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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 869 में से

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पृष्ठ 567

इक्कीसवाँ अध्याय ५५१
यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।
एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥१८॥
विषय से निवृत्ति हो, यही मेरे वेद का उद्देश्य है, इसलिये विषय छोड़ने के लिये ही गुणदोष दिखाने का
उपाय बताया है। प्राणी अकस्मात् ही सारे विषयों का त्याग नहीं कर पाते इसलिये निषेध रूप में उसकी निंदा कर
धीरे-धीरे विषय छूट सकें ऐसी योजना की गयी है। जैसे-जैसे विषय से निवृत्ति होती है वैसे-वैसे आत्मसुख की
प्राप्ति होती जाती है। पूर्ण विरक्ति होने पर साधक मत्स्वरूप हो जाता है। मत्स्वरूप की प्राप्ति में विषयासक्ति ही
बाधक होती है। उसकी निवृत्ति होने पर, साधक मत्स्वरूप हो जाता है और जब मेरे स्वरूप की प्राप्ति होती है
तब अहंकार पूरी तरह नष्ट हो जाता है। फिर शोक मोह शान्त होकर, अविद्या भी सचमुच नष्ट होती है। अविद्या
का नाश होते ही भयंकर जन्मभाव नष्ट हो जाता है। तब मृत्यु की ही मृत्यु हो जाती है और जीव का जीवत्व
समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होते ही अँधेरे के साथ रात्रि के लिये भी कोई स्थान नहीं रह जाता,
उसी प्रकार अविद्या जीव के साथ समाप्त होते ही, संसार भय को स्थान ही नहीं रह जाता। दृष्टि स्थिर होने पर
जिस प्रकार मृगजल की बाढ़ नहीं रह जाती, उसी प्रकार भवभय के साथ सारा संसार ही मिथ्या हो जाता है।
वेदोक्त स्वधर्माचरण प्राणियों के कल्याण के ही लिये है और विषय त्याग के लिये गुणदोषों का निरूपण किया
गया है। जिन्हें वेद का अर्थ समझ में नहीं आता वे उसे प्रवृत्तिपरक कहते हैं लेकिन वास्तव में वेद ने विषयों के
प्रति आसक्ति नष्ट करने वाली विरक्ति ही बताई है। वेदों के अनुसार स्वधर्म स्थिति से रहने पर विषयों के प्रति
विरक्ति उत्पन्न होती है और प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं, यही मेरी वेदोक्ति है। वेद की आज्ञा का पालन न कर
केवल विषयों के प्रति आसक्ति रखने से प्राणी अत्यन्त दुःख के भागी होते हैं। प्रवृत्ति जितनी भी है, वह
अनर्थकारी ही है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीभगवान चार श्लोकों में उद्धव को बताये हैं।
विषयेषु गुणाध्यासात् पुंसः सङ्गस्ततो भवेत्।
सङ्गात्तत्र भवेत् कामः, कामादेव कलिर्नृणाम् ॥ १९ ॥
कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।
तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी द्रुतम् ॥२०॥
जिसका मन सदा विषय के माधुर्य का ही स्मरण करता रहता है, उसमें अत्यन्त प्रबल विषयासक्ति उत्पन्न
होती है। विषयासक्ति बढ़ते ही निर्लज्ज काम खौल उठता है और उसके लिये वह अत्यन्त संकट के दुर्गम प्रसंग
सहन करता है। किन्तु विषयप्राप्ति के जो भी उपाय सोचते हैं वे पग-पग पर हानिकारक ही सिद्ध होते हैं। जब
तक विषयवासना की पूर्णता नहीं होती तब तक बहुत प्रबल कलह मचा रहता है। जहाँ वितंडा की अति हो
जाती है वहाँ उस कलह में सहायता करने वाला विरुद्ध और दुर्धर क्रोध तैश में आ जाता है। इससे बुद्धि का ज्ञान
तत्काल नष्ट हो जाता है। तब महामोह विवेक को ग्रस लेता है। विवेक का भान लुप्त होते ही चेतना भी
आश्चर्यचकित हो उठती है और फिर कार्य और अकार्य का भेद भी विस्मृत हो जाता है।
तया विरहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते।
ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशो मूर्च्छितस्य मृतस्य च॥ २१ ॥
विवेकशून्य हो कर मूढ़ हो जाने पर फिर न विषय ही रह जाता है और न परमार्थ ही। सन्मार्ग का मार्ग