श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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करें; देवता बनकर ही देवता को भजें, यही वेद का मेरा रहस्य और यही आगमों ने भी बताया है। मैं ही देवता हूँ
और भक्त भी मैं हूँ, पूजा का सारा साहित्य भी मैं ही हूँ, मेरी पूजा मैं ही करता हूँ। यही सम्पूर्ण उपासना है। वेद
के उपासना काण्ड का मुख्य सार यही है। आगमशास्त्र का गुप्त भण्डार यही है, मेरे भक्तों का निवासस्थान यही
वह उपासना है। 'ज्ञानकांड' तो अत्यन्त विचित्र है। उसमें वेद स्वयं ही अपना द्योतक बन जाता है। सारा संसार
ही यदि काल्पनिक है तो वेद को 'नियामक' किस अर्थ में मानें? उजाड़ घर में यदि कोई, निर्जीव मेहमान आ
जाय तो उसका आदरातिथ्य कौन करेगा? यही बात वेदाज्ञा की है। कठपुतली वाली गुड़िया के केश यदि मूँड़
दिये जायें तो उसके सिर पर पुन: केश नहीं आयेंगे। उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में भी वेद को कोई स्थान नहीं है।
मूल संसार ही जब मायिक है तो उसका वेद भी मद्रूप होगा। मृगजल में उदक तो रहता ही नहीं है, लेकिन उसमें
गीलापन भी नहीं होता। जहाँ सारा कुछ अद्वैत ही है, वहाँ श्रोता और वक्ता कैसा? वहाँ वेदवार्त्ता कैसी? जहाँ
दृश्य, द्रष्टा और दर्शन नहीं है, जहाँ ध्येय, ध्याता और ध्यान नहीं है; ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान नहीं है वहाँ वेदवचन
भी किसका होगा? जहाँ भ्रम का साम्राज्य और भेदभाव की बात रहती है, वहीं वेद की बुद्धि और उपनिषदों का
सुमधुर संगीत चलता है। भेद जब तक प्रबल है, तभी तक वेद का महात्म्य है; भेद जब अद्वैत में प्रवेश करता है
तो वेद भी 'नेति नेति' कहता हुआ विलीन हो जाता है। पानी की धारा जिस प्रकार पानी में ही विलीन हो जाती
है, उसी प्रकार वेद भी अद्वैत में विलीन हो जाता है। यही वास्तविक 'ज्ञानकांड' है। वह मैंने तुम्हें प्रेम से
बताया। जिस अरणीकाष्ठ से अग्नि उत्पन्न होता है उसी अरणी को जलाकर वह शांत होता है। उसी प्रकार
ज्ञानकांड निरूपण में वेद ने स्वयं को ही समाप्त कर दिया है। 'अद्वैतरूप ब्रह्म एक है' इस श्रुतिवाक्य से ही द्वैत
मिथ्या हो जाता है। इतना कहकर वेद अदृश्य हो जाता है और ब्रह्म अपनी सम्पूर्णता में सदा जैसा है वैसा ही
रहता है। निर्विकार शुद्ध ब्रह्म में 'मैं ब्रह्म' यह जो स्फूर्ति उत्पन्न होती है, वही ओंकार की उत्पत्ति होती है। उसे
'एकाक्षर ब्रह्म' कहते हैं। उसी ओंकार से स्वरवर्ण की उत्पत्ति हुई और श्रुति की बड़ी-बड़ी शाखाएँ उत्पन्न हो
गयीं। वह सारा ब्रह्मरूप ही है। इस प्रकार सारे वेद परब्रह्मरूप हैं। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार वास्तविक रूप
में सुवर्ण ही रहते हैं, उसी प्रकार श्रुति शाखाओं से होने वाला वेद का विस्तार भी ओंकार स्वरूप में मद्रूप ही है।
वेदों द्वारा प्रतिपादित पुरुषोत्तम, जो भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाला कल्पतरु ही है ऐसा मेघश्याम,
आत्माराम, श्रीकृष्ण ने कहा। तीनों कांडों का संबंध कहीं भी विरोध न होने वाला ही है। यही अत्यन्त शुद्ध वेद
का अर्थ है। उसे मैंने विस्तारपूर्वक बताया। हे उद्धव ! इससे अलग, वेद का कोई अर्थ नहीं है। वेद के इस अर्थ
की पहचान हृदय में अंकित करने से जीव-शिव का समाधान होता है। श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर उद्धव वेद
के अर्थ में निमग्न हो गया। उसकी दोनों आँखें भर आयीं और मन आत्मानंद में डूब गया। चित्त चैतन्य में
विलीन हो गया, हृदय द्रवित होने के कारण गला भर आया, स्वानंद का स्वाद मिलते ही देह रोमांचित हो उठा।
शरीर से पसीना छूटने लगा और देह काँपने लगा। आँखों में आनंदाश्रु भर आये और वाचा मौन हो गयी। मूर्छा
आने लगी लेकिन उसने अपने को सँभाल लिया। उसे स्मरण हो गया कि मन की यह लापरवाही ठीक नहीं है।
कहीं ऐसा न हो कि भगवान निजधाम चले जाएँ। इस भय से उसने आँखें खोलीं। उसने देखा, सामने मेघ की
तरह श्यामसुन्दर, मुकुट, कुण्डल और मेखला धारण किये हुए, पीताम्बर परिधान किये तथा गले में वनमाला
धारण किये श्रीकृष्ण खड़े हैं। वह हृदय में चैतन्यघन का अनुभव कर रहा था। आँखें खोलते ही आनंदघन की
मूर्ति उसी प्रकार सामने दिखायी देने लगी। वह कहने लगा कि श्रीकृष्ण चैतन्यघन है तथा चैतन्य की साकार मूर्ति
है। सगुण और निर्गुण रूप में श्रीकृष्ण परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। उद्धव कितना भाग्यशाली है। क्योंकि सगुण और