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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 869 में से

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पृष्ठ 576

५६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्पष्ट कर देता हूँ। मेरी अनंत शक्ति रूप जो योगमाया है, वह शंकर और ब्रह्मदेव को भी समझ में नहीं आती।
उसी योग से मैं चिन्मूर्ति होते हुए भी उत्पत्ति, स्थिति और संहारकर्ता बनता हूँ। ऐसा योगमाया का स्वभाव है।
सब कुछ करने पर भी मैं अकर्ता हूँ। इसलिये मुझे देश और काल का विकार स्पर्श नहीं करता। भेदभाव की
बात सच होती तो मुझे विकारबाधा हुई होती; परन्तु मेरा निजस्वरूप देखने पर उसमें भेद की बात ही नहीं
दिखायी देती। भ्रम से जिस प्रकार रस्सी के सर्प का भास होता है, उसी प्रकार मैं परमात्मा श्रीहरि सब कुछ
करके भी निजरूप से अधिकारी ही रहता हूँ। घोषरूप में रहने वाला वह अत्यंत सूक्ष्म नाद, मैं स्वयं प्रणवरूप
वेद प्राणिमात्र में स्वतः सिद्ध हूँ, लेकिन लोग सकामबुद्धि से वह नहीं जानते। सुअर जिस प्रकार कस्तूरी या
कपूर छोड़कर विष्ठा ही खाता है, उसी प्रकार सूक्ष्मवेद के अंतरंग की सकाम पुरुष उपेक्षा करते हैं। मैं निजानंद
स्वरूप प्रत्येक प्राणी के हृदय में उपस्थित होते हुए भी, भ्रांतिमान लोग कामासक्ति के कारण नीचों की ड्योढ़ी
के चक्कर लगाते हैं। लेकिन योगी लोग उस हृदयस्थ देवता का ध्यान लगाकर बैठते हैं उसका उन्हें ध्यास लगा
रहता है, प्राणापान को सम कर वे निरन्तर नाद का अनुसंधान रखते हैं। मेरा वेदरहस्य जो गुप्त है वह प्रणवरूप
से हृदय के अन्दर ही है, योगी सर्वकाल उसका अनुभव लेते हैं। उसका निश्चित स्वरूप बताता हूँ, सुनो। कमल
के डंठल के नाजुक तंतु की तरह यह अत्यन्त सूक्ष्म नाद नाभि से ब्रह्मरन्ध्र तक जाता है और ओंकारस्वरूप में
लक्षित होता है। इस प्रकार का, नाभि से ब्रह्मरंध्र तक ओंकार रूप से चलने वाले सूक्ष्म नादरूपी स्वर को
महायोगी योगधारणा से अनुसंधान में रखते हैं। यही नाद दोनों हाथ कान पर रखने पर घूमता हुआ सा मालूम
होता है। योगी लोग उसे 'अनाहतशब्द' कहते हैं। वेदांती लोग इसी को 'सूक्ष्मनाद' कहते हैं और हम इसे
'शुद्धवेद' कहते हैं। लेकिन यह नाम के अनुवाद की बात रहने दीजिये। ऐसे स्वयंसिद्ध वेद पर मनुष्य की श्रद्धा
नहीं जमती इसलिये उस सूक्ष्मवेद को ही मैं लोककल्याण के लिये स्थूलरूप में लाया। स्थूलरूप में प्रकट हुआ
यह वेद ही वेद का प्रसिद्ध मार्ग बन गया। इसे दृष्टांत से स्पष्ट करके बताता हूँ। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा जिससे
उद्धव की आत्मा को अत्यन्त संतोष हुआ। वह कहने लगा, श्रीकृष्ण मेरे लिये अत्यन्त सरस निरूपण कर रहे
हैं। मुझसे प्रेम होने के कारण ही, केवल मेरा उद्धार करने के लिये श्रीकृष्ण निरूपण की बरसात कर उसमें
अमृत से भी मधुर रस भर रहे हैं। उद्धव का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण क्या बोले ? उन्होंने कहा, उद्धव ! उसी
वेद को मैं अब निरूपण में सुना देता हूँ।
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्।
आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा ॥ ३८ ॥
छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः।
ऊर्णनाभि अर्थात् मकड़ी जिस तरह अपने मुँह से अत्यंत महीन तंतु निकालती है, उसी प्रकार निर्गुण में से
ओंकार का धागा निकलता है। वह ओंकार अपने स्वभाव के अनुसार 'सप्राण' अर्थात् सचेतन होते ही
'हिरण्यगर्भ' संज्ञक होता है ऐसा वेद में बताया गया है। उद्धव! वही 'प्रभु' ऐश्वर्ययुक्त स्वामी है। उसकी शक्ति
अचिंत्य, अनंत है और वही छंदोमय वेदमूर्ति है, यह जान लो। वास्तव में वह अविनाशी है तथा नित्य सुखमय
एवं सुखमूर्ति है। उससे सप्राण नादाभिव्यक्ति है जो मनःशक्ति को जागृत करती है। यही जागृत मनःशक्ति स्पर्श-
स्वर-वर्ण का निर्माण करती है। इसी को वेदवेत्ता पुरुष 'बृहती' कहते हैं क्योंकि इसका विस्तार असीम है। स्वर
और वर्णों से युक्त वे मंत्र, हृदयाकाश में विचित्र ढंग से, हजारों शाखाओं में विस्तार पाते हैं। इस प्रकार वैखरी