श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 579, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय ५६३
रजोगुण और तमोगुण का नाश होता है। फिर शुद्ध सत्त्ववृत्ति ही शेष रहती है। इससे श्रवण कीर्तन में प्रेम उपजता
है और समस्त प्राणियों के प्रति मेरी ही भावना उत्पन्न होकर उससे मेरी चौथी भक्ति का लाभ होता है। मेरी चौथी
भक्ति प्राप्त होने पर मेरे भक्तों को मुक्ति भी अच्छी नहीं लगती। अद्वैत भजन के आगे वे मोक्ष का भी धिःकार
करते हैं। अद्वैत बोध से मेरा भजन करने पर अनंत, अपार और चिद्घन स्वरूप भक्तों के मैं वश में हो जाता हूँ और
मेरे भक्तों को मद्रूप प्राप्त होता है। उस समय भज्य, भजक और भजन; पूज्य, पूजक और पूजन; साध्य, साधक
और साधन यह सब वह स्वयं ही हो जाता है। मेरा ऐश्वर्य, सामर्थ्य और शक्ति मेरे भक्तों के हाथ में आती है।
अद्वैतभजन के प्रेम से ही मेरे भक्तों को मेरे पद की प्राप्ति होती है। मैं देवता और वह भक्त यह बाह्य अंतर केवल
नाम का ही रह जाता है। आंतरिक दृष्टि से देखा जाय तो दोनों निजात्मज्ञान के कारण सच्चिदानंद स्वरूप ही रहते
हैं। उद्धव ! उपासनाकांड यही है। इस प्रकार साधक मेरी भक्ति करके निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करते हैं।
माया प्रतिबिम्बित चैतन्य जिसका उल्लेख 'त्वं' इस पदार्थ से करते हैं, उसे अविद्या के कारण 'जीव' की संज्ञा
प्राप्त होती है। स्वप्न में हम जिस प्रकार अपने अनेक रूप देखते हैं उसी प्रकार अविद्या के कारण आया हुआ
यह जीवत्व एकदेशी है। जो मायाजन्य चैतन्य, जो योगजन्य होकर जगत की उत्पत्ति का कारण, जो सर्वद्रष्टा,
सर्वज्ञ, सदा सर्वकाल ऐश्वर्य सम्पन्न, जो सभी कर्मों का कर्त्ता, किन्तु कर्ता होते हुए भी अकर्ता; और जिसमें
स्वाभाविक रूप से स्वयंभू नित्यमुक्तता होती है; जिसकी नैसर्गिक अकुंठित सत्ता, तो सदा परमानंद से पूर्ण रहती
है, जो ईश्वर होने के कारण सर्वसमर्थ है; वह (शिव) 'तत्' पदार्थ का वाच्यार्थ है। उस जीव का अज्ञान छोड़
तथा शिव की सर्वज्ञता भी छोड़कर दोनों के बीच का सार (लक्ष्यार्थ तत्त्व) उसी से ऐक्य पाकर अपना हेतु सिद्ध
करते हैं। विवाह के समय उम्र में कम पति अगर परदेश चला जाय और वही कुछ समय बाद अकस्मात परदेश
में यौवन सम्पन्न दिखायी दिया तो उस समय की बाल्यदशा छोड़कर और आज की यौवनावस्था छोड़कर उसकी
पत्नी उसके मूल स्वरूप को लक्ष्य कर जैसा व्यवहार करती है, उसी प्रकार हे उद्धव 'त्वंपद' और 'तत्पद' इन
दोनों का वाक्-अर्थ छोड़ देना चाहिये और ऐक्यभाव से जो दिखायी दे, उसका लक्ष्यार्थ स्वीकार करें यह
ज्ञानकाण्ड का इत्यर्थ है। जीव और शिव का ऐक्य साध कर मेरे चिद्स्वरूप में समाधान प्राप्त करें। यह बात वेद
ने सम्पूर्ण ज्ञानकाण्ड में कही है। वेद के तीनों काण्ड आदि-मध्य-अंत मुझे ही लक्षित हैं। यही अर्थ ग्रन्थ के अंत
में उपसंहार करते हुए श्रीकृष्ण बता रहे हैं। उद्धव ! वेद का भाषण अर्थ की गम्भीरता के कारण अत्यन्त गहन है।
उसके सम्बन्ध में अनेक ऋषियों ने काफी परिश्रम किया फिर सच्चा अर्थ उनकी समझ में नहीं आया। वही
वेदार्थ का सार मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बताया। भगवान का भाषण सुनकर उद्धव को आश्चर्य लगा और उसने
मन ही मन कहा कि वेद का यह सार भगवान और क्यों नहीं बताते ? बछड़े के मुँह लगाने से गाय के थन से
दूध आते ही, दूध निकालने वाला बछड़े को दूध पीने से रोक देता है, उसी प्रकार यह अत्यन्त प्रिय विषय
भगवान ने बीच ही में क्यों बन्द कर दिया ? उद्धव मन ही मन छटपटाने लगा। चिड़िया के बच्चे चारा लेने के
लिये जिस प्रकार चोंच फैलाकर माँ के सामने बैठ जाते हैं, उसी प्रकार उद्धव श्रीकृष्ण के सामने मुँह खोलकर
बैठ गया। उद्धव का उद्देश्य ध्यान में आकर भगवान श्रीकृष्ण वेद का अर्थ संक्षेप में ग्रन्थ के अन्त में सारांश रूप
में बता रहे हैं। अनेक शाखाओं में प्रसिद्ध त्रिकांडात्मक बढ़ा हुआ वेद, उसका बोध यही है कि मुझ अभेद
परमात्मा का हाथ पकड़ कर श्रुति तीन कांडों में चल रही है। कर्म का आदि, मध्य और अन्त मैं ही हूँ; कर्मकर्त्ता
और क्रियाशक्ति मैं ही हूँ; कर्म का फल देने वाला श्रीपति मैं ही हूँ, यही कर्मकाण्ड का इत्यर्थ है। मंत्रमूर्ति और मंत्रार्थ
भी सचमुच मैं हूँ, पूज्य, पूज्यक और पूज्य यह सब मैं ही हूँ मेरे सिवा अन्य कुछ भी नहीं। देवता ही देवता की पूजा