श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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विषयतृष्णा रुकती नहीं है। वे लोग काम की आसक्ति से सकाम कर्म ही करते रहते हैं इसलिये वे जन्म-मरण
के चक्र में फँसकर कल्पांत तक बाहर नहीं निकल पाते। साधु लोग उन्हें हित की बात बताते हैं लेकिन उसे वे
स्वीकार नहीं करते। हम ज्ञाता हैं, वेद का अर्थ हम ही जानते हैं, ऐसा ज्ञानाभिमान होने के कारण वे अभिमान
में फूले रहते हैं। मैं भगवान सृष्टि का नियंता हूँ ऐसा वेद ने स्पष्ट कहा है फिर भी यह बात वे नहीं मानते।
निष्काम कर्म की बात करने से उनका मस्तिष्क खराब हो जाता है क्योंकि उनकी सकाम बुद्धि अत्यन्त दृढ़ हो
जाती है। इस प्रकार वेद को प्रवृत्तिपरक मान कर सभी सकाम लोग भ्रम में फँस जाते हैं। इसलिये उस वेद का
ब्रह्मपरक अर्थ स्वयं श्रीकृष्ण समझा रहे हैं।
वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।
परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम चा प्रियम्॥ ३५॥
वेद स्वयं ही कर्मकाण्ड, उपासनाकांड और ज्ञानकांड के द्वारा चित्तशुद्धि के द्वार से जीव को ब्रह्मस्वरूप
करता है। मछुआरा जिस प्रकार बंसी में मांस का टुकड़ा लगाकर मछली को जल के बाहर निकालता है उसी
प्रकार वेद भी स्वर्गसुख का लालच देकर जीव को परमार्थ की ओर खींचता है। वेद ने परोक्ष में अर्थात् अस्पष्ट
कहकर त्यागमुख से अन्योक्ति गाकर विषय के प्रति आसक्ति छुड़ायी है। वेदार्थ का यह गुह्य ज्ञान समझ कर जब
जीव ब्रह्मस्वरूप होता है, तब कर्म और कर्त्ता मिथ्या हो जाते हैं। फिर आश्रम और वर्ण किसके? ध्येय, ध्याता
और ध्यान किसका? वह परिपूर्णता से परब्रह्मस्वरूप ही हो जाने के कारण भज्य, भजक और भजन ये तीनों भी
शेष नहीं रह जाते। फिर कर्मकर्माचरण किसका किया जाय? वेद किसका, वेदाध्ययन किसलिये और साधन
किसका? क्योंकि जब वह पूर्णता से परिपूर्ण ब्रह्म हो जाता है तो दोष और गुण, पाप और पुण्य, जन्म और मृत्यु
कैसे होगा? परिपूर्णत्त्व से सारा पूर्ण ब्रह्म ही भरा रहता है। वहाँ भेद किसका और ऐक्यभाव भी किसका? बंध
किसका और मोक्ष किसका? उद्धव! सदा सर्वकाल परमानन्द ही भरा रहता है। यही वेद का सच्चा अर्थ है।
किन्तु इस वेदार्थ का निरूपण मैं स्वयं ही प्रकट करूँ तो लोगों के हित पर पानी फिर जायेगा इसलिये मैंने उसे
गुप्त रखा है। यह वेदार्थ का सार है और मेरे गुप्त ज्ञान का भण्डार है। तुम अधिकारी हो यह ध्यान में आने से ही
मैंने तुम्हें यह बताया है। अगर यह गुह्यार्थ प्रकट कर दिया तो नष्ट और अनधिकारी लोग कर्ममार्ग का मार्ग
छोड़कर कर्म और ब्रह्म दोनों से ही वंचित हो जायेंगे। ज्ञानसम्पन्न ऋषियों ने इसी बात को ध्यान में रखकर वेदार्थ
बताने की शैली में मुख्य अर्थ को गुप्त रखकर परोक्षवाद अर्थात् प्रवृत्तिमार्ग का ही प्रतिपादन किया है। उद्धव!
सब लोगों के हित के लिये और उन्हें रास्ता दिखलाने के लिये यही उचित है ऐसा मुझे भी लगता है क्योंकि
सबको प्रवृत्ति मार्ग ही अच्छा लगता है। लोगों को सही मार्ग दिखलाने के लिये, मैं अकर्त्ता होते हुए भी कर्म
करता हूँ और लोक कल्याण के लिये वेद का जो प्रवृत्तिपरक विचार है उसका भी स्वयं पालन करता हूँ। उस
वेद का स्वरूप अत्यन्त गहन, अतर्क्य, अलक्ष्य और अगम्य है, यह तुम जान लो। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण
अगले श्लोक में कर रहे हैं।
शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।
अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६॥
मेरा वेदरूपी भाषण शब्दशः और अर्थशः अत्यन्त गहन है। इस सम्बन्ध में ब्रह्मदेवादिक देवता भी भ्रम में
पड़ जाते हैं। समुद्र जिस प्रकार स्वयं तैर कर पार नहीं किया जा सकता उसी प्रकार अपनी ही बुद्धि से वेद का