श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 583, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं, वियोग का दुःख तो मिथ्या है, यह बात उद्धव की समझ में आने तक क्यों न उसके प्रश्नों का उत्तर दें ? इस
बाईसवें अध्याय में वे कुल तत्त्वों की संख्या बतायेंगे, उसी के साथ-साथ प्रकृति पुरुष का विचार और
जन्ममरण का प्रकार भी बतायेंगे। आत्मा एक ही है या अनेक है यह मालूम हो, साथ ही तत्व संख्या भी ठीक
से ज्ञात हो इसलिये उद्धव प्रश्न पूछ रहा है।
उद्धव उवाच
कति तत्त्वानि विश्वेश संख्यातान्यूषिभिः प्रभो ।
नवैकादश पञ्च त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम ॥ १ ॥
हे विश्वात्मका, विश्वेश्वरा, हे विश्वधारका, हे विश्वसाक्षी, हे विश्वाकारा, हे विश्वैकसुंदरा श्रीकृष्ण ! तुम्हें
'विश्वात्मक' कहें तो जड़, मलिन एकदेशीयता और अज्ञानता का बोध होता है ऐसा तुम कहोगे, इसलिये तुम्हारा
प्रभुत्व बताता हूँ। जड़-मलिन-अज्ञानता यह सब माया के ही कारण होता है, जिसके नियंता तुम ही हो। यही
तुम्हारा अगाध प्रभुत्व है। इस प्रकार स्वामी श्रीकृष्ण का उत्तम ढंग से गौरव कर उद्धव ने अत्यन्त विनयपूर्वक
तत्वसंख्या के विचार पूछे। उसने कहा, तपसामर्थ्य में महासमर्थ, भूत-भविष्य जानने वाले जो बड़े-बड़े ऋषिवर्य
हैं उन्होंने निकाली हुई तत्त्वों की संख्या विचित्र-सी लगती है। वे उसके विविध प्रकार बताते हैं। उन्नीसवें
अध्याय में आपने ही तत्वों के सम्बन्ध में विचार विस्तार से बताये हैं। उसमें आपने तत्वों की जो संख्या बतायी
है वही मैं बताता हूँ। चौदहवें श्लोक के निरूपण में, हे श्रीकृष्ण ! तत्वों की गणना कर आपने निश्चयपूर्वक वह
संख्या अट्ठाईस बतायी। इस तत्त्वसंख्या के विचार में प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व और अहंकार और श्रेष्ठ पंच
महाभूत मिलाकर यह संख्या नौ हो गयी। इसके बाद दस इन्द्रिय, ग्यारहवाँ मन, पाँच विषय और तीनों गुण
मिलाकर यह संख्या अट्ठाईस होती है ऐसा आप ही ने निरूपण किया था। हे लक्ष्मीपते ! यही तुम्हारा मुख्य
निरूपण था। अब बड़े-बड़े ऋषियों का युक्तिवाद भी तुम्हें बताता हूँ। उसका अर्थ भी आपको बताता हूँ। उसे
आप ठीक तरह से सुन लें। ऐसा कह कर उद्धव स्वयं उनकी बातें बताने लगा। उसने कहा, आप ठीक तरह से
श्रवण करें। मैं एक चमत्कार बताता हूँ। प्रकृतिपुरुष में ही एक विचित्र प्रकार है।
केचित् षड्विंशति प्राहुरपरे पञ्चविंशतिम् ।
सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे ॥ २ ॥
केचित् सप्तदश प्राहुः षोडशैके त्रयोदश ।
एतावत्त्वं हि संख्यानामृषययो यद्विवक्षया ॥ ३ ॥
इन तत्वों की संख्या में बहुत बड़ा मतभेद है तथा बड़े-बड़े ऋषियों के इस संबंध में विवाद चल रहे हैं।
उन विवादों का सारांश भी मैं आपको स्पष्ट रूप से बताता हूँ। एक मत है कि ये तत्व छब्बीस हैं, दूसरा कहता
है, चुप रहो। कुल मिलाकर सारे तत्त्व पच्चीस ही हैं। तीसरा कहता है, आप लोग यहाँ अपना हठ लेकर क्यों बैठे
हैं ? सारे तत्त्व सात ही निश्चित हुए हैं। एक कहता है, कैसा आश्चर्य ! लोगों को बोलते हुए लाज नहीं लगती।
यह बकवास व्यर्थ है। वास्तव में नौ तत्त्व ही निश्चित हुए हैं। उनमें से एक जन हँस कर कहता है, आजकल
लोग बहुत बुद्धिमान हो गये हैं। व्यर्थ की बकवास करते हैं। तत्त्व कुल मिलाकर छः ही हैं। कुछ लोग कहते हैं,
दूर हटिये, तत्त्वसंख्या का विचार आपकी समझ में नहीं आता। बड़े लोगों से पूछने पर वे तत्त्वों की संख्या सत्रह