष्णा कभी पूरी नहीं होती। काम की इच्छा से उसकी स्थिति सदा दयनीय रहती है, इसलिये
उसे 'कृपण' कहते हैं। बगुला जिस प्रकार पानी में मछली के लिये ध्यान करके बैठता है, उसी प्रकार सकाम
मनुष्य फल की इच्छा से लुब्ध होकर अनुष्ठान करता रहता है। पर-पुरुष के पास जाना सुलभ हो, इसलिये
जिस प्रकार व्यभिचारिणी अपने पति के आगे-पीछे करती रहती है, उसी प्रकार वह भी मन में फल की इच्छा
कर स्वधर्म का आचरण करता रहता है। अज्ञान बालक जिस प्रकार फूल को ही फल समझता है, उसी प्रकार
वह भी मूर्खता के कारण स्वर्ग के सुख को अक्षय समझ बैठता है। उस स्वर्गसुख की प्राप्ति के लिये कर्म
यथाविधि होंगे या नहीं इसका भी उसे सन्देह होता है, जिससे उसकी स्थिति अत्यन्त दयनीय हो जाती है।
सकाम सदा दीन ही रहता है; उस दीनता के कारण वह अत्यन्त कृपण और लालची हो जाता है। लोभ के
कारण उसके ज्ञान को महामोह ग्रस लेता है। मोह जब क्षुब्ध होता है तो वह विवेक के साथ-साथ ज्ञान को भी
निगल लेता है। उस समय बुद्धि में अंतर्बाह्य तमोगुण ही उफनने लगता है। तमोगुण से जब बुद्धि भर जाती है
तो धुँधलके की सी स्थिति हो जाती है। अन्धे की संगत से कोई अँधेरी रात में जंगल में खो जाये उसी प्रकार
सकाम पुरुष की स्थिति हो जाती है। विवेक की संगति टूटने पर अन्धी वृत्ति अत्यन्त प्रसन्न हो उठती है।
अज्ञान बालक की तरह वह पूरी तरह मुग्ध हो उठता है, फिर कर्म क्या है और उसका फल क्या है यह उसकी
समझ में नहीं आता। संसार में मेरी क्या स्थिति है ? आगे मेरी गति क्या होगी ? देह में धूम्रवृत्ति होने के कारण
उसे कुछ स्मरण नहीं होता।