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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 869 में से

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पृष्ठ 581

इक्कीसवाँ अध्याय ५६५
निर्गुण इन दोनों स्वरूपों के वास्तविक सुख का वह अकेला अनुभव कर रहा था। यह केवल श्रीकृष्ण कृपा का
माहात्म्य है। जब सद्गुरु की पूर्ण कृपा होती है, तब शिष्य की पसन्द ही उसका माप रहता है। वह यदि सगुण
मूर्ति चाहता है तो गुरु वैसी ही मूर्ति देते हैं। मन में निर्गुण मूर्ति की इच्छा हो तो गुरु की कृपा उसे निर्गुण स्वरूप
की स्थिति में साक्षात्कार कराती है अथवा जिसे सगुण और निर्गुण इन दोनों स्वरूपों का उपभोग करने की इच्छा
हो तो उसकी दोनों इच्छायें पूरी करने का सामर्थ्य कृपालु गुरु में रहता है। सद्गुरु की महिमा अगाध है। वेद भी
उसका बखान नहीं कर सकते। उनकी परिपूर्ण कृपा होने के बाद कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है ? श्रीकृष्ण
की कृपा से उद्धव की वह दुर्लभता समाप्त हो गयी और सगुण और निर्गुण दोनों श्रीकृष्ण ही हैं, यह बात हृदय
में अंकित हो गयी। श्रीकृष्ण की इस परिपूर्णता को जानकर, उसके चरण कमलों को लक्ष्य कर उद्धव ने उन्हें
साष्टांग दण्डवत किया। तब साँवले कृष्ण ने अपनी चारों बाहें फैला कर उसे आलिंगन में आबद्ध कर लिया।
उस आलिंगन का सुख अनुभवी ही जान सकता है। उस समय उद्धव को जो आनन्द हुआ उसका द्रष्टा एक
श्रीकृष्ण ही था। कृष्ण ने कहा, उद्धव ! मैंने वेदरहस्य का गुप्त खजाना, यह इक्कीसवाँ अध्याय तुम्हें बताया।
इससे लिंगदेह का भाव टूटता है, जीव को जीवत्व का स्मरण नहीं होता वही इक्कीसवाँ अध्याय तुम्हें बताया
जिससे देहभावना मिथ्या होकर नामरूप का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। वेदार्थ सार का यह निरूपण मेरे
विश्वात्मा का गुप्त निधान है। उद्धव ! मैंने अपना समझ कर ही तुम्हें मेरे जीव की पहचान करायी। उद्धव !
सहस्रों साधन करने पर भी, गुरुकृपा के बिना यह किसी के हाथ नहीं लगेगा। उस गुरुकृपा को साध्य करने के
लिये ही हमें पूर्ण स्वधर्म के अनुसार आचरण करना चाहिये, शास्त्र श्रवण तथा वेदपठन भी उसी के लिये करना
चाहिये और संतों का चरण स्पर्श करना चाहिये ताकि स्वामी जनार्दन प्रसन्न हो जाएँ। श्रीगुरु प्रसन्न होकर स्वयं
ही भागवत का निरूपण करा रहे हैं इसलिये एकनाथ जनार्दन से विनती कर रहा है कि उनकी नित्य नूतन कृपा
बनी रहे। अगले अध्याय में उद्धव प्रकृति-पुरुष का लक्षण तथा तत्त्वों की संख्या के सम्बन्ध में मधुर प्रश्न
पूछेगा। उसका उत्तर देते समय जन्म-मरण के प्रकार के सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण बतायेंगे। उस कथा में गहन
परमार्थ दिखायी देगा। उस कथा का श्रवण करते समय वैराग्य प्रखर हो उठेगा, ऐसे विस्तार से श्रीकृष्ण स्वयं
निरूपण करेंगे। घटाकाश महाकाश में मिल जाता है, उसी प्रकार एकनाथ जनार्दन की शरण में आया है। उसके
चरणों का वंदन करते समय अपने आप ही रसाल निरूपण की स्फूर्ति होती है। ॐ तत्सत्।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे भगवदुद्धव संवादे एकादश स्कंधे एकाकार टीकायां
वेदत्रय विभाग निरूपण नाम का एकविंशतितमोध्यायः ॥२१॥