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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 869 में से

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पृष्ठ 582

बाईसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप, कठपुतली का खेल करने वाले सद्गुरु ! तुम्हें नमस्कार है। चौरासी लाख पुतलियों को
तुम पूर्वसंचित के अनुसार अपनी इच्छानुसार नचाते हो। हाथ की डोर तो नहीं देखने देते हो लेकिन पुतलियों को
तो स्वयं ही नचाते हो। फिर भी तुम सर्वदा उनसे अलिप्त रहते हो। तुम्हारा यह कौशल कितना अपूर्व है।
जिसका जैसा पूर्वकर्म रहता है उसके अनुसार वह नाचता रहता है। उसे नचाने की चेतनाशक्ति तुम्हारा हाथ न
रहते हुए भी तुम्हारे हाथ में रहती है। भारी लौहखण्ड को जिस प्रकार चुम्बक अपनी शक्ति से वश में करता है,
उसी प्रकार अपने सामर्थ्य से तुम भी समस्त प्राणिमात्र को नचाते हो। इस प्रकार ये जीव परतंत्र के अनुसार
नाचते रहते हैं, लेकिन उनका अहंकार कितना प्रबल होता है। देह का आकार सत्य है यह मानकर वे स्वयं को
स्वतंत्र ही कहते हैं। हम अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न तथा कर्म करने में अत्यन्त कुशल हैं और बाकी सब मूर्ख हैं इस
अभिमान को बढ़ाते हैं। इस प्रकार देहाभिमान के कारण अपना अकर्त्तापन भूलकर स्वप्नावस्था में हुई विषबाधां
की तरह कर्मबन्धन में पड़ जाते हैं। स्वप्न में विष का प्रभाव हुआ था, वह अब बिलकुल उतर गया है, इस
प्रकार बंध और मोक्ष को ये मूर्ख लोग सच मान लेते हैं। तुम्हारा यह कठपुतली का खेल मिथ्या होते हुए भी
तुम उसे सत्य का आभास देते हो। तुम्हारी यह महिमा अपूर्व है। तुम्हारी अतर्क्य लीला का कोई तर्क सम्भव
नहीं है। अचेतन में तुम चैतन्य का धर्म स्वयं दिखला देते हो, यह मर्म किसी को समझ में नहीं आता। तुम कर्म
करके भी अकर्ता हो। तुम अकर्ता होते हुए कर्ता बनते हो और कर्ता होते हुए अकर्ता बनते हो। यह तुम्हारी
कठपुतली की कला किसी की समझ में नहीं आती। तुम्हारी माया देखने जाओ तो वही माया देखने वाले को
ग्रस लेती है। उसे भी छोड़ दें तो; तुम्हें ही देखने जाओ तो वह सत्तावस्था भी मायिक थी। तुम्हारा चरित्र अगम्य
है इसलिये समझ में आना सम्भव नहीं है। अपने सूत्र को दृष्टि से ओझल रखकर तुम प्राणिमात्र को विचित्र ढंग
से नचाते हो। तुम्हारे ही कारण संसार चल रहा है लेकिन मैंने कुछ किया है ऐसा तुम्हें नहीं लगता है। ऐसा
तुम्हारा खेल है, वह कोई कैसे देखे ? इस प्रकार खेल बढ़ाते हो और झट विकल्प से तोड़ भी देते हो। महतत्व
में विकार भर देते हो। लेकिन इसके लिये भी तुम्हारे कर्तत्व की आवश्यकता नहीं होती। इसका मुख्य लक्षण
तुम्हारी कृपा के बिना मालूम नहीं होता। तुम्हारी पूर्ण कृपा हो जाय तभी जन में जनार्दन प्रकट होता है और जब
जन में जनार्दन प्रकट होता है तभी हम भी तद्रूप होते हैं। यही उसका मूलबीज है। वहाँ 'मं' का 'तू' का भाव
नहीं रहता। 'मैं' 'तू' के बिना जन में नित्यानंद रूपी जनार्दन प्रसिद्ध है; उसकी कृपा से ही श्रीमद्भागवत का
ठीक तरह वर्णन हो रहा है। उसके इक्कीसवें अध्याय के अन्त में त्रिकांडात्मक वेद का लक्ष्यार्थ अर्थात् सर्वत्र
एक ही ब्रह्म है और वह अद्वय एवं अविनाशी है यह बतलाया गया है। वेदवाणी के अनुसार भी ब्रह्म एक ही है
और स्वानुभव से देखने पर भी वह वैसा ही दिखाई देता है। फिर भी बड़े-बड़े ऋषि और ज्ञाता तत्त्व अनेक हैं
ऐसा क्यों कहते हैं ? यही शंका मन में लाकर उद्धव ने प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया। लेकिन मन में एक ही भाव
था कि श्रीकृष्ण शान्त न बैठें। यदि मैं कहूँ कि 'मैं ब्रह्मस्वरूप हो गया' तो श्रीकृष्ण यह सुनकर निजधाम को
चले जायेंगे। इस उलझन में, उसने सन्देह न होते हुए भी प्रश्न किया। वह सुनकर श्रीकृष्ण को सुख और
समाधान का अनुभव हुआ। इतने में श्रीकृष्ण के मन में एक निराली ही बात आयी कि उद्धव और मैं तो एक ही