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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 869 में से

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पृष्ठ 575

इक्कीसवाँ अध्याय [५५९]

अर्थ समझ में नहीं आता। इसीलिये अनेक ऋषियों ने अनेक युक्तियाँ लड़ायी हैं। लेकिन उससे वेद का
वास्तविक अर्थ किसी के हाथ नहीं लगता क्योंकि वह शब्दशः और अर्थशः भी दुर्बोध है। उसके शब्दों का
उच्चारण ही स्वरवर्ण की दृष्टि से किसी की समझ में ठीक से नहीं आ पाता, उसके अर्थ की बात क्या करें ? वह
मनुष्यों को ही नहीं, देवताओं के लिये भी अगम्य है। पहले जब इस वेद को किसी ने नहीं देखा था तब इसे
पहले ब्रह्मदेव से कंठस्थ करवाया। लेकिन उनकी समझ में भी ठीक से न आने के कारण वह कर्म से कर्मठ ही
बन गया। वह अत्यन्त सुन्दर कर्मक्रिया शंखासुर ने तत्काल चुरा ली, जिससे ब्रह्मदेव वेद की बात ही भूल गया
और सृष्टि की उत्पत्ति का कार्य रुक गया। उस वेद का उद्धार करने के लिये मैंने शंखासुर का वध किया और
वेद का पूरा भण्डार ब्रह्मदेव को सौंप दिया। लेकिन ब्रह्मदेव को उनका स्मरण नहीं हो पा रहा था। वह बेचारा
पागल-सा हो गया। उस वेद विभाग के लिये ऋषियों ने अपने ज्ञान का उपयोग किया, उसकी शाखा उपशाखाओं
का पदच्छेद करने के लिये रावण आगे आया। फिर भी उद्धव ! मेरे वेद की सम्पूर्ण वार्ता तत्त्वतः किसी के भी
हाथ नहीं लगी। वही वेदसंस्थापक श्रीहरि, मैंने लोगों को मर्यादा में रखने के लिये स्वयं श्रीव्यास का अवतार
लेकर सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। वेद विभाग करने में वह राजहंस था इसीलिये उसे वेदव्यास कहते हैं।
उसने वेदार्थ प्रकट कर उसके चार भाग किये। वेद अर्थ की दृष्टि से गूढ़ है किन्तु शब्द की दृष्टि से सरल है। वे
शब्द अर्थात् वाणी के चार प्रकार हैं। उन्हें मैं स्पष्ट करके बताता हूँ। नाद का प्रथम स्फुरण जिसका सूक्ष्म प्राण
घोष करवाता है, उसका नाम है 'परावाणी', वही ओंकार का प्रथम लक्षण है। वही नादयुक्त प्राण जब
अंतःकारण में स्फुरण पाता है तो उसे 'पश्यंती वाणी' कहते हैं। उसमें विवेक लक्षण होता है और नाभि से
नाभिस्वर से कंठ तक घूमने वाली वाणी को 'मध्यमा' कहते हैं। इसके उपरान्त अकार, उकार और मकार का
स्वर वर्णयुक्त उच्चार जिससे 'ओंकार' प्रकट होता है, उसे 'वैखरी वाणी' कहते हैं। उस वैखरी वाणी में
शाखोपशाखाओं में जो अनंत रूप से वेद भरा हुआ है, उसकी भी मर्यादा नहीं है। इस प्रकार वेद असीम है।
उसके चार विभाग करने पर भी वह लोगों के लिये दुरूह ही रहा इसलिये 'उपवेद' के रूप में उसके और
विभाग किये। फिर भी उनकी समझ में वेद नहीं आया। इसलिये श्री व्यास ने वेद के पदों को विशद किया और
उनका अर्थ स्पष्ट किया। फिर भी वेद का वास्तविक अर्थ समझ में नहीं ही आता। उसका अर्थ लगाने के लिये
सुमंत, जैमिनी, भाष्य भारत, वैलसूत्र आदि महान ऋषि भी थक गये, फिर भी वेद का अर्थ उनकी समझ में नहीं
आया। सारांश, वेद का स्थूल और सूक्ष्म वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ जानने वाला मेरे सिवा और कोई नहीं है।
मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।
भूतेषु घोषरूपेण विसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७॥
मैं जो स्वयं सबके अंतःकरण में 'भूमा' अर्थात् अपरिच्छिन्न रूप से अंतर्बाह्य व्याप्त, परिपूर्ण परब्रह्म मुझसे
ही वेद अधिष्ठित है, इसी को 'उपबृंहित' कहते हैं। किन्तु अधिष्ठाता बादल में छिपे चन्द्रमा की तरह विकृत
हुआ सा दिखाई देता है अथवा अग्नि जब काष्ठ में अधिष्ठित होता है तो उसे तत्काल आकार प्राप्त होता है,
तब उस अग्नि को भी प्रबलता और शांतता ये दो विकारावस्थाएँ प्राप्त होती हैं। उसी प्रकार मैं अंतर्यामी नारायण
विकारी नहीं होता। मैं ब्रह्मस्वरूप से परिपूर्ण तथा स्वयं विकारों का निर्दलन करने वाला हूँ। विकारों का कर्त्ता
भी मैं और कर के अकर्त्ता भी मैं, मैं स्वयंभू ब्रह्मस्वरूप होने के कारण मुझे विकार होता ही नहीं है। ब्रह्म तो
निर्धर्म है। वह विकार का कर्म कैसे करेगा ? यदि तुम्हारे मन में इस प्रकार की कोई शंका है तो उसका उत्तर भी